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भारत में जल संचय की परम्पराएं : कैसे भारत में पानी बचाया जाता रहा है ?

भारत में जल संचय की परम्पराएं : कैसे भारत में पानी बचाया जाता रहा है ?

भारत में जल संचय की परम्पराएं : कैसे भारत में पानी बचाया जाता रहा है ?
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भारत में जल संचय की परम्पराएं : कैसे भारत में पानी बचाया जाता रहा है ?

भारत में जल संचय की परम्पराएं : कैसे भारत में पानी बचाया जाता रहा है ?

मानव जाति की प्रारंभिक जरूरतें भोजन, पानी और सुरक्षित ठिकाने तक ही सीमित थी। इसलिये यह कहना सही हो सकता है कि आदिमानव की प्रारंभिक जद्दोजहद का केन्द्र बिन्दु इन्हीं जरूरतों की पूर्ति के इर्द-गिर्द रहा हो। पुराने तथ्यों के अनुसार सामूहिक बसाहट की शुरुआत आज से लगभग 6000 साल पहले आरंभ हुई थी और पानी, उस कालखंड के आदमी की बुनियादी जरूरतों में शुमार था। बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिये उसने संभवतः सबसे पहले घरेलू उपयोग के लिये और फिर कालान्तरी में सिंचाई इत्यादि के लिये पानी के मिलने के लिये उपयुक्त स्थानों, जल संचय के तरीकों और उपयुक्त स्थानों के बारे में सोचना प्रारंभ किया होगा।

भारतवर्ष से पानी की प्राचीन परम्पराओं का प्रामाणिक दस्तावेजीकरण सेन्टर फार साइंस एंड इंवार्नमेंट (सी.एस.ई.) नई दिल्ली के स्व. अनिल अग्रवाल और सुनिता नारायण ने किया है। इस दस्तावेजीकरण में भारतवर्ष के विभिन्न जलवायु क्षेत्रों की पारंपरिक जल संचय प्रणालियों के विकास, हृस और उनमें मौजूद संभावनाओं की कहानी का सजीव चित्रण उपलब्ध है। मूल किताब अंग्रेजी में ‘डाईंग विजडम’ के नाम से लिखी गई थी। सन् 1998 में मध्यप्रदेश सरकार ने इस पुस्तक का अनुवाद कराया था। यह अनुवाद ‘बूंदों की संस्कृति’ के नाम से प्रकाशित हुआ था। इसके अलावा अनुपम मिश्र ने ‘राजस्थान की रजत बून्दें’ और ‘आज भी खरे हैं तालाब’ में प्राचीन जल प्रणालियों और परम्पराओं का सजीव विवरण दिया है। इन प्राचीन जल प्रणालियों और देशज परम्पराओं तथा मनीषियों की विरासत की समझ की झलक अगले कुछ पृष्ठों में दी गई है।

प्राचीन सभ्यता के केन्द्र के रूप में फिलीस्तीन और यूनान विख्यात हैं। इन देशों के प्राचीन नगरों में पानी जमा करने वाले कुन्डों के अवशेष मिले हैं; सबसे पहले कुन्डों के निर्माण की शुरुआत चट्टानों को काटकर हुई। ईसा से 2000 साल पूर्व, गारे से कुन्डों के निर्माण की तकनीकें विकसित हुईं। माना जाता है कि बांध बनाने की सभी बुनियादी बातों की जानकारी पहली सदी के मध्यकाल तक हो चुकी थी। ईसा के जन्म के 3000 साल पूर्व सबसे पुराना बांध जार्डन में बनाया गया था। उसके बाद दूसरा पुराना बांध जिसके प्रमाण वाडी गरावी, मिस्र में मिले हैं, ईसा के जन्म के 2600 साल पूर्व बनाया गया था। ईसा के जन्म के तीन सहस्त्राब्दी पूर्व, बलूचिस्तान में, गबरबन्द तकनीक से बरसात के पानी को संचित कर बांध बनाये गये थे। इन बांधों के बनाने में प्राचीन जलविज्ञान की गणितीय गणनाओं के उपयोग का प्रमाण अनुपलब्ध है। इसलिये कहा जा सकता है कि संभवतः इनके निर्माण में तकनीकी कौशल, सतत् अवलोकन एवं प्रयोगों पर आधारित देशज ज्ञान तथा जल प्रवाह की मात्रा एवं वेग की गहरी समझ का उपयोग हुआ है। नी, युफ्रेंटस, टिग्रिस और हवांग नदियों की घाटियों में नदियों के किनारें फली-फूली संस्कृतियों की बुनियाद में जल संचय और जल प्रबन्ध की तकनीकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा होगा।
प्राकृतिक जलचव की समझ, आधुनिक जल विज्ञान की बुनियाद है, पर भारत में प्राकृतिक जलचव को जानने की समझ आधुनिक जल विज्ञान की तत्कालीन समझ से पहले की है। उल्लेखनीय है कि भारत में, संभवतः प्राकृतिक जलचव का पहला उल्लेख छांदोग्योपनिषद् के इस उल्लेख से स्पष्ट है कि उस काल में, भारत में, पानी से जुड़ी प्राकृतिक घटनाओं की व्याख्या और उन घटनाओं में नियमों को तलाशने का प्रयास शुरू हो गया था।

