निर्जला एकादशी 2018 : एकादशियों में सबसे श्रेष्ठ है ये एकादशी का उपवास

- 23 जून 2018, शनिवार को है
- निर्जला एकादशी व्रत का पारण करने का समय
- निर्जला एकादशी व्रत का पारण 24 जून 2018, रविवार को 13:46 से 16:32 बजे तक किया जाएगा।
- व्रत पारण तिथि के दिन हरी वासर समाप्त होने का समय 10:08 बजे है।
- एकादशी तिथि का प्रारंभ 23 जून 2018 को 03:19 बजे से होगा।
- एकादशी तिथि का समापन 24 जून 2018 को 03:52 बजे होगा।
हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं। लेकिन अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती है। सभी एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान विष्णु की पूजा करते हैं व उपवास रखते हैं। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने, पूजा और दान करने से व्रती जीवन में सुख-समृद्धि का भोग करते हुए अंत समय में मोक्ष को प्राप्त होता है। लेकिन इन सभी एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी है जिसमें व्रत रखकर साल भर की एकादशियों जितना पुण्य कमाया जा सकता है। यह है ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी। इसे निर्जला एकादशी कहा जाता है। आइये जानते हैं कैसे है यह अन्य एकादशियों से श्रेष्ठ और क्यों कहते हैं इसे निर्जला एकादशी।
निर्जला एकादशी की पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत के संदर्भ में निर्जला एकादशी की कथा मिलती जो इस प्रकार है। हुआ यूं कि सभी पांडवों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्ति के लिये महर्षि वेदव्यास ने एकादशी व्रत का संकल्प करवाया। अब माता कुंती और द्रोपदी सहित सभी एकादशी का व्रत रखते लेकिन भीम जो कि गदा चलाने और खाना खाने के मामले में काफी प्रसिद्ध थे। कहने का मतलब है कि भीम बहुत ही विशालकाय और ताकतवर तो थे लेकिन उन्हें भूख बहुत लगती थी। उनकी भूख बर्दाश्त के बाहर होती थी इसलिये उनके लिये महीने में दो दिन उपवास करना बहुत कठिन था। जब पूरे परिवार का उन पर व्रत के लिये दबाव पड़ने लगा तो वे इसकी युक्ति ढूंढने लगे कि उन्हें भूखा भी न रहने पड़े और उपवास का पुण्य भी मिल जाये। अपने उदर पर आयी इस विपत्ति का समाधान भी उन्होंने महर्षि वेदव्यास से ही जाना। भीम पूछने लगे हे पितामह मेरे परिवार के सभी सदस्य एकादशी का उपवास रखते हैं और मुझ पर भी दबाव बनाते हैं लेकिन मैं धर्म-कर्म, पूजा-पाठ, दानादि कर सकता हूं लेकिन उपवास रखना मेरे सामर्थ्य की बात नहीं हैं। मेरे पेट के अंदर वृक नामक जठराग्नि है जिसे शांत करने के लिये मुझे अत्यधिक भोजन की आवश्यकता होती है अत: मैं भोजन के बिना नहीं रह सकता। तब व्यास जी ने कहा, भीम यदि तुम स्वर्ग और नरक में यकीन रखते हो तो तुम्हारे लिये भी यह व्रत करना आवश्यक है। इस पर भीम की चिंता और भी बढ़ गई, उसने व्यास जी कहा, हे महर्षि कोई ऐसा उपवास बताने की कृपा करें जिसे साल में एक बार रखने पर ही मोक्ष की प्राप्ति हो। इस पर महर्षि वेदव्यास ने गदाधारी भीम को कहा कि हे वत्स यह उपवास है तो बड़ा ही कठिन लेकिन इसे रखने से तुम्हें सभी एकादशियों के उपवास का फल