दुर्गा पूजा या नवरात्रि महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है. यह त्योहार दुर्गा, देवी पार्वती के योद्धा रूप और दिव्य शक्ति, समृद्धि और राक्षसी शक्तियों के संहारक की देवी को समर्पित है. देवी दुर्गा की मूर्ति भक्तों के प्रमुख आकर्षणों में से एक हैं. लोग दुर्गा पूजा और देवी की मूर्ति को देखने के लिए विभिन्न स्थानों पर जाते हैं.
लेकिन क्या आपको इसकी जानकारी है कि मां दुर्गा की प्रतिमा निर्माण के लिए वैश्यालय की मिट्टी अनिवार्य है. सुनने में थोड़ा अजीब है, लेकिन यह सत्य है कि बिना वैश्यालय की मिट्टी के दुर्गा मां की प्रतिमा का निर्माण अधूरा है.
मां दुर्गा की मूर्ति बनने में इन चीज़ों का प्रयोग
दुर्गा पूजा में आराधना के लिए बनने वाली विशेष दुर्गा मूर्ति बनाने में चार वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है. पहली गंगा तट की मिट्टी, गौमूत्र, गोबर और वेश्यालय की मिट्टी या किसी ऐसे स्थान की मिट्टी जहां जाना निषेध हो.
कैसे बनती है दुर्गा मां की मूर्ति
यह सवाल उठना जायज़ है कि जब हिंदू संस्कृति में वेश्यावृत्ति को अधार्मिक माना जाता है और देह व्यापार करने वालों को घृणा की नजर से देखा जाता है. तो इतने पवित्र अनुष्ठान में उनके घर के सामने पड़ी मिट्टी का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है. इसका जवाब मिलता है वहां प्रचलित पौराणिक तथा लोक कथाओं में.
कहते हैं कि बहुत पहले एक वेश्या, देवी दुर्गा की बहुत बड़ी उपासक हुआ करती थी. लेकिन वेश्या होने के कारण समाज में उसे सम्मान प्राप्त नहीं था. समाज से बहिष्कृत उस वेश्या को तरह-तरह की यातनाओं का सामना करना पड़ता था.
मान्यता है कि अपनी भक्त को इसी तिरस्कार से बचाने के लिए दुर्गा ने स्वयं आदेश देकर उसके आंगन की मिट्टी से अपनी मूर्ति स्थापित करवाने की परंपरा शुरू करवाई थी. साथ ही, देवी ने उसे वरदान भी दिया था कि उसके यहां की मिट्टी के उपयोग के बिना मां दुर्गा की मूर्ति पूरी नहीं होंगी. जानकारों के मुताबिक शारदा तिलकम, महामंत्र महार्णव, मंत्रमहोदधि आदि ग्रंथों में इसकी पुष्टि की गई है.
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मां दुर्गा की मूर्ति निर्माण को लेकर अन्णाय धारणाएं
इसके अतिरिक्त इस मिट्टी के इस्तेमाल के पीछे एक और धारणा भी है. माना जाता है कि जब कोई व्यक्ति किसी वेश्यालय के अंदर जाता है तो वह अपनी सारी पवित्रता वेश्यालय की चौखट के बाहर ही छोड़ देता है और इसलिए चौखट के बाहर की मिट्टी पवित्र हो जाती है. शायद इसको लेकर यह सबसे प्रचलित और लोकप्रिय धारणा है. हालांकि इसे हमेशा ही पुरुष प्रधान समाज द्वारा नारी के अपमान के तौर पर देखा जाता रहा है.
एक समाज सुधार प्रक्रिया
उधर, कुछ लोग इस प्रक्रिया को एक समाज सुधार आंदोलन के रूप में भी देखते हैं. इन लोगों का मानना है कि मां दुर्गा की मूर्तियों के निर्माण में वेश्यालय की मिट्टी के इस्तेमाल का मकसद उस पितृसत्तामक समाज के मानस को कचोटना भी है जिसकी वजह से महिलाओं को नर्क में धकेलने वाला यह कारोबार चलता है.
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