दिल्ली के दिगम्बर जैन मंदिर मे आयोजित हुआ जैन एकता सम्मेलन
- जैन धर्म की शिक्षाओं को अपनाने से समाज में शांति व सद्भावना संभव – जैन संत
नई दिल्ली, 23.02.2019 : जैन समाज के धार्मिक, सांस्कृतिक,सामाजिक एवं राजनैतिक अस्तिस्त्व को स्वाभिमान के साथ बनाये रखने तथा युवा वर्ग को जैनत्व की गौरवशाली संस्कृति से परिचय करवाने के लिए दिल्ली के विवेक विहार मे स्थित श्री दिगंबर जैन मंदिर में जैन एकता का अनूठा नजारा देखने को मिला। ‘श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान’ के अवसर पर जैन एकता सम्मेलन में आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज, आचार्य डा. लोकेश मुनि जी, डा. पदम मुनि जी महाराज,क्षुल्लक श्री योग भूषण जी महाराज ने एक मंच से अहिंसा, शांति और सद्भावना का संदेश दिया। सकल जैन समाज द्वारा आयोजित सम्मेलन में भारी संख्या मे श्रद्धालुओं ने भाग लिया और राष्ट्र निर्माण के लिए जैन धर्म की शिक्षाओं को देश के कोने कोने मे ले जाने का संकल्प लिया।

आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज ने कहा कि जैन धर्म मूल रूप में एक ही है , संसार से मुक्ति का मार्ग भी एक ही है जिसे भगवान महावीर ने कषाय मुक्ति के रूप में बताया है , बाहर की क्रिया भी तभी सार्थक परिणाम दे पाती है जब अंतरंग में कषाय की मंदता है। उन्होंने कहा आज वर्तमान में जैन धर्म के मूल को भूल कर हम आपसी विवादों में उलझे हुए हैं जिससे हमारा धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक ह्रास हो रहा है। जैन धर्म के सभी संतों को राष्ट्र व समाज निर्माण के लिए एकजुट होकर जैन शिक्षाओं का प्रचार करना चाहिए।
अहिंसा विश्व भारती संस्था के संस्थापक आचार्य लोकेश मुनि ने कहा कि आज विश्व में हिंसा , आतंकवाद और भुखमरी गरीबी जैसी विकराल समस्याओं के समाधान भगवान महावीर के जैन दर्शन में अहिंसा, अनेकान्तवाद और अपरिग्रहवाद में समाहित हैं। जैन धर्म में तो विश्वधर्म बनने की क्षमता है । भगवान महावीर के अहिंसा, शांति और सद्भावना के दर्शन की तत्कालीन समय में जितनी आवश्यकता थी उससे अधिक आवश्यकता और प्रासंगिकता मौजूदा समय में है। भगवान महावीर के सिद्धांत आज वैज्ञानिक दृष्टि से भी मान्य हो गए है। उनके बताये मार्ग पर चलने से स्वस्थ, समृद्ध एवं सुखी समाज का निर्माण हो सकता है।

डा. पदम मुनि जी महाराज ने कहा कि परस्पर में मैत्री, एकता और सद्भावना से ही हमारा आत्मिक और सामाजिक विकास संभव है । आत्मिक एवं सामाजिक विकास के लिए एक होना ही पड़ेगा। जैन एकता कि सिर्फ जैन समाज को ही नहीं अपितु देश और विश्व को आवश्यकता है।
क्षुल्लक श्री योग भूषण जी महाराज ने कहा कि जैन एकता में संदर्भ में कहा कि जैन धर्म की विभिन्न विचारधाराओं के संत एकसाथ संयुक्त आध्यात्मिक प्रवचन का समायोजन शुरू करें तो निश्चित ही हम एक सफल मुकाम और खोया हुआ स्वाभिमान प्राप्त कर सकते हैं । एकजुट होकर जैन शिक्षाओं का समाज मे प्रसार प्रचार करना हमारा दायित्व बन जाता है।

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