भारत में, सतही जल संचय की प्राचीन प्रणालियों के बारे में कई स्थानों पर ऐतिहासिक प्रमाण मिले हैं। सबसे पहला प्रमाण धौलावीरा से मिला है। यह स्थान कच्छ केरन में खादिर द्वीप के उत्तर पश्चिम छोर पर स्थित है। इस स्थान पर सिन्धु घाटी की सभ्यता (ईसा से 3000 से 1500 साल पूर्व) के अवशेष मिले हैं। उस समय के समाज ने इस स्थान पर बरसाती पानी को एकत्रित करने के लिये अनेक जलाशयों का निर्माण किया था। जानकारों का मानना है कि धौलावीरा में जल निकासी (ड्रेनेज) की बहुत अच्छी व्यवस्था कायम की गई थी।

हड़प्पा काल के ऐतिहासिक स्थलों की खुदाई से पता चलता है कि उस काल में बने हर तीसरे मकान में कुंए थे। कुओं के मिलने का सीधा साधा अर्थ है कि उस काल में कुयें, सर्वसाधारण की पहुंच में आ चुके थे और संभवतः समाज ने उन्हें बनाने की तकनीक भी विकसित कर ली थी।

कौटिल्य अर्थशास्त्र के धुरन्धर विद्वान थे। वे चंद्रगुप्त मौर्य (ईसा से 321 से 297 साल पूर्व) के गुरू, सलाहकार और पथप्रदर्शक थे। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार उस काल में बरसाती पानी को एकत्रित करके उससे सिंचाई करने वाली प्रणाली मुकम्मल तौर पर कायम की जा चुकी थी। पानी को एकत्रित करने और उसके वितरण की प्रणाली के विकास की जानकारी से जाहिर है कि ईसा से 300 साल पहले के लोगों को बरसात के चरित्र, मिट्टी के भेद और सिंचाई की तकनीकों की जानकारी थी। उस काल में जल वितरण प्रणालियों को बनाने, चलाने और उनकी रखवाली करने का काम समाज करता था। उस काल की पानी से जुड़ी शासन व्यवस्था में राजा का काम, समाज को आवश्यक मदद देने और गड़बड़ करने वालों को उपयुक्त सजा देने का था।

चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने शासनकाल में निगरानी अधिकारी नियुक्त किये थे। इन अधिकारियों की जिम्मेदारी नदियों, तालाबों और अन्य साधनों से सिंचित होने वाले खेतों की निगरानी करना था। उस काल के समाज (किसानों) को बांधों, तालाबों और अन्य सिंचाई साधनों के निर्माण की कला मालूम हो चुकी थी।
गंगा की बाढ़ के अतिरिक्त पानी को जलाशय या तालाबों में एकत्रित करने वाली प्रणाली के अवशेषों के प्रमाण इलाहाबाद से लगभग 60 किलोमीटर दूर स्थित श्रृंगवेरपुरा में पुरातत्वेत्ता बी.बी. लाल को खुदाई में मिले हैं। इसे रामायण काल का तालाब बताया गया है। इस तालाब की आयु लगभग 2700 साल है। इस क्षेत्र के अवशेषों से पता चलता है कि उस कालखंड के लोग बाढ़ प्रबंध तथा जलविज्ञान की विधा से परिचित थे। इसी ज्ञान के कारण ही वे गंगा जैसी बड़ी नदी के बाढ़ के पानी के कुछ हिस्से को वैकल्पिक रास्ते से निकाल सके। रामायण में पम्पासर का भी उल्लेख है।

महाभारत काल भी तालाबों के अस्तित्व से अछूता नहीं था। महाभारत काल के तालाबों में ब्रह्मसर, कर्णझील और शुकृताल उल्लेखनीय हैं। गीता ज्ञान एवं कौरवों और पांडवों की युद्ध भूमि के कारण विख्यात कुरुक्षेत्र में ब्रह्मसर है। करनाल के पास कर्णझील स्थित हैं तो हस्तिनापुर में शुकृताल।

