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श्रावण मास विशेष: कांवड़ यात्रा के पीछे मान्यताएं

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श्रावण मास विशेष: कांवड़ यात्रा के पीछे मान्यताएं

श्रावण मास विशेष: कांवड़ यात्रा के पीछे मान्यताएं

पिछले दो दशकों से कांवड़ यात्रा की लोकप्रियता बढ़ी है और अब समाज का उच्च एवं शिक्षित वर्ग भी कावड यात्रा में शामिल होने लगा है. लेकिन क्या आप जानते हैं कांवड़ यात्रा के इतिहास के बारेमें कई मान्यताएं प्रचलित है.  सबसे पहले कावड़िया कौन थे. इसे लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग मान्यता है. तो चलिए जानते हैं इन मान्यताओं के बारे में विस्तार से-

परशुराम 

कांवड़ यात्राकुछ विद्वानों का मानना है कि सबसे पहले भगवान परशुराम ने उत्तर प्रदेश के बागपत के पास स्थित ‘पुरा महादेव’ का कावड़ से गंगाजल लाकर जलाभिषेक किया था. परशुराम, इस प्रचीन शिवलिंग का जलाभिषेक करने के लिए गढ़मुक्तेश्वर से गंगा जी का जल लाए थे. आज भी इस परंपरा का पालन करते हुए सावन के महीने में गढ़मुक्तेश्वर से जल लाकर लाखों लोग ‘पुरा महादेव’ का जलाभिषेक करते हैं. गढ़मुक्तेश्वर का वर्तमान नाम ब्रजघाट है.

श्रवण कुमार  

कांवड़ यात्रा - श्रवण कुमार वहीं कुछ विद्वानों का कहना है कि त्रेतायुग में श्रवण कुमार ने पहली बार कावड़ यात्रा की थी. माता-पिता को तीर्थ यात्रा कराने के क्रम में श्रवण कुमार हिमाचल के ऊना क्षेत्र में थे जहां उनके अंधे माता-पिता ने उनसे मायापुरी यानि हरिद्वार में गंगा स्नान करने की इच्छा प्रकट की. माता-पिता की इस इच्छा को पूरी करने के लिए श्रवण कुमार अपने माता-पिता को कावड़ में बैठा कर हरिद्वार लाए और उन्हें गंगा स्नान कराया. वापसी में वे अपने साथ गंगाजल भी ले गए. इसे ही कावड़ यात्रा की शुरुआत माना जाता है.

यह भी पढ़ें-वृक्ष गंगा कांवड़ यात्रा : श्रावण में गायत्री परिवार की प्रेरणादायी पहल

भगवान राम 

कांवड़ यात्रा - भगवान राम

कुछ मान्यताओं के अनुसार भगवान राम पहले कावडिया थे. उन्होंने बिहार के सुल्तानगंज से कावड़ में गंगाजल भरकर, बाबाधाम में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था.

रावण

कांवड़ यात्रा - रावणपुराणों के अनुसार कावड यात्रा की परंपरा, समुद्र मंथन से जुड़ी है. समुद्र मंथन से निकले विष को पी लेने के कारण भगवान शिव का कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए. परंतु विष के नकारात्मक प्रभावों ने शिव को घेर लिया. शिव को विष के नकारात्मक प्रभावों से मुक्त कराने के लिए उनके अनन्य भक्त रावण ने ध्यान किया.तत्पश्चात कावड़ में जल भरकर रावण ने ‘पुरा महादेव’ स्थित शिवमंदिर में शिवजी का जल अभिषेक किया. इससे शिवजी विष के नकारात्मक प्रभावों से मुक्त हुए और यहीं से कावड़ यात्रा की परंपरा का प्रारंभ हुआ.

देवताओं  ने सर्वप्रथम शिव का किया था जलाभिषेक

शिव का किया था जलाभिषेकअन्य मान्यताओं की माने तो समुद्र मंथन से निकले हलाहल यानि विष के प्रभावों को दूर करने के लिए देवताओं ने शिव पर पवित्र नदियों का शीतल जल चढ़ाया था. सभी देवता शिवजी पर गंगाजी से जल लाकर अर्पित करने लगे. सावन मास में कावड़ यात्रा का प्रारंभ यहीं से हुआ.

 

RW

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By Shweta July 18, 2019 3 min read
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