होलिका दहन मुहूर्त और पूजा विधि
हिन्दू, धार्मिक ग्रंथों के अनुसार होलिका दहन, जिसे होलिका दीपक या छोटी होली के नाम से भी जाना जाता है को होली से एक दिन पहले मनाया जाता है. इस दिन लोग लकड़ीयों में तरह तरह की मिठाइयां और वस्तुएं डालकर उसे अग्नि देते है जिसे होलिका दहन कहते है.
होलिका दहन, फाल्गुन माह की पूर्णिमा को किया जाता है. इसे सूर्यास्त के पश्चात प्रदोष के समय, जब पूर्णिमा तिथि हो तब करना चाहिए. पूर्णिमा तिथि, के दौरान भद्रा होने पर होलिका पूजन और होलिका दहन नहीं करना चाहिए. क्योंकि भद्रा में सभी शुभ कार्य वर्जित माने जाते है. होलिका दहन के अगले दिन रंग वाली होली जिसे धुलेंडी भी कहा जाता है मनाई जाती है.
कब है होलिका दहन मुहूर्त
वर्ष 2018 में होलिका दहन 1 मार्च 2018, बृहस्पतिवार को मनाई जाएगी. जिसके अगले दिन यानी, 2 मार्च 2018, शुक्रवार को रंगवाली होली मनाई जाएगी.
होलिका दहन का शुभ मुहूर्त = 18:26 से 20:55
मुहूर्त की अवधि = 2 घंटे 29 मिनट
भद्रा पूँछ = 15:54 से 16:58
भद्रा मुख = 16:58 से 18:45
रंगवाली होली = 2 मार्च 2018
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ = 1 मार्च 2018 को 08:57 बजे से
पूर्णिमा तिथि समाप्त = 2 मार्च 2018 को 06:21 बजे तक

होलिका दहन की पूजन विधि
आवाश्यक सामग्री
रोली, कच्चा सूत, चावल, फूल, साबूत हल्दी, मूंग, बताशे, नारियल, बड़कुले (छोटे-छोटे उपलों की माला) आदि.
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पूजन विधि
एक थाली में पूजा की सारी सामग्री लें और साथ में एक पानी से भरा लोटा भी लें. इसके बाद होली पूजन के स्थान पर पहुंचकर नीचे लिखे मंत्र को बोलते हुए स्वयं पर और पूजन सामग्री पर थोड़ा जल छिड़कें-
ऊं पुण्डरीकाक्ष: पुनातु,
ऊं पुण्डरीकाक्ष: पुनातु,
ऊं पुण्डरीकाक्ष: पुनातु.
अब हाथ में पानी, चावल, फूल एवं कुछ दक्षिणा लेकर नीचे लिखा मंत्र बोलें-
ऊं विष्णु: विष्णु: विष्णु: श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया अद्य दिवसे सौम्य नाम संवत्सरे संवत् 2073 फाल्गुन मासे शुभे शुक्लपक्षे पूर्णिमायां शुभ तिथि रविवासरे -गौत्र (अपने गौत्र का नाम लें) उत्पन्ना-(अपना नाम बोलें) मम इह जन्मनि जन्मान्तरे वा सर्वपापक्षयपूर्वक दीर्घायुविपुलधनधान्यं शत्रुपराजय मम् दैहिक दैविक भौतिक त्रिविध ताप निवृत्यर्थं सदभीष्टसिद्धयर्थे प्रह्लादनृसिंहहोली इत्यादीनां पूजनमहं करिष्यामि.
गणेश-अंबिका पूजन
हाथ में फूल व चावल लेकर भगवान गणेश का ध्यान करें-
ऊं गं गणपतये नम: आह्वानार्र्थे पंचोपचार गंधाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि..
अब भगवान गणपति को एक फूल पर रोली एवं चावल लगाकर समर्पित कर दें.
ऊं अम्बिकायै नम: आह्वानार्र्थे पंचोपचार गंधाक्षतपुष्पाणि सर्मपयामि..
मां अंबिका का ध्यान करते हुए पंचोपचार पूजा के लिए गंध, चावल एवं फूल चढ़ाएं.
ऊं नृसिंहाय नम: आह्वानार्थे पंचोपचार गंधाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि..
भगवान नृसिंह का ध्यान करते हुए पंचोपचार पूजा के लिए गंध, चावल व फूल चढ़ाएं.
ऊं प्रह्लादाय नम: आह्वानार्थे पंचोपचार गंधाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि..
प्रह्लाद का स्मरण करते हुए नमस्कार करें और गंध, चावल व फूल चढ़ाएं.
अब नीचे लिखा मंत्र बोलते हुए होलिका के सामने दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो जाएं तथा अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए निवेदन करें-
असृक्पाभयसंत्रस्तै: कृता त्वं होलि बालिशै: अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव:..
अब गंध, चावल, फूल, साबूत मूंग, साबूत हल्दी, नारियल एवं बड़कुले (भरभोलिए) होली के समीप छोड़ें. कच्चा सूत उस पर बांधें और फिर हाथ जोड़ते हुए होली की तीन, पांच या सात परिक्रमा करें. परिक्रमा के बाद लोटे में भरा पानी वहीं चढ़ा दें.
क्यों चढ़ाते हैं होली पर पूजन सामग्री
फाल्गुन पूर्णिमा की शाम को महिलाएं होली की पूजा करती हैं तथा विभिन्न पूजन सामग्री होली को अर्पित करती हैं, जैसे- उंबी, गोबर से बने बड़कुले, नारियल व नाड़ा आदि. परंपरागत रूप से होली पर चढ़ाई जाने वाली सामग्री के पीछे भी कुछ भाव छिपे हैं, जो इस प्रकार हैं-
उंबी- यह नए धान्य का प्रतीक है. इस समय गेहूं की फसल कटती है. ईश्वर को धन्यवाद देने के उद्देश्य से होली में उंबी समर्पित की जाती है. इसलिए अग्नि को भोग लगाते हैं और प्रसाद के रूप में अन्न उपयोग में लेते हैं.
गोबर के बड़कुले की माला- अग्नि और इंद्र वसंत की पूर्णिमा के देवता माने गए हैं. ये अग्नि को गहने पहनाने के प्रतीक रूप में चढ़ाए जाते हैं. इन्हें 10 दिन पहले बालिकाएं बनाती हैं.
ज्योतिषाचार्य प्रदीप भट्टाचार्य
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