भारतीय संस्कृति जोड़ना सिखाती है तोड़ना नहीं – देवकीनंदन ठाकुरजी

भागवताचार्य देवकीनंदन ठाकुर महाराज के सानिध्य में 30 मार्च से 5 अप्रैल 2018 तक Sri Mandir Cumberland Road, Auburn, NSW, Sydney (Australia) में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के छठें दिवस पर महाराज श्री ने श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन भक्तों को श्रवण कराया।
श्रीमद् भागवत कथा के षष्ठम दिवस की शुरूआत भागवत आरती और विश्व शांति के लिए प्रार्थना के साथ की गई।
भारतीय संस्कृति जोड़ना सिखाती है तोड़ना नहीं।
हमारी इन्द्रीयां ही गोपियाँ हैं और हमारा मन ही कृष्ण है। मन जितना मजबूत होगा, जितना विशाल और गहरा होगा,
इन्द्रीयाँ उतनी ही मन के वश में रहेंगी और मन के आस पास ही नृत्य करेंगी, खुश रहेंगी, यही सच्चा महारास है। महाराज श्री ने महारास का वृतांत सुनाते हुए कहा की भगवान ने गोपियों से कहा-
जो प्रेम करने वाले के लिए प्रेम करता हैं वहां प्रेम नही हैं वहां स्वार्थ झलकता हैं। केवल व्यापर हैं वहां। आपने किसी को प्रेम किया और आपने उसे प्रेम किया। ये बस स्वार्थ हैं।
दूसरे प्रकार के प्राणियों के बारे में आपने पूछा वो हैं माता-पिता, गुरुजन। संतान भले ही अपने माता-पिता के, गुरुदेव के प्रति प्रेम हो या न हो। लेकिन माता-पिता और गुरु के मन में पुत्र के प्रति हमेशा कल्याण की भावना बनी रहती हैं।
लेकिन तीसरे प्रकार के व्यक्ति के बारे में आपने कहा की ये किसी से प्रेम नही करते तो इनके 4 लक्षण होते हैं-
आत्माराम- जो बस अपनी आत्मा में ही रमन करता है।
पूर्ण काम- संसार के सब भोग पड़े हैं लेकिन तृप्त हैं। किसी तरह की कोई इच्छा नहीं हैं।
कृतघ्न – जो किसी के उपकार को नहीं मानता हैं।
गुरुद्रोही- जो उपकार करने वाले को अपना शत्रु समझता हैं।
गोपियों इनमे से मैं कोई भी नही हूँ। मैं तो तुम्हारे जन्म जन्म का ऋणियां हूँ। सबके कर्जे को मैं उतार सकता हूँ पर तुम्हारे प्रेम के कर्जे को नहीं। तुम प्रेम की ध्वजा हो। संसार में जब-जब प्रेम की गाथा गाइ जाएगी वहां पर तुम्हे अवश्य याद किया जायेगा।
पहले तो भगवान ने रास किया था लेकिन अब महारास में प्रवेश करने जा रहे हैं। तीन तरह से भगवन ने रास किया है। एक गोपी और एक कृष्ण, दो गोपी और एक कृष्ण, अनेक गोपी और एक कृष्ण।
यहां महाराज श्री ने भक्तो को एक दिना भोले भंडारी भजन श्रवण कराया।
जब महारास की गूंज सारी त्रिलोकी में गई तो हमारे भोले बाबा के कानों में भी महारास की गूंज गई। भगवान शिव की भी इच्छा हुई के मैं महारास में प्रवेश करूँ। भगवान शिव बावरे होकर अपने कैलाश को छोड़कर ब्रज में आये । पार्वती जी ने मनाया भी लेकिन त्रिपुरारि माने नहीं। भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त श्रीआसुरि मुनि, पार्वती जी, नन्दी, श्रीगणेश, श्रीकार्तिकेय के साथ भगवान शंकर वृंदावन के वंशीवट पर आ गये।
महाराज श्री ने एक बहुत सुन्दर भजन श्रोताओं के श्रवण कराया, भजन के बोल हैं “एक दिन भोले भंडारी, बन के ब्रज की नारी वृन्दावन आ गए” जिसे सुन सभी श्रद्धालु मन्त्र मुग्ध हो गए।
वंशीवट जहाँ महारास हो रहा था, वहाँ गोलोक वासिनी गोपियाँ द्वार पर खड़ी हुई थीं। पार्वती जी तो महारास में अंदर प्रवेश कर गयीं, किंतु द्वारपालिकाओं श्री ललिता जी ने ने श्री महादेव जी और श्री आसुरि मुनि को अंदर जाने से रोक दिया, बोलीं, “श्रेष्ठ जनों” श्रीकृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई पुरुष इस एकांत महारास में प्रवेश नहीं कर सकता।
भगवान शिव बोले की तो क्या करना पड़ेगा?

