मातृत्व का शिखर स्वरुप “मां छिन्नमस्ता”

श्री काली कुल और दशमहाविद्या की अत्युत्म शक्ति मां छिन्नमस्ता पूरे संसार में अपने अद्भुत स्वरुप के लिए विख्यात हैं। मां काली के इस स्वरुप के इतने गूढ़ अर्थ हैं जिन्हें शब्द ब्रम्ह में भी समाहित करना असंभव है। माता काली अपने आद्या स्वरुप में अगर ब्रम्हांड की क्रियात्मक शक्ति हैं और उनका तारा स्वरुप अगर संसार के निर्माण की शक्ति हैं तो मां छिन्नमस्ता संसार का पालन करने वाली शक्ति है।
मां छिन्नमस्ता के आविर्भाव की कथा यह है कि जब चंड मुंड का संहार करने के पश्चात मां काली के चामुंडा स्वरुप का क्रोध शांत नहीं हुआ और वो अपने रौद्र रुप में योगिनियों के साथ संहार कार्य में निमग्न थी। लेकिन जब राक्षस समाप्त हो गए तो रक्त पीने के लिए आतुर उनकी दो योगिनियों डाकिनी और वर्णिनी ने उनसे उनकी क्षुधा मिटाने का आग्रह किया। मां का मातृत्व जाग उठा और उन्होंने अपने ही सिर को अपने खड़ग से काट कर अपने रक्त की तीन धाराएं निकाल दी। रक्त की एक धारा डाकिनि के मुख में गई, दूसरी धारा से रक्त का पान वर्णिनि ने किया तो तीसरी धारा का पान मां ने खुद अपने ही हाथों में लिए अपने मुख को पिला दिया। मां का ये स्वरुप इसी लिए अन्नपूर्णा का स्वरुप भी माना जाता है।

मां छिन्नमस्ता के इस स्वरुप से उनके जगत का पालन करने का आभास होता है। ये जगत क्षुधा की अग्नि के नियमन से ही चलता है। वो क्षुधा उदर की हो या फिर काम वासना की । इसी लिए मां के इस स्वरुप में दोनों ही भूखों से परे जाने का दर्शन मिलता है। मां को कामेश्वरी भी कहा जाता है। क्योंकि मां छिन्नमस्ता कामदेव और रति के उपर विराजित हैं। इसका एक अर्थ यह भी है कि काम वासना के दमन या फिर रुपांतरण के बाद ही साधना का मार्ग प्रशस्त होता है।
छिन्नमस्ता के सिर से निकली तीन धाराएं वस्तुत: कुंडलिनी जागरण की एक महत्वपूर्ण प्रकिया को भी दिखलाती है। हमारे शरीर के अंदर इड़ा, पिंगला और सुष्मना तीन नाड़ियों का होना बताया गया है जो शरीर के निर्माण, पालन और मुक्ति से संबंध रखती हैं। जहां इड़ा और पिगंला नाड़ियों के प्रवाह से हमारे शरीर के अंदर लगातार चलने वाली निर्माण प्रकिया और पालन की प्रकिया चलती है वहीं इस माया रुपी संसार से मुक्त होने के लिए सुष्मना नाड़ी का जागृत होना आवश्यक है। डाकिनी और वर्णनि को इड़ा और पिंगला नाड़ी के शमन का प्रतीक माना गया है जबकि माता के मस्तक को सहस्रार चक्र का प्रतीक माना गया है जिससे सुष्मना नाड़ी का उर्जा निकल कर मुक्ति प्रदान करती है। छिन्नमस्ता के चरणों में त्रिकोणिय कमल के पास काम में मग्न कामदेव और रति को मूलाधार चक्र में स्थित हमारी कामनाओं का प्रतीक माना गया है। मूलाधार चक्र में स्थित काम और रति के दमन के साथ ही हमारी कुंडलिनी जागरण की प्रकिया शुरु होती है और माता के मस्तक रुप सहस्रार चक्र के भेदन के बाद ही कुंडलिनी जागरण की वह प्रक्रिया पूरी होती है जिसके बाद आत्मा और परमात्मा का मिलन होता है। मां के कमर में स्थित सर्प कुंडलिनी शक्ति का ही प्रतीक है।
माता छिन्नमस्ता का ये स्वरुप दार्शनिकों और साधकों के लिए हमेशा से एक रहस्य रहा है
साथ ही नारीवादी चिंतको के लिए भी माता का ये स्वरुप आह्लादित करने वाला है । श्री काली कुल की सभी देवियों की तरह माता छिन्नमस्ता भी मुक्तकेशी हैं। किसी स्त्री स्वरुप को अपने बालों को खुला रखना सामाजिक मान्यताओं को चुनौति देना है। इस वजह से श्री काली कुल की सभी देवियां सामाजिक बंधनों और रीति रिवाजों के विरोध में खड़ी हैं। माता छिन्नमस्ता के शरीर का रंग लाल बताया गया है। मां काली जहां कृष्णवर्णा हैं और ब्रम्हांड की क्रियात्मकता उन्ही से शुरु होती है वही मां तारा के शरीर का रंग नीला है, जो हमारी पृथ्वी का रंग है (अंतरिक्ष से देखने पर हमारी पृथ्वी नीले रंग की दिखती है) जहां जीवन की शुरुआत होती है। माता छिन्नमस्ता के शरीर का रंग लाल होने का अर्थ यही है कि वो हमारे रक्त की उस उर्जा को संचालित करती है जिससे हमारे शरीर का पालन होता है। वैज्ञानिक रुप से भी हमारे शरीर के रक्तों के जरिए ही उर्जा का प्रवाह होता है जिससे हमारा शरीर चलता है।
माता छिन्नमस्ता का वर्णन कई पुराणों, श्री भैरव तंत्र और शाक्त मत के महत्वपूर्ण ग्रंथ शाक्त प्रमोद में विस्तार से किया गया है। माता के दो प्रसिद्ध मंदिर झारखंड के रजरप्पा और हिमाचल के चिंतापूर्णी में हैं। जहां रजरप्पा में मां का स्वरुप उग्र है वहीं चिंतापूर्णी में माता अपने मातृत्व के शिखर पर हैं।
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लेखक – अजीत कुमार मिश्रा
संपर्क – ajitkumarmishra78@gmail.com
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