इन ज्योतिर्लिंगों में नहीं होता पंचामृत से अभिषेक
देश में 12 ज्योतिर्लिंग वे स्थान हैं जहां ज्योति रूप में भगवान शिव विराजते हैं. देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में एक स्थान महाकालेश्वर का है. महाकालेश्वर में सुबह पंचामृत से अभिषेक होता है. फिर जलाभिषेक और भस्म आरती होती है जबकि रात तक 4 बार शिवलिंग का अभिषेक होता है. देश भर से आए श्रद्धालु दिनभर में कई बार ज्योतिर्लिंग पर पंचामृत चढ़ाते हैं. शिवलिंग का भांग से भी श्रृंगार किया जाता है. लेकिन शिवलिंग के क्षरण होने की वजह से अब शिवलिंग पर आरओ का शुद्ध जल चढ़ाया जाएगा और दूध और जल की मात्रा भी तय रहेगी.
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7 ज्योतिर्लिंग में पंचामृत से नहीं होता अभिषेक
शिवलिंग के क्षरण को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर प्रशासन को आठ सुझावों पर अमल करने की इजाजत दे दी है. आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया कि विश्वप्रसिद्ध भस्म आरती में कंडे की भस्म चढ़ाई जाती है जिससे शिवलिंग का क्षरण हो रहा है. इसके अलावा महाकाल मंदिर के शिवलिंग पर लगातार चढ़ाए जाने वाला जल भी प्रदूषित है. शिवलिंग को अब दूध, दही, घी, शहद, शक्कर और फूलमाला की वजह से क्षरण का खतरा है और ऐसे में अब निश्चित मात्रा में ही दूध या पंचामृत चढ़ाने का अलावा दूसरा चारा नहीं है.
हालांकि देश में 12 में से 7 ज्योतिर्लिंग ऐसे हैं जहां श्रद्धालु पंचामृत से अभिषेक नहीं कर सकते हैं. यहां केवल एक तय मात्रा में पुजारी ही अभिषेक कर सकता है. इनमें ओंकारेश्वर, घृष्णेश्वर, त्र्यंबकेश्वर, भीमाशंकर, मल्लिकार्जुन, केदारनाथ और सोमनाथ शामिल हैं. बाकी 5 में से 3 ज्योतिर्लिंग काशी विश्वनाथ, रामेश्वरम और नागेश्वर में रोक तो नहीं है लेकिन क्षरण के लिए तमाम सावधानियां बरती जाती हैं.
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श्रद्धा के साथ सावधानी की ज़रूरत
ज्योतिर्लिंग की महिमा को देखते हुए अब श्रद्धा के साथ सावधानी की भी जरूरत है. हर ज्योतिर्लिंग का पुराणों-वेदों में अपना महत्व और वर्णन है. सोमनाथ को पृथ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है. ऋग्वेद में इसका उल्लेख मिलता है. आस्था के मुताबिक इस शिवलिंग की स्थापना चंद्रदेव ने की थी. मल्लिकार्जुन आंध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल नाम के पर्वत पर स्थित है. इस मंदिर के महत्व को कैलाश पर्वत के समान माना जाता है. ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्यप्रदेश में नर्मदा किनारे मान्धाता पर्वत पर स्थिति है. यह ज्योतिर्लिंग ऊं के आकार में है. जबकि विश्वनाथ शिवलिंग काशी में स्थित है.
मान्यता कहती है कि हिमालय को छोड़कर भगवान शिव ने काशी में ही अपना स्थायी निवास बताया था. रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु के रामनाथ पुरम में स्थित है. लंका पर चढ़ाई से पहले भगवान राम ने शिवलिंग की स्थापना की थी. तमाम धार्मिक और पुराणिक मान्यताओं में एक बात समान है कि शिवलिंग पर जल, दूध, दही और पंचामृत का अभिषेक किया जाता है. लेकिन शिवलिंग के क्षरण की वजह से अब पंचामृत और जल की मात्रा पर कटौती करने का सुझाव सामने आया है. हालांकि पंचामृत का अपना महत्व है. भक्तों की हर प्रकार के अभिषेक के साथ आस्था जुड़ी हुई है. हर अभिषेक के अपने धार्मिक और आध्यात्मिक फायदे हैं. मंत्र का उच्चारण करते हुए जल चढ़ाने से मन को शांति मिलती है. शहद चढ़ाने से वाणी में मिठास आती है.
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दूध चढ़ाने से स्वास्थ्य ठीक रहता है. दही चढ़ाने से स्वभाव गंभीर होता है. शिवलिंग पर घी चढ़ाने से शक्ति बढ़ती है. शिवलिंग पर इत्र अर्पित करने से विचार पवित्र होते हैं. चंदन का टीका लगाने से व्यक्तित्व आकर्षक बनता है. केसर चढ़ाने से सौम्यता आती है तो भांग चढ़ाने से विकार दूर हो जाते हैं. शक्कर चढ़ाने से सुख और समृद्धि बढ़ती है. हर अर्पण का अपना आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व है. ये सभी चीजें भगवान शिव को अतिप्रसन्न करने के लिए हैं. सावन में खासतौर भक्त अपने भोले बाबा को प्रसन्न करने के लिये दूध-दही-शहद-चंदन-केसर-अक्षत के साथ बेलपत्र, धतूरा और आंकड़े के फूल चढ़ाते हैं.
सावन में भोले बाबा का दूध से सबसे ज्यादा अभिषेक किया जाता है. ऐसे में महाकालेश्वर में नया नियम नई परंपरा की शुरुआत होगी. भक्तों के हाथों में ही शिवलिंग का आकार है जिसे वो चाहें तो क्षरण होने से रोक सकते हैं. महाकालेश्वर शिवलिंग का क्षरण रोकने के लिए जल, पंचामृत, फूल, भस्म और भांग और अन्य चढ़ाने वाली सामग्री प्रतीकात्मक रूप में रहे ताकि इन सब सामग्रियों के अधिक मात्रा में चढ़ने से शिवलिंग का क्षरण न हो. ऐसे में महाकालेश्वर के सभी भक्त निश्चित मात्रा में अपने आराध्य को जल चढ़ाएं लेकिन वो जल आरओ का हो ताकि हजारों साल पुराना ज्योतिर्लिंग अपनी महत्ता के साथ युगों-युगों तक बना रहे.
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