होली पर सिर्फ रंग, पिचकारी और गुब्बारों का ही महत्व नहीं है, बल्कि किचन में बनने वाले पकवान भी लोगों के दिल में अपनी एक अलग ही जगह रखते हैं। हर शुभ काम का शुभारंभ मिठाई के साथ किया जाता है। गुजिया भी इन्हें मिठाई में से एक है, जो कि होली के खास मौके पर हर घर-परिवार में देखी जा सकती हैं। मावे या खोये के साथ ड्राई फ्रूट्स इनके टेस्टी होने का मुख्य कारण है। हर राज्य इसे अपने ही स्टाइल में बनाता है।
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जहां उत्तर भारत में खोया और ड्राई फ्रूट्स की स्टफिंग की जाती है, वहीं महाराष्ट्र, कर्नाटक और गोआ में नारियल की स्टफिंग इसे दूसरे राज्यों से अलग बनाती है। यह पूरे भारत भर में सिर्फ होली पर ही नहीं, बल्कि कई जगह दिवाली, क्रिसमस के मौके पर भी बनाई जाती है। यह मीठी, क्रंची गुजिया कमरे के तापमान पर ही खाई जाती है। सिर्फ हम ही नहीं, बल्कि हमारे जैसे बहुत से लोग इन्हें घर में बनाना ही पसंद करते हैं। बच्चों से लेकर बूढ़े गुजिया बड़े चाव से खाते हैं.
गुजिया और गुझिया में अंतर

गुजिया एक शहरी पकवान है. कुछ घरों की गुजिया तो इतनी लोकप्रिय होती है कि लोग सालों-साल उसके स्वाद के कसीदे पढ़ते हैं. आज बाजार में अलग-अलग चीजें भरकर गुजिया बनायी जाती हैं लेकिन मुख्य रूप से गुजिया में मैदे की परत के भीतर मावा (खोया) या सूजी ही भरी जाती है.
स्वाद के अनुसार मावा भरी हुई गुजिया लोगों को अधिक पसंद आती हैं लेकिन सूजी भरी गुजिया लम्बे समय तक तक चलती है. आज के समय लोग गुजिया और गुझिया दोनों को एक समझते हैं लेकिन वास्तव में गुजिया और गुझिया में अंतर है.
गुझिया में मैदे की परत के बाहर से चासनी की परत लगती है जिससे गुझिया और अधिक मीठी हो जाती है. गुजिया में मैदे की परत के बाहर कोई परत नहीं चढ़ती. गुजिया और गुझिया दोनों में भीतर से मावा और ड्राई-फ्रूट्स मिले रहते हैं.
गुजिया एक मध्यकालीन डिश
गुजिया भारत के अतीत की परछाई है- बिल्कुल एक समोस की तरह। जैसे समोसा, आलू और मैदा ने फिलो शीट और कटे हुए मीट की जगह ली और वेस्ट एशिया से सफर करते हुए, भारत के भूमध्य भाग तक पहुंच गया। उसी प्रकार गुजिया का भी इतिहास है। यह भी समोसे का ही अंग है। दोनों के ही बाहरी भाग पर मैदा होती है। बस, इसकी भरावन और शेप बदल गई। सबकान्टिनेंटल (उपमहाद्वीप) शेफ नई तकनीक और सामग्री के साथ ऐसा करने में सक्षम हो पाए।
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समोसे की तरह ही गुजिया भी मध्यकालीन डिश है। यह भारत में समानता और टेस्ट, जिसने मुगल काल में अपनी जगह बनाई, को दर्शाता है। इसका आइडिया वेस्ट से सफर करता हुआ ईस्ट पहुंचा और फिर मध्य भारत में फेमस हो गया। उत्तर भारत में गुजिया होली का एक पकवान है लेकिन भारत के कई सारे हिस्सों में गुजिया अन्य त्यौहारों में भी बनती है.
आज गुजिया बनाने के लिये बाजार में तरह तरह के सांचे उपलब्ध हैं लेकिन पुराने समय में गुजिया बनाने के लिये किसी भी तरह का सांचा नहीं हुआ करता था. मध्यकाल में गुजिया बनाने ले लिये महिलाएं होली से कुछ दिनों पहले से ही नाख़ून काटना बंद कर देती थी. गुजिया को गोठने के लिये महिलाएं अपने नाखूनों का प्रयोग करती थी. लम्बे नाख़ून से गुजिया गोठने में ज्यादा सहूलियत होती थी इसलिये महिलाएं गुजिया बनाने के कुछ दिन पहले से ही नाख़ून काटना बंद कर देती थी.
ऐसे बनती है गुजिया
गुजिया बनाना आज भी कम मेहनत का काम नहीं है. सबसे पहले मैदा गूंथ कर ढलने के लिये रखा जाता है. इसके बाद घी गर्म कर इसमें मावा डाला जाता है और लगातार चलाते हुए हल्का भूरा होने तक भूना जाता है. इस दौरान आंच मीडियम रखी जाती है. मावा भुन जाने के बाद, इसे बर्तन में निकालकर ठंडा होने के लिये रखते हैं.
ठंडा होने पर मावा में पिसी हुई चीनी, नारियल, किशमिश और काजू डालकर मिला लेते हैं. साथ ही चिरौंजी और इलाइची भी डालकर खूब अच्छे से मिला लिया जाता है.
आटे की लोई बनाकर उसकी पूरी बेलते हैं जिसे सांचे में रखकर उसके भीतर फिलिंग की जाती है. गुजिया के भीतर मावा भरने के बाद उसके किनारों पर हल्का दूध लगाते हैं और सांचा बंद कर देते हैं. सांचे को किनारे से दबाते हैं और सांचा खोलकर गुजिया उससे निकाल लेते हैं. गुजिया को कपड़े से ढ़ककर रखते हैं ताकि वह सूखे न. इसके बाद गुजिया को बहुत सावधानी से तलते हैं.
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