क्या आप जानते हैं, अहोई अष्टमी क्यों मनाई जाती है?
हिंदू धर्म में अहोई अष्टमी का व्रत मातृत्व प्रेम और संतान की लंबी आयु से जुड़ा एक अत्यंत पवित्र पर्व माना जाता है। यह व्रत हर साल कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। इस दिन महिलाएँ अपनी संतान की सुख-समृद्धि, दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य के लिए अहोई माता की पूजा करती हैं।
अहोई अष्टमी का अर्थ और महत्व
‘अहोई’ शब्द संस्कृत के “अहो” यानी “दिन” और “अष्टमी” यानी “आठवें दिन” से मिलकर बना है। यह पर्व दीपावली से ठीक सात दिन पहले आता है। ऐसा माना जाता है कि जो स्त्री श्रद्धा और भक्ति से यह व्रत करती है, उसकी संतान दीर्घायु और निरोगी रहती है।
इस दिन अहोई माता के साथ-साथ सिंह और सप्तपुत्रिका (सात पुत्रों का प्रतीक) की पूजा की जाती है।
व्रत रखने वाली महिलाएँ पूरे दिन निराहार रहती हैं और संध्या समय तारे निकलने पर कथा सुनती हैं।
अहोई अष्टमी की कथा
प्राचीन काल में एक साहूकार दंपति था, जिनके सात पुत्र थे। एक दिन उनकी पत्नी जंगल में मिट्टी लेने गई ताकि घर की मरम्मत कर सके। वहां गलती से उसने किसी सिंहनी के बच्चों पर मिट्टी का फावड़ा लगा दिया, जिससे एक शावक मर गया।
सिंहनी क्रोधित होकर बोली, “तूने मेरे बच्चे को मारा है, इसलिए तुझे भी संतान सुख से वंचित रहना पड़ेगा।”
समय बीतने पर साहूकार की सातों बहुओं के बच्चे एक-एक करके मर गए। तब सबसे छोटी बहू ने अपने अपराध का पश्चाताप करते हुए अहोई माता की आराधना शुरू की और सच्चे मन से प्रार्थना की। माता प्रसन्न हुईं और उसे संतान प्राप्ति का आशीर्वाद दिया। तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि जो महिला अहोई माता की पूजा करती है, उसकी संतान की रक्षा होती है।
पूजा विधि
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अहोई अष्टमी के दिन महिलाएँ प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लेती हैं।
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दीवार पर या कागज पर अहोई माता, सिंह और सात पुत्रों का चित्र बनाया जाता है।
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कलश स्थापित कर उसमें जल और सिक्का रखा जाता है।
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शाम को तारे निकलने के बाद कथा सुनी जाती है।
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तारे देखने के बाद व्रत खोला जाता है और संतान को भोजन करवाया जाता है।
तारे देखने का महत्व
अहोई अष्टमी की शाम को महिलाएँ आकाश में अहोई तारा (सप्तर्षि तारों में से एक) को देखकर पूजा समाप्त करती हैं। माना जाता है कि इन तारों के दर्शन करने से संतान को लंबी आयु और सौभाग्य प्राप्त होता है।
अहोई अष्टमी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि मां के प्रेम और त्याग का प्रतीक है। यह व्रत दिखाता है कि मातृत्व भाव कितना गहरा और दिव्य होता है। अहोई माता की कृपा से संतान स्वस्थ, दीर्घायु और जीवन में सफल होती है।
इसलिए हर वर्ष अहोई अष्टमी पर महिलाएँ श्रद्धा और भक्ति के साथ यह व्रत करती हैं — अपने बच्चों की खुशियों और मंगल जीवन की कामना के लिए।
~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो
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