प्राप्त हो जायेगा। उन्होंने कहा कि इस उपवास के पुण्य के बारे में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने मुझे बताया है। तुम ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का उपवास करो। इसमें आचमन व स्नान के अलावा जल भी ग्रहण नहीं किया जा सकता। अत: एकादशी के तिथि पर निर्जला उपवास रखकर भगवान केशव यानि श्री हरि की पूजा करना और अगले दिन स्नानादि कर ब्रहाम्ण को दान-दक्षिणा देकर, भोजन करवाकर फिर स्वयं भोजन करना। इस प्रकार तुम्हें केवल एक दिन के उपवास से ही साल भर के उपवासों जितना पुण्य मिलेगा। महर्षि वेदव्यास के बताने पर भीम ने यही उपवास रखा और मोक्ष की प्राप्ति की।
भीम द्वारा उपवास रखे जाने के कारण ही निर्जला एकादशी को भीमसेन एकादशी और चूंकि पांडवों ने भी इस दिन का उपवास रखा तो इस कारण इसे पांडव एकादशी भी कहा जाता है।
क्यों हैं निर्जला एकादशी व्रत है कठिन
जैसा कि महर्षि वेदव्यास ने भीम को बताया था एकादशी का यह उपवास निर्जला रहकर करना होता है इसलिये इसे रखना बहुत कठिन होता है। क्योंकि एक तो इसमें पानी तक पीने की मनाही होती है दूसरा एकादशी के उपवास को द्वादशी के दिन सूर्योदय के पश्चात खोला जाता है। अत: इसकी समयावधि भी काफी लंबी हो जाती है।
निर्जला एकादशी पूजा विधि
सभी व्रत, उपवासों मनें निर्जला एकादशी को सबसे श्रेष्ठ माना जाता है इसलिये पूरे यत्न के साथ इस व्रत को करना चाहिये। व्रत करने से पहले भगवान से प्रार्थना करनी चाहिये कि प्रभु आपकी दया दृष्टि मुझ पर बनी रहे, मेरे समस्त पाप नष्ट हों। निर्जला एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करें और एकादशी के सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक अन्न व जल का त्याग करें। अन्न, वस्त्र, जूती आदि का अपनी क्षमतानुसार दान कर सकते हैं। जल से भरे घड़े को भी वस्त्र से ढककर उसका दान भी किया जाता है व साथ में क्षमतानुसार स्वर्ण भी दिया जाता है। ब्राह्मणों अथवा किसी गरीब व जरुरतमंद को मिष्ठान व दक्षिणा भी देनी चाहिये। इस दिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का उच्चारण भी करना चाहिये। साथ ही निर्जला एकादशी की कथा भी पढ़नी या सुननी चाहिये। द्वादशी के सूर्योदय के बाद विधिपूर्वक ब्राह्मण को भोजन करवाकर तत्पश्चात अन्न व जल ग्रहण करें। व्रती को ध्यान रखना चाहिये कि गलती से भी स्नान व आचमन के अलावा जल ग्रहण न हों। आचमन में भी नाममात्र जल ही ग्रहण करना चाहिये।
निर्जला एकादशी 2018 तिथि व मुहूर्तइस वर्ष 2018 में निर्जला एकादशी 23 जून (शनिवार)को है।एकादशी तिथि – 23 जून 2018
पारण का समय – 13:46 से 16:32 बजे तक (24 जून 2018)एकादशी तिथि आरंभ – 03:19 बजे (23 जून 2018)एकादशी तिथि समाप्त – 03:52 बजे (24 जून 2018)
निर्जला एकादशी व्रत के लाभ
माना जाता है जो व्यक्ति सभी 24 एकादशियों का व्रत करने में सक्षम नहीं होते वे केवल निर्जला एकादशी का व्रत करते है। माना जाता है साल भर की सभी 24 एकादशियों के व्रत का फल केवल एक निर्जला एकादशी व्रत करने से मिल जाता है। इसीलिए यह व्रत बहुत कठिन होता है।
निर्जला एकादशी कब आती है?
