RELIGION WORLD — THE INDEPENDENT SCIENTIFIC & INTERFAITH JOURNAL
Navigation

© 2026 Religion World Foundation.

Global Faith • Scientific Heritage • Human Ethics

मिच्छामी दुक्कड़म: यदि मैंने आपको कष्ट पहुँचाया है तो मुझे क्षमा करिए

मिच्छामी दुक्कड़म: यदि मैंने आपको कष्ट पहुँचाया है तो मुझे क्षमा करिए

मिच्छामी दुक्कड़म: यदि मैंने आपको कष्ट पहुँचाया है तो मुझे क्षमा करिए
Visual Archive

मिच्छामी दुक्कड़म: यदि मैंने आपको कष्ट पहुँचाया है तो मुझे क्षमा करिए

मिच्छामी दुक्कड़म द्वारा, यह कहने की कोशिश की जा रही है, ‘मिथ्या में दुष्कृतम’ मतलब , ‘मेरे बुरे कर्म (दुष्कृत) फलहीन हो (मिथ्या)।’ मिच्छामी दुक्कड़म के  अर्थ  से हम समझ सकते हैं ,यह एक क्षमापना पर्व है ।



यह वाक्य हमसे हुई उन गलतियों के लिए पश्चाताप व्यक्त करने का एक तरीका है। यह पश्चाताप, प्रतिक्रमण है (कबूल करना, क्षमा मांगना और पुनरावृत्ति न करने का संकल्प करना) जो संवत्सरी के दिन किया जाता है।

मिच्छामी दुक्कड़म् प्राकृत भाषा का शब्द

प्राकृत भाषा में काफी जैन ग्रंथों की रचना हुई है। ‘मिच्छामी दुक्कड़म्’ भी प्राकृत भाषा का शब्द है। पर्युषण महापर्व जैन धर्मावलंबियों में आत्मशुद्धि का पर्व है। इस तरह पर्युषण पर्व आत्मशुद्धि के साथ मनोमालिन्य दूर करने तथा सभी से क्षमा-याचना मांगने का सुअवसर प्रदान करने वाला महापर्व है।

आचार्य महाश्रमण के अनुसार- क्षमापना से चित्त में आह्लाद का भाव पैदा होता है और आह्लाद भावयुक्त व्यक्ति मैत्रीभाव उत्पन्न कर लेता है और मैत्रीभाव प्राप्त होने पर व्यक्ति भाव विशुद्धि कर निर्भय हो जाता है। जीवन में अनेक व्यक्तियों से संपर्क होता है तो कटुता भी वर्षभर के दौरान आ सकती है। व्यक्ति को कटुता आने पर उसे तुरंत ही मन में साफ कर देनी चाहिए और संवत्सरी पर अवश्य ही साफ कर लेना चाहिए।

यह भी पढ़ें-गणेश चतुर्थी: भगवान गणेश जी और उनके प्रतीक चिन्हों का महत्व

विदेशों में भी मनाते हैं क्षमापना पर्व

जैन धर्म के पयुर्षण पर्व से विदेश भी अछूता नहीं है। यहां रहने वाले जैन धर्मावलंबी भी इन दिनों तप-आराधना करके ‘मिच्छामी दुक्कड़म्’ का पर्व मनाते हैं और अपने से दूर रहने वाले अपने सगे-संबंधी तथा परिचितों-मित्रों से माफी मांगकर क्षमापना पर्व को मनाते हैं। यह पर्व भारत के अलावा दुनिया में अन्य कई जगहों, जैसे अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, जापान व अन्य अनेक देशों में भी यह पर्व धूमधाम से मनाए जाते हैं।

माना जाता है कि क्षमा देने से आप अन्य समस्त जीवों को अभयदान देते हैं और उनकी रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। तब आप संयम और विवेक का अनुसरण करेंगे, आत्मिक शांति अनुभव करेंगे और सभी जीवों और पदार्थों के प्रति मैत्रीभाव रखेंगे। आत्मा तभी शुद्ध रह सकती है, जब वह अपने से बाहर हस्तक्षेप न करे और बाहरी तत्व से विचलित न हो। क्षमाभाव ही इसका मूलमंत्र है।



भगवान महावीर ने कहा है-
खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे।
मित्तिमे सव्व भुएस्‌ वैरं ममझं न केणई।

अर्थात सभी प्राणियों के साथ मेरी मैत्री है, किसी के साथ मेरा बैर नहीं है। यह वाक्य परंपरागत जरूर है, मगर विशेष आशय रखता है। इसके अनुसार क्षमा मांगने से ज्यादा जरूरी क्षमा करना है।

[video_ads]
[video_ads2]
You can send your stories/happenings here:info@religionworld.in

RW

Editorial Review Note

Religion World is the country's only website that provides complete information on all religions. Religion World will always present information about all religions impartially. You can send us all kinds of information, news, updates, opinions, and suggestions at religionworldin@gmail.com.You can also follow us on X (Twitter), Facebook, and YouTube.

By Shweta August 23, 2020 3 min read
Share:

Related Historical & Critical Essays

Jainism

जैन धर्म के क्षमापना पर्व को राष्ट्रीय क्षमापना दिवस के रुप में मनाना चाहिए

जैन धर्म के क्षमापना पर्व को राष्ट्रीय क्षमापना दिवस के रुप में मनाना चाहिए  जैन धर्म के मान्यतानुसार प्रतिवर्ष भाद्रपाद माह में एक दिन साल भर में हुई…

Read now
Jainism

Mahavir Jayanti 2026: Significance, Celebrations and Life of Mahavira

Mahavir Jayanti 2026 will be celebrated on March 31, 2026, as Jains in India and around the world mark the birth anniversary of Lord Mahavira, the 24th and…

Read now
Hinduism

प्रेमानंद जी महाराज और जैन आचार्य लोकेश की वृंदावन में भेंट, विश्व शांति पर चर्चा

प्रेमानंद जी महाराज और जैन आचार्य लोकेश की वृंदावन में हुई मुलाकात में विश्व शांति, अहिंसा, शांति शिक्षा और युवा पीढ़ी के आध्यात्मिक विकास पर महत्वपूर्ण चर्चा हुई।

Read now