ललिता सखी बोली की आप भी गोपी बन जाओ। भगवान शिव बोले की जो बनाना हैं जल्दी बनाओ लेकिन मुझे महारास में प्रवेश जरूर दिलाओ।
भगवान शिव को गोपी बनाया जा रहा हैं। मानसरोवर में स्नान कर गोपी का रूप धारण किया है। श्री यमुना जी ने षोडश श्रृंगार कर दिया, तो सुन्दर बिंदी, चूड़ी, नुपुर, ओढ़नी और ऊपर से एक हाथ का घूँघट भी भगवान शिव का कर दिया। साथ में युगल मन्त्र का उपदेश भगवान शिव के कान में किया है। भगवान शिव अर्धनारीश्वर से पूरे नारी-रूप बन गये। बाबा भोलेनाथ गोपी रूप हो गये। फिर क्या था, प्रसन्न मन से वे गोपी-वेष में महारास में प्रवेश कर गये।
भगवान ने जब भगवान शिव को देखा तो समझ गए। भगवान ने सोचा की चलो भगवान शिव का परिचय सबसे करवा देते हैं जो गोपी बनकर मेरे महारास का दर्शन करने आये हैं। सभी गोपियाँ भगवान शिव के बारे में सोच के कह रही हैं ये कौन सी गोपी है। है तो लम्बी तगड़ी और सुन्दर। कैसे छम-छम चली जा रही है। भगवान कृष्ण शिव के साथ थोड़ी देर तो नाचते रहे लेकिन जब पास पहुंचे तो भगवान बोले की रास के बीच थोड़ा हास-परिहास हो जाएं तो रास का आनंद दोगुना हो जायेगा। भगवान बोले की अरी गोपियों तुम मेरे साथ कितनी देर से नृत्य कर रही हो लेकिन मैंने तुम्हारा चेहरा देखा ही नहीं हैं। क्योंकि कुछ गोपियाँ घूंघट में भी हैं।
गोपियाँ बोली की प्यारे आपसे क्या छुपा है? आप देख लो हमारा चेहरा। लेकिन जब भगवान शंकर ने सुना तो भगवान शंकर बोले की ये कन्हैया को रास के बीच क्या सुझा, अच्छा भला रास चल रहा था मुख देखने की क्या जरुरत थी। ऐसा मन में सोच रहे थे की आज कन्हैया फजती पर ही तुला हैं।
भगवान कृष्ण बोले की गोपियों तुम सब लाइन लगा कर खड़ी हो जाओ। और मैं सबका नंबर से दर्शन करूँगा। भगवान शिव बोले अब तो काम बन गया। लाखों करोड़ों गोपियाँ हैं। मैं सबसे अंत में जाकर खड़ा हो जाऊंगा।कन्हैयाँ मुख देखते देखते थक जायेगा। और मेरा नंबर भी नही आएगा।
सभी गोपियाँ एक लाइन में खड़ी हो गई। और अंत में भगवान शिव खड़े हो गए। जो कन्हैया की दृष्टि अंत में पड़ी तो कन्हैया बोले नंबर इधर से शुरू नही होगा नंबर उधर से शुरू होगा।
भगवान शिव बोले की ये तो मेरा ही नंबर आया।
श्रीराधा आदि श्रीगोपीश्वर महादेव के मोहिनी गोपी के रूप को देखकर आश्चर्य में पड़ गयीं। तब श्रीकृष्ण ने कहा, “राधे, यह कोई गोपी नहीं है, ये तो साक्षात् भगवान शंकर हैं। हमारे महारास के दर्शन के लिए इन्होंने गोपी का रूप धारण किया है। तब श्रीराधा-कृष्ण ने हँसते हुए शिव जी से पूछा, “भगवन! आपने यह गोपी वेश क्यों बनाया? भगवान शंकर बोले, “प्रभो! आपकी यह दिव्य रसमयी प्रेमलीला-महारास देखने के लिए गोपी-रूप धारण किया है।
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