भीम एकादशी या निर्जला एकादशी का व्रत ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को किया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से निर्जला एकादशी मई या जून के महीने में आती है। सामान्य तौर पर यह व्रत गंगा दशहरा के अगले दिन पड़ता है। लेकिन कई बार गंगा दशहरा और निर्जला एकादशी एक ही दिन पड़ जाती है।
23 जून 2018, शनिवार को है।निर्जला एकादशी व्रत का पारण करने का समयनिर्जला एकादशी व्रत का पारण 24 जून 2018, रविवार को 13:46 से 16:32 बजे तक किया जाएगा।व्रत पारण तिथि के दिन हरी वासर समाप्त होने का समय 10:08 बजे है।एकादशी तिथि का प्रारंभ 23 जून 2018 को 03:19 बजे से होगा।एकादशी तिथि का समापन 24 जून 2018 को 03:52 बजे होगा।
जानिए निर्जला एकादशी व्रत के नियम
भीम एकादशी / निर्जला एकादशी का व्रत पूरी तरह निराहार और निर्जला रखा जाता है। इस व्रत में कुछ भी खाया पीया (यहाँ तक की पानी भी पीया) नहीं जाता। इसीलिए यह व्रत बहुत कठिन होता है। निर्जला एकादशी व्रत ज्येष्ठ माह में किया जाता है जब भयंकर गर्मी पड़ती है। और इस व्रत में पानी भी नहीं पीया जाता। इसलिए भी यह व्रत मुश्किल माना जाता है। इस व्रत को 24 घंटों से भी अधिक देर तक रखा जाता है यानी यह व्रत एकादशी तिथि के प्रारंभ होने के साथ ही प्रारंभ होता है और द्वादशी तिथि के प्रारंभ होने पर समाप्त होता है। निर्जला एकादशी व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि को सूर्योदय के पश्चात् खोला जाती है। जिसके कारण इस व्रत की अवधि काफी लंबी हो जाती है।
क्या करें दान निर्जला एकादशी पर
इस व्रत में अपनी सामर्थ्यानुसार अन्न, जल, वस्त्र, छतरी, जल से भरा मिट्टी का कलश, सुराही तथा किसी भी धातु से बना जल का पात्र, हाथ का पंखा, बिजली का पंखा, शर्बत की बोतलें, आम, खरबूजा, तरबूज तथा अन्य मौसम के फल आदि का दान दक्षिणा सहित देने का शास्त्रानुसार विधान है।
इसके अतिरिक्त राहगीरों के लिए किसी भी सार्वजनिक स्थान पर ठंडे एवं मीठे जल की छबील, प्याऊ लगाना तथा लंगर आदि लगाना अति पुण्यफलदायक है। व्रत का पारण ब्राह्मणों को यथाशक्ति मिठाई, अन्न, वस्त्र, स्वर्ण, चप्पल व गाय आदि वस्तुएं दक्षिणा सहित दान देने के पश्चात ही किया जाना चाहिए। यह व्रत इस बार सोमवार को है इसलिए सफेद वस्तुओं का दान करना अति उत्तम है।
जानिए निर्जला एकादशी के पुण्यफल
पद्मपुराण के अनुसार निर्जला एकादशी व्रत के प्रभाव से जहां मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं वहीं अनेक रोगों की निवृत्ति एवं सुख सौभाग्य में वृद्घि होती है। इस व्रत के प्रभाव से चतुर्दशीयुक्त अमावस्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्घ करके मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है वही फल इस व्रत की महिमा सुनकर मनुष्य पा लेता है।
हालांकि व्रत करने वाले साधक के लिए जल का सेवन करना निषेध है परंतु इस दिन मीठे जल का वितरण करना सर्वाधिक पुण्यकारी है। भीषण गर्मी में प्यासे लोगों को जल पिलाकर व्रती अपने संयम की परीक्षा देता है अर्थात व्रती अभाव में नहीं बल्कि दूसरों को देकर स्वयं प्रसन्नता की अनुभूति करता है तथा उसमें परोपकार की भावना पैदा होती है। इस प्रकार भारी मात्रा में जल का वितरण करने पर भी वह अपनी भावनाओं पर पूरा संयम रखता है।
यह व्रत सभी पापों का नाश करने वाला तथा मन में जल संरक्षण की भावना को उजागर करता है। व्रत से जल की वास्तविक अहमियत का भी पता चलता है। मनुष्य अपने अनुभवों से ही बहुत कुछ सीखता है,यही कारण है कि व्रत का विधान जल का महत्व बताने के लिए ही धर्म के माध्यम से जुड़ा हुआ है।
क्या कहते हैं विद्वान
भगवान को एकादशी तिथि अति प्रिय है चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष की। इसी कारण इस दिन व्रत करने वाले भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा सदा बनी रहती है। उन्होंने कहा कि दशमी को एकाहार, एकादशी में निर्जल एवं निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करने का विधान है तथा कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं होता जब तक उसका विधिवत पारण न किया जाए।
पंडित दयानन्द शास्त्री
(ज्योतिष-वास्तु सलाहकार)
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