सिन्धु घाटी में प्राचीन जल प्रणालियों के चिन्ह 10वीं शताब्दी से मिलते हैं। तोमर वंष के राजा अनंगपाल ने सन् 1020 में सूरजकुन्ड नाम का अर्धचन्द्राकार तालाब बनवाया था। दिल्ली में राजधानी बनने के बाद, अलग-अलग कालखंडों में अनेक तालाबों और जलमार्ग या नजरें बनाई गईं।

गंगा के कछार में तालाबों का प्रचलन था। ये तालाब सामान्य आकार के होते थे और उनका क्षे़त्रफल अक्सर एक हैक्टेयर के आसपास होता था। उनकी पाल मिट्टी की होती थी और अधिकतम गहराई छह मीटर से अधिक नहीं होती थी।

मुजफ्फरनगर (उत्तर प्रदेश) से 46 किलोमीटर दूर स्थित कांधला में जोहड़ों का जिक्र मिलता है। इस नगर का जिक्र महाभारत में है। इसके उल्लेख अनुसार करनाल और केराना सहित इस नगर को दुर्योधन ने कर्ण को दान में दिया था। ये जोहड़ खेतों की सिंचाई और नगर की जलापूर्ति तथा जल निकास के साधन थे।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आहरोदक-सेतु से सिंचाई करने का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा मेगास्थनीज (यूनानी इतिहासकार) ने अपने यात्रा वृत्तान्त (भारत का विवरण) में इनका उल्लेख किया है। यह यूनानी इतिहासकार चन्द्रगुप्त मौर्य (ईसा पूर्व 321-297) के स्वशासनकाल में भारत यात्रा पर आया था।

सांची, मध्यप्रदेश में ईसा से 300 साल पहले सम्राट अशोक ने पहाड़ी पर तीन जलाशय बनवाये थे। एक पहाड़ के ऊपर और दो पहाड़ के ढ़लान पर – करीब 500 मीटर की दूरी पर। बरसात का पानी, एक के बाद एक तालाब को भरता था। बौद्ध भिक्षुओं द्वारा तालाबों के पानी का उपयोग निस्तार कार्यों में किया जाता था। इन तीनों जलाशयों की जल संग्रहण क्षमता लगभग 22.7 लाख लीटर है।

जूनागढ़ में दूसरी सदी के शिलालेख मिले हैं। इन शिलालेखों से पता चलता है कि उस काल के लोगों ने बाढ़ से क्षतिग्रस्त बांधों की मरम्मत करना सीख लिया था। उन्होंने सुदर्शन झील के सुधार के काम को अंजाम दिया था। उनके द्वारा सुधारी सुदर्शन झील अगले 800 साल तक अस्तित्व में रही।
दसवीं सदी में जैसलमेर और जोधपुर के रेगिस्तानी इलाके में बरसात के पानी को खड़ीनों में रोक कर उनसे (खड़ीनों) सैकड़ों मन अनाज पैदा किया जाता था। अनुपम मिश्र के शब्दों में खड़ीन खेत बाद में है, पहले तालाब हैं।

भोपाल के पास इस्लामनगर (जगदीशपुर) में जल संचय की अनोखी प्रणाली है। इस्लामनगर के पास हलाली और पातरा नदियों का संगम है। इन दोनों नदियों पर एक दूसरे से नहर द्वारा जुड़े दो समकोण बांध बनाये गये हैं। इस प्रणाली की पहली विशेषता यह है कि एक जलाशय में पानी की कमी होने पर दूसरे जलाशय का पानी उस कमी को पूरा करता था। इस प्रणाली की दूसरी विशेषता यह है कि दोनों जलाशयों के पूरा भरने पर अतिरिक्त पानी पातरा नदी में मिलकर आगे बह जाता है।

मध्य हिमालय तथा लोअर हिमालय के बीच की चौड़ी घाटियों यथा कश्मीर घाटी, जम्मू, हिमाचल प्रदेश, टिहरी गढ़वाल, दार्जिलिंग, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, नागालेन्ड, मेघालय, मणीपुर, मिजोरम और ब्रह्मपुत्रा नदी की असम घाटी स्थित है। इनमें कुहल (नहर) प्रणाली प्रचलन में थी। ये नहरें पहाड़ों के ढ़ाल को काट कर बनाई जाती थी। नहरों को ढ़ाल पर बहने वाली नदियों एवं स्त्रोंतों की जल धाराओं से पानी मिलता था। इस पानी से सीढ़ीदार खेतों में सिचाई की जाती थी। बड़े कुहलों से लगभग 400 हेक्टेयर तक के रकबे की सिंचाई संभव थी।

मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के सोंडवा ब्लॉक के भील आदिवासियों ने अपने इलाके की भू-आकृतियों से तालमेल बिठाती पाट पद्धति विकसित की है। इस पद्धति में किसान पहाड़ी सोतों के पानी को मोड़कर अपने खेतों में सिंचाई करता है जो जल प्रबन्ध का पर्यावरण के अनुकूल, व्यावहारिक और देशज तरीका है। यह पद्धति गुरुत्व बल के विरुद्ध काम करती है और नदी के तल के ऊपर के खेतों को पानी देती है।

तमिलनाडु के अनेक क्षेत्रों में तालाब, कुयें और नहरों का चलन था। मदुरै में नदियों से पानी लेकर नहरें बनाने का काम पुराने समय से प्रचलन में है। ये नहरें रास्ते के तालाबों को भी पानी देती थी। उत्तरी अकार्ट जिले में तालाब और अनीकट का चलन था। इन अनिकटों से असंख्य तालाबों को पानी दिया जाता था।

मध्यप्रदेश के महाकौशल क्षेत्र के नरसिंहपुर, जबलपुर, सागर और दमोह जिलों के लगे हिस्से की काली मिट्टी में नमी संचित करने, रबी में बिना सिंचाई के बढ़िया फसल लेने और कांस (खरपतवार) को नष्ट करने के लिये हवेली नामकी बहुत पुरानी व्यवस्था प्रचलित थी। इस व्यवस्था में बरसात के मौसम में कांस को खत्म करने के लिये खेतों में पानी भर कर रखा जाता था। बरसात बाद उन्हीं खेतों से पानी निकाल कर रबी की फसल ली जाती है। किसी जमाने में यह पद्धति 1.4 लाख हैक्टेयर इलाके में अपनाई गई थी। सोयाबीन की फसल आने के बाद इस पद्धति को ग्रहण लग गया है।

अग्रेंजी हुकूमत के पहले पूर्व कर्नाटक में मुसलमान शासकों का राज्य था। इन शासकों ने तालाब और नहरें बनवाने में काफी रूचि ली उनके निर्माण और मानीटरिंग को प्रोत्साहित किया तथा दासबन्ध अनुदान बांटे। अनुदान पाने वाले को दासबन्ध इनामदार कहते थे और उसे दायित्व निर्वहन के बदले में सिंचित इलाके का दसवां हिस्सा अनुदान में प्राप्त होता था।

मध्य प्रदेश के बुरहानपुर शहर में सन् 1615 में फारस के भूजल-वेत्ता तब्कुतुल अर्ज ने भूजल स्त्रोतों का अध्ययन कर जलापूर्ति के लिये भूजल एकत्रित करने वाली भूमिगत सुरंगों का निर्माण कराया। गुरूत्वाकर्षण पर आधारित इस प्रणाली से उस जमाने में लगभग 2,00,000 फौजियों और 30,000 आम लोगों को लगभग एक करोड़ लीटर पानी दिया था। वर्तमान में इससे प्रतिदिन 13 लाख लीटर पानी की आपूर्ति होती है।

लद्दाख, कारगिल, लाहौल और स्पिति के बर्फीले इलाकों में मई से अक्टूबर के महीनों में ग्लेशियरों के पिघलने से मिले पानी को नीचे के इलाके में छोटे-छोटे तालाबों (जिंग) में सिंचाई के लिये जमा किया जाता था। जिंग के पानी वितरण का इन्तजाम चुरपुन (हर साल चुने व्यक्ति) द्वारा किया जाता था।
राजस्थान के थार मरुस्थल में तालाब बनाने की परम्परा थी। जोधपुर के बालसमुन्द तालाब का निर्माण सन् 1126 में और जैसलमेर के घडीसर तालाब का निर्माण सन् 1335 में हुआ था। घडीसर तालाब के वेस्टवियर से निकला पानी एक के बाद एक नौ तालाबों में जमा होता था। घडीसर से आखिरी तालाब की दूरी लगभग 10.5 किलोमीटर है। बीकानेर जैसलमेर मार्ग पर स्थित बाप कस्बे से लगा तालाब बारहमासी है। जैसलमेर से लगभग 40 किलोमीटर दूर डेढ़ा ग्राम का जसेरी तालाब भी बारहमासी है। बाकानेर के आसपास के कस्बों में भी अनेक तालाब बनाये गये थे। इनमें कोलायत, गजनेर और गंगा सागर तालाब उल्लेखनीय हैं।

