मथुरा, 26 मार्च; गोकुल में भगवान कृष्ण कन्हैया के स्वरूप गोपियों के साथ में प्राचीन मुरलीधर घाट पर 26 मार्च को छड़ीमार होली खेलेंगे. इसकी तैयारियां की जा चुकी है.
गोकुल में भगवान कन्हैया बालकिशन रूप में वासुदेवजी लाए थे और भगवान कन्हैया का यहां बाल रूप है. इसलिए गोकुल में प्राचीन होली भगवान कन्हैया के साथ में बाल रूप में ही खेली जाती है. बरसाने में जहां लट्ठमार होली का आयोजन किया जाता है, वही गोकुल में भगवान कन्हैया के छोटे स्वरूप को देखकर बृज की गोपियां भगवान कन्हैया के साथ में छोटी-छोटी छड़ियों से होली खेलती हैं, जिसे छड़ी मार होली कहते हैं.
छड़ीमार होली की विशेषता

गोकुल में खेली जाने वाली छड़ीमार होली की विशेषता ये है कि लाठियों की जगह छड़ी से होली खेली जाती है. ब्रज में सभी जगह होली लाठियों से खेली जाती है, लेकिन गोकुल में भगवान का बाल स्वरूप होने के कारण होली छड़ी से खेली जाती है. इस होली का आनंद न केवल गोकुल वाले बल्कि देश के कई इलाकों से हजारों भक्त भी लेते हैं.
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गोकुल की होली पूरे ब्रज से अलग

भगवान श्री कृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ, लेकिन उनका बचपन गोकुल में गुजरा. यही भाव आज तक ग़ोकुल वासियों के अन्दर है. यही कारण है कि यहां की छड़ीमार होली आज भी पूरे ब्रज से अलग है.
भक्ति भाव से भक्त सबसे पहले बाल गोपाल को फूलों से सजी पालकी में बैठाकर नन्द भवन से मुरलीधर घाट ले जाते हैं, जहां भगवान बगीचे में बैठकर भक्तों के साथ होली खेलते हैं.
जिस समय बाल गोपाल का डोला नन्द भवन से निकलकर मुरलीधर घाट तक पहुंचता है, भक्त होली के गीतों पर नाचते हैं, गाते हैं और भगवान के डोले पर पुष्पवर्षा करते हैं.
सैंकड़ो वर्षों से चली आ रही इस होली की सबसे खास बात ये है कि जब भगवान बगीचे मै बैठकर भक्तों के साथ होली खेलते हैं, उस दौरान हुरियारिन भगवान और श्रद्धालुओं के साथ छड़ी से होली खेलती हैं.
द्वादशी के दिन भगवान निकलते हैं मंदिर से बाहर
गोकुल में होली द्वादशी से शुरू हो कर धुल होली तक चलती है. इस दौरान भगवान केवल एक दिन द्वादशी के दिन ही नन्द भवन से निकलकर होली खेलते हैं और बाकी के दिन मंदिर में ही होली खेली जाती है.
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