होरी खेलन आयो श्याम, जगत हुरियारे के संग होली के रंग : कान्हा के मंदिरों की होली
भारत के कोने–कोने में वैसे तो होली के रंग अजब निराले होते हैं लेकिन कान्हा के दरबार की होली की बात ही कुछ और है। कन्हैया के साथ होली खेलने के लिए भक्तों में भारी उल्लास देखा जाता है। श्याम की शरणागत होकर श्रद्धालु फाग के रंगों में सराबोर होते हैं तो सुध बुध खो बैठते हैं। कृष्ण मंदिरों में होने वाले फागोत्सव में जमकर होली गायन होता है, फाग की मस्ती होती है और कान्हा की कृपा के रंग बरसते हैं। माहौल में इत्र–केवड़े की खुशबू छा जाती है तो जमकर फूलों की होली भी होती है। प्रभु कृष्ण को सुंगधित गुलाल और इत्र अर्पण किए जाते हैं, गुलाल से ही आरती की जाती है और बाद में प्रसाद के रूप में वो गुलाल बरसाया जाता है तो भक्त उसमें रमने के लिए आतुर हो जाते हैं।


नाथद्वारा स्थित श्रीनाथजी मंदिर में गुलाल आरती में शामिल होने के लिए श्रद्धालुओं में भारी उत्साह और उमंग देखी जाती है। राजस्थान और गुजरात के वैष्णव संप्रदाय श्रद्धालुओं का श्रीनाथजी में वैसे तो वर्षभर तांता लगा रहता है लेकिन फाग की उमंग की बात की अलग होती है। बच्चे, युवा, बुजुर्ग, युवतियां और महिलाएं श्याम के दरबार में जमकर फाग के रंगों में रंगते हैं।


चित्तौड़गढ़ स्थित सांवलिया सेठ मंदिर और उदयपुर शहर में विराजे जगदीश मंदिर में भी जमकर फाग के रंग उड़ते हैं। उदयपुर शहर के मध्य स्थित जगदीश मंदिर में भगवान की भव्य प्रतिमा के समक्ष महिला और पुरुष श्रद्धालु चंग थाप पर नाचते गाते हुए फागोत्सव मनाते हैं। जगदीश मंदिर स्थापत्य कला का भी अद्भुत नमूना है। लेकसिटी आने वाले विदेशी पर्यटक भी जगदीश मंदिर जरूर आते हैं और मंदिर में होने वाले फागोत्सव जैसे आयोजनों में उत्साह से शामिल होते हैं।


जयपुर स्थित गोविंददेवजी मंदिर में होने वाला फागोत्सव भी विश्व प्रसिद्ध है। यहां शास्त्रीय गीत–संगीत, भजन गायन, कलाकारों द्वारा पेश किया जाने वाला मयूर नृत्य और फूलों की होली जैसे आयोजन देश विदेश में मशहूर हैं।

करौली स्थित मदनमोहन जी मंदिर में भी होली गायन, नृत्य और संगीत का दौर चलता है। श्रद्धालु गुलाल रूपी प्रसाद पाते हैं और एक–दूसरे पर भी रंग–गुलाल बरसाते हैं।

नंदगांव–बसराने और मथुरा–वृंदावन की होली का आनंद भला कौन नहीं लेना चाहेगा क्योंकि मथुरा ही जगत हुरियारे की जन्मस्थली भी है। यही वजह है कि होली पर हर साल यहां देश–विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं। राष्ट्रीय–अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की नजर भी इन आयोजनों पर टिकी रहती है।

कान्हा के संदर्भ में क्यों खास है होली का त्योहार
कहावत है कि अपने सांवले रंग और राधा रानी के गौरवर्ण होने की शिकायत कान्हा ने यशोदा मां से की और वजह जाननी चाही। माता यशोदा ने कन्हैया से कहा कि इच्छानुसार राधा का चेहरा रंग दें। इसके बाद कान्हा हुरियारे बनकर राधा को रंगने के लिए निकल पड़े और यही होली की परंपरा बन गई। मान्यता है कि कृष्ण गोकुल में अपने सखाओं के साथ मिलकर मजाक भरी शैतानियां करते थे और रंग उड़ाते थे। बसंत ऋतु में एक–दूसरे पर रंग डालना भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी की लीला का हिस्सा माना गया है।इसीलिए कन्हैया सबसे बड़े हुरियारे हैं जिनकी शरारतों के रंगों की बौछार में भीगने के लिए भक्त आतुर नजर आते हैं।
कृष्ण मंदिरों में प्रमुख रूप से गाई जा वाली कुछ प्रमुख होलियां –
होरी खेलने आयो श्याम, आज याए रंग में बोरो री….
कान्हा तोहे ही बुलाए गई नथवारी…
यशोदा तेरे लाला ने आज मेरी चूनर रंग में बोर दई…
रसिया बन्यो मदनमोहन प्यारो रसिया बन्यो…
कन्हैया रंग तोहपे डारेगो, सखी घूंघट काहे खोले…
चुनरिया रंग में बोर गयो ये कान्हा बंसी बारो…
रिपोर्ट– डॉ. देवेन्द्र शर्मा
Email: sharmadev09@gmail.com
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