ब्रह्मपुत्र घाटी के बोडो आदिवासी खास प्रकार के पोखर बनाते थे। इन पोखरों को डांग कहा जाता था। इन पोखरों में जमा बरसाती पानी, धान की सुरक्षात्मक सिंचाई के लिये उपयोग में लाया जाता था। ये पोखर निजी मिल्कियत होते थे।

राजस्थान के सारे किले पहाड़ों पर अरावली युग या विन्ध्यन युग की कठोर चट्टानों पर स्थित हैं। उनमें बरसात के पानी के संचय के लिये विविध संरचनायें बनाई गई थी। चित्तौड़ के किले के 40 प्रतिशत भूभाग में 84 जल संग्रह (जलाशय, नाडा और बावड़ी) व्यवस्थायें थी। सभी किलों के अन्दर एक साल से भी अधिक समय के लिये पानी का पुख्ता इन्तजाम रखा जाता था।

दक्षिण में नीरघंटी (नीरुकुट्टी) ही पानी का हिसाब किताब रखते थे। उल्लेखनीय है, दक्षिण में इस काम की जिम्मेदारी सिर्फ हरिजन परिवार के व्यक्ति को ही दी जाती थी। वह पानी के हिसाब किताब के अलावा, किस खेत को कितना पानी चाहिये या किस खेत में क्या बोया जायेगा, तय करता था। पीढ़ी दर पीढ़ी दायित्व मिलने के कारण नीरघंटी में तालाब में पानी का स्तर देखकर फसल तय करने की समझ एवं क्षमता होती थी। पूरा समाज उसकी निष्पक्षता और समझ का लोहा मानता था।

भोपाल के राजा भोज ने 11वीं सदी में भारत का सबसे बड़ा जलाशय बनवाया था। इस जलाशय के निर्माण में सीमेन्ट, चूना या अन्य किसी जोड़ने वाले पदार्थ (सीमेंटिग मेटेरियल) का उपयोग नहीं किया था। भोजपुर में स्थित इस जलाशय की साइट दो पहाड़ियों के बीच, न्यूनतम दूरी के आधुनिक सिद्धान्त पर आधारित थी।

कल्हण ने 12वीं सदी में राजतरंगनी नामक ग्रन्थ लिखा है। इस ग्रन्थ में 12वीं सदी के कश्मीर के इतिहास का वर्णन है। इस ग्रन्थ में उस काल के कश्मीर के बारे में अनेक तथ्यों का उल्लेख है जिसमें तत्कालीन व्यवस्थित सिंचाई प्रणाली, डल तथा आंचर झील के निकट के निर्माण और नन्दी नहर बनाने का विवरण सम्मिलित है।

केरल के मध्यवर्ती पहाड़ी इलाके में बसे उत्तरी मलाबार के कसारगोड इलाके में भूजल संचय की सुरंग नामक अदभुत प्रणाली प्रचलन में थी। यह प्रणाली मूल रूप से ईसा से 700 साल पहले बेबीलोन और मेसोपोटानिया में विकसित हुई थी। इस प्रणाली में पहाड़ के अन्दर सुरंग खादी जाती है। सुरंग में हवा का दबाव सामान्य रखने के लिये लगभग 2 मीटर व्यास के कुयें बनाये जाते है। दो कुओं के बीच की दूरी 58 से 60 मीटर होती है। खड़े सुरंग का आकार सामान्यतः 0.45 से 0.70 मीटर चौड़ा और 1.8 मीटर से 2.0 मीटर रखा जाता है। चट्टानों से रिसा पानी कुये या तालाब में इकट्ठा कर विविध उपयोग में लाया जाता हैं।

महाराष्ट्र के थाणे, रत्नागिरी और कुलाबा जिलों में पहले कुओं, तालाबों और झीलों से सिंचाई होती थी। कोंकण में हिन्दु महाराजाओं और समाज के द्वारा बनाये अनेक तालाब और कृत्रिम झीलें मौजूद हैं। कुलाबा और थाणे जिलों में सिंचाई तथा खेती में शिलोत्री व्यवस्था काम में ली जाती है। इन जिलों में ज्वार को खारे पानी से बचाने के लिये खेतों में बांध बनाये जाते हैं। इन्ही बांधों को शिलोत्री बांध कहते हैं।

टिहरी गढ़वाल में भी परम्परागत सिंचाई का साधन कुहल ही था। कुहल को इस इलाके में गुहल कहते थे। इनका सर्वाधिक उपयोग नेनीताल और देहरादून जिलों में किया जाता था। पुराने जमाने में कुहलों के रखरखाव और निर्माण की पूरी जिम्मेदारी स्थानीय समाज के प्रतिनिधि जिसे कोहली कहते थे, की होती थी। समाज, कोहली के फैसलों का सम्मान करता था। पानी के बंटवारे से सम्बन्धित विवादों का फैसला पंचायत करती थी और बेईमानी के मामलों में कोहली द्वारा सजा दी जाती थी।

प्राचीन काल में दक्षिण अर्काट में हजारों तालाब बनाये गये थे। इस क्षेत्र के सबसे अधिक तालाब तिंडीवानम एवं विल्लुपुरम में थे- छोटे और बड़े। इनकी औसत सिंचाई क्षमता 20 से 50 हैक्टेयर होती थी। इस इलाके का सबसे बड़ा तालाब वीरानम है जिसका क्षेत्रफल लगभग 90 वर्ग किलोमीटर था। माना जाता है कि इस विशाल तालाब का निर्माण सम्राट राजेन्द्र चोल प्रथम (सन् 2011-2037) ने कराया था। इस तालाब में 18 गेट लगाये गये थे और उन गेटों से छोड़ा अनिकट का पानी दूर-दूर के खेतों की धान को सींचता था।

दार्जिलिंग के तीखी ढ़लान, अति वर्षा, बाढ़, भूमि स्खनल तथा मिट्टी के कटाव वाले इलाके में झरनों से नहरें निकाली जाती थी या पानी को बांस के पाईपों के सहारे फसल तक पहुंचाया जाता था। अरूणाचल प्रदेश के लोगों ने नहर बनाने के स्थान पर जल परिवहन के लिये बांस की नालियों वाली प्रणाली को अपनाया था।

छोटा नागपुर और गंगा के बीच के इलाके में सिंचाई की पईन-आहर व्यवस्था, संभवतः जातक युग (बुद्ध की पूर्ववर्ती अवतारों की कथा लिखने के दौर में) में विकसित की गई थी। पहाड़ी नदियों के पानी को खेतों में पहुंचाने वाले जलमार्ग को पईन तथा तीन तरफ से बांधों से घिरे आयताकार क्षेत्र, जिसमें पईन के पानी को इकट्ठा किया जाता है, आहर कहते हैं। इस क्षेत्र में छोटे आहर अधिक संख्या में बनाये जाते थे। इस इलाके की अधिकांश नदियों में अधिकतम पानी बरसात के मौसम में ही रहता है। इसी बरसाती पानी का उपयोग करने के लिये नईन-आहर व्यवस्था जो एकदम मुष्किल प्राकृतिक परिस्थितियों में पानी के सर्वोत्तम उपयोग और बाढ़ नियंत्रण की अदभुत देशी प्रणाली है, कायम की गई थी।

सिक्किम इलाके में उथले झरनों के पानी को रोक कर नहरें निकाली जाती थी और पानी को घर तक पहुंचाने के लिये बांसों की मदद ली जाती थी। इस प्राचीन तकनीक का सिद्धान्त आज भी चलन में है। अरूणाचल प्रदेश के लोगों ने नहर बनाने के स्थान पर जल परिवहन के लिये बांस की नालियों वाली प्रणाली को उपनाया था।

कर्नाटक का पूरा इलाका दक्षिण प्रायद्वीप की कठोर चट्टानों पर स्थित है। इस क्षेत्र में जल संचय की अनेक परम्परायें प्रचलन में थी। नदियों से नहरें निकाली जाती थी, नदियों के पानी से तालाब भरे जाते थे और कुओं तथा झरनों से पानी लेने का प्रचलन था। कर्नाटक में तालाबों के अलावा जल संचय एवं विविध उपयोग के लिये अराकेरे (अर्ध तालाब), मंदिरों की साफ सफाई के लिये देवीकेरे या देवगेरे (तालाब), उथली नहारों से आने वाले पानी के लिये प्रतिबन्धित इलाके का बोलकेरे (तालाब) और निस्तार की लिये कट्टे (तालाब) बनाये जाते थे।

मेघालय की जन जातियों ने कई सौ साल पहले तीखी पहाड़ी ढ़ालानों पर पहाड़ी स्त्रोतों के पानी को बांस के पाइपों की मदद से खेतों तक जाने की अदभुत देशज तकनीक विकसित की थी। इस तकनीक में विभिन्न व्यास, लम्बाई और आकार वाले बांसों को उपयोग में लाया जाता था जिसके कारण पानी की बरबादी बिलकुल नहीं होती थी और पौधों को लगातार टपकती बूंदों के रूप में पानी मिल जाता था।

उत्तर-पश्चिम महाराष्ट्र (धुले और नासिक जिलों की टापी घाटी में) में 300 से 400 साल पहले, सामुदायिक सिंचाई की फड व्यवस्था अस्तित्व में आई थी। इस व्यवस्था के अन्तर्गत पनझरा, अराम और मौसम नदियों पर बन्धरों की श्रृंखला बना कर पानी को खेतों की ओर मोड़ा जाता था। हर फड में एक ही फल लगाई जाती थी। इस प्रणाली का संचालन किसान करते थे। प्रत्येक फड, एक बन्धारे से जुड़ा होता था।

जलपाईगुड़ी (प. बंगाल) के पश्चिमी इलाके में पहाड़ी स्त्रोतों से छोटी-छोटी नालियाँ (जाम्पोई) निकाली जाती थी। ग्वालपाड़ा जिले के पूर्व के दुआर इलाके में कई किलोमीटर लम्बे जलमार्ग बनाकर सिंचित खेती करने का चलन था। इसी तरह कामरूप जिले के कचारी गाँव में भी छोटे जलमार्ग बनाने का प्रचलन था। इस गाँव में बने जलमार्गों (नहरों से 1000 से लेकर 1500 हैक्टेयर तक के रकबे में सिंचाई की जा सकती थी।

आन्ध्र प्रदेश में भी बांधों, अनीकट और तालाबों का प्रचलन था। हैदराबाद में सन् 1562 में हुसैल सागर नाम का तालाब बनाया गया। इस तालाब का जल भराव लगभग 20 वर्ग किलोमीटर में है। इस नगर के अधिकतर तालाब सन् 1564 से 1724 के बीच बने हैं। कहा जाता है कि तेलंगाना में किसी जमाने में लगभग 20,000 तालाब थे।

अरूणाचल प्रदेश के आपतानी आदिवासी समाज द्वारा कम ढाल वाली घाटियों के खेतों में केले नदी का पानी, नालियों के जरिये प्रत्येक खेत तक पहुंचाया जाता है। धान के खेतों और खाली खेतों के बीच में छोटे-छोटै बांध बनाये जाते थे। ऊंचाई पर स्थित खेतों के पानी को बाहर निकलने वाला रास्ता, नीचे के खेतों को पानी पहुंचाने का रास्ता होता था। इनके बीच में कम गहरा बांध बनाया जाता था। धान के खेतों में मछली पाली जाती थी।
तमिलनाडु में प्राचीन काल से इरी (तालाब) बनाये जाते रहे हैं। इन तालाबों का रखरखाव ग्रामवासियों द्वारा किया जाता था ओर इन कामों से जुड़े लोगों को काम के बदले जमीन दी जाती थी। इसी में संग्रहीत जल मुख्यतः भू-जल संवर्धन, बाढ़ नियंत्रण और सिंचाई के काम आता था। ग्राम स्तरीय संगठनों द्वारा पानी का वितरण पारंपरिक अधिकारों और जरूरत के अनुसार किया जाता था। यह प्रणाली सन् 1600 तक सुचारू रूप से संचालित की गई। तालाब दक्षिण भार की अनिवार्य आवश्यकता हैं।

असम घाटी में नदियों खासकर ब्रह्मपुत्र के किनारे अनेक प्राकृतिक झीलें और चंवर-चांचर हैं। बरसात के मौसम में बाढ़ का पानी इन चंचर-चांचारो में जमा हो जाता हैं और बाढ़ उतरने पर इनके उथले जलमग्न क्षेत्र में धान की फसल ली जाती है।

गंगा और दामोदर नदियों के बाढ़ प्रभावित इलाके (बंगाल) में आप्लावन नहरों की प्रणाली विकसित की गई थी जिसके अन्तर्गत बाढ़ के पानी को खेतों में फैलने से रोकने के लिये नदी के दोनों किनारों के समान्तर तटबन्ध बनाये जाते थे। आवश्यतानुसार, लोग तटबन्धों को काटकर बाढ़ के ऊपरी पानी को खेतों, पोखरों और झीलों में भर लेते थे जिससे किसानों को मछलियाँ, खेतों को उपजाऊ मिट्टी और मछलियों को पोखरों और झीलों में पनप रहे मच्छरों के अंडे मिल जाते थे।

ओड़िसा की पूर्वी पर्वतीय पहाड़ी पट्टी में रहने वाले आदिवासी जन जातियों के लोग सिंचाई संसाधनों के निर्माण में दक्ष थे। इस इलाके में सिंचाई संसाधनों के निर्माण को बहुत पुनीत पुण्य कार्य माना जाता था। कुर्मी जाति के लोग जंगल साफ करने की कला में माहिर थे। कुलत्या और अगडिया समाज के लोग तालाबों और बांधों को बनाने में दक्ष थे तो तालाब की खुदाई के कठिन काम के जानकार के रूप में सांसिया-ओड़िया समाज के लोगों की कीर्ति दूर-दूर तक फैली थी। आड़िसा में तालाब, पहाड़ी झरनों, सातों और नहरों का प्रचलन था।

आन्ध्र प्रदेश के कुडुप्पा जिले में कई तालाब सैकड़ों साल पुराने हैं। विजयनगरम् साम्राज्य क गौरवशाली युग में तालाबों के रखरखाव पर बहुत ध्यान दिया जाता था। उनके बेहतर रखरखाव के लिये खेती की जमीन को दासबन्धम (लम्बी अवधि के लिये) अनुदान पर आवंटित करने का नियम प्रचलन में था। आन्ध्रप्रदेश में तालाबों के अलावा कुओं, नदियों से नहरें निकालने का भी चलन था। ये संरचनायें जमीन के गुणधर्म के अनुसार बनाई जाती थी।
ओड़िसा के पूर्व के तटीय इलाके में छाटी पहाड़ियाँ और मैदान पाये जाते हैं। इन इलाकों में बरसाती पानी का संचय बड़े-बड़े पोखरों में किया जाता है। कुछ जगह सातों को भी पानी प्राप्त करने में किया जाता था। कुछ तालाब खोदकर तो कुछ संकरी घाटियों में बांध बना कर बनाये जाते थे। कुछ इलाके में बाढ़ का पानी भी किसी हद तक सिंचाई की आवश्यकता पूरी करता है।

तमिलनाडु की अधिकांश नदियों पर अनिकट (बैराज/बांध) बने हैं। इनमें से कुछ अनिकटों की आयु तो एक हजार साल से भी अधिक है। इनसे नहरें निकाल कर पानी को खेतों तक पहुंचाया जाता था। बूंदों की संस्कृति में कहा है कि तिरूनेलवेली जिले में राजा-महाराजा अनिकट, सामन्त तालाब और सामान्य नागरिक कुआ बनवाते थे। कन्याकुमारी में इस क्षेत्र के सबसे पुराने अनिकट मिलते हैं। बड़े अनिकट की सिंचाई क्षमता कई सौ एकड़ तक होती थी। वेल्लार नदी पर काफी पुराना अनिकट बना है जो 3,124 हैक्टेयर जमीन को सींचता है।

दक्षिण भारत में अधिकांश पुराने तालाबों का निर्माण मुख्य रूप से लाल मिट्टी वाले इलाकों में किया गया था। लाल मिट्टी में छुई (क्ले) की बहुतायत होने के कारण इसमें एकत्रित पानी का जमीन में बहुत कम रिसाव होता है। इस तरह के तालाबों में जमा पानी खेती, निस्तार और अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने में किया जाता था। बरसात के पानी में किसी तरह की अशुद्धि नहीं होने के कारण, उसका उपयोग निरापद था अर्थात् खराब होने या जमीन में हानिकारक लवण जमा होने का खतरा नहीं था।

तिरुनेलवेली जिले में बांध बनाने और नालियाँ बनाकर पानी को किसान के खेत तक पहुंचाने की जल प्रणाली का सर्वोत्तम उद्भव पांड्य शासन काल (सन् 750 से 1300) में माना जाता है। चोल और पांड्य राजाओं के शासन काल के बहुत पहले से मजबूत और स्थायी बांधी के बनाने का काम शुरू हो चुका था। उस काल में निर्माण सामग्री चयन और इंजीनियरिंग कौशल का विकास हर दृष्टि से अद्भुत और अविश्वासनीय है। बिना सर्वेक्षण यंत्रों की मदद से अनिकट के स्थल का चुनाव और कई किलोमीटर तक पानी ले जाना निश्चय ही देशज समझ, ज्ञान और विलक्षण प्रतिभा का परिचायक है।
पूरे देश में पुरानी जल प्रणालियों के उदाहरणों की कमी नहीं है। इसलिये अब उदाहरणों के स्थान पर विरासत की समझ और उसके पीछे छिपी वैज्ञानिकता की बात करें क्योंकि हकीकत में यही समझ, सीख और वैज्ञानिकता हमारा सही तरीके से मार्गदर्शन करेगी।

लेखक – श्री के. जी. व्यास (भू-जलविद)

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By Religion World July 25, 2019 22 min read
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