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मथुरा ही नहीं इस राज्य की होली भी है वर्ल्ड फेमस…देखिये यहाँ का अनोखा रंगोत्सव

मथुरा ही नहीं इस राज्य की होली भी है वर्ल्ड फेमस…देखिये यहाँ का अनोखा रंगोत्सव

मथुरा ही नहीं इस राज्य की होली भी है वर्ल्ड फेमस…देखिये यहाँ का अनोखा रंगोत्सव
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मथुरा ही नहीं इस राज्य की होली भी है वर्ल्ड फेमस…देखिये यहाँ का अनोखा रंगोत्सव

मथुरा ही नहीं इस राज्य की होली भी है वर्ल्ड फेमस….देखिये यहाँ का अनोखा रंगोत्सव

यह बात तो पूरा विश्व जानता है कि भारत दुनिया का एक्मतरे ऐसा देश है…जहाँ कदम कदम पर भिन्नता नज़र आती है. “कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी” ऐसा सिर्फ हमारे देश में ही संभव है. यहाँ की सिर्फ भाषा ही नहीं बल्कि रहन सहन, आचार विचार सभी इन्द्रधनुषी रंगों से सराबोर है और इन इन्द्रधनुषी रंगों से आप सराबोर होना चाहते हैं तो होली से बेहतर कोई त्यौहार आपको नहीं मिलेगा. जो आपको यहाँ की रंगीनियत और रूमानियत से परिचय करवाएगा.   

वैसे तो पूरे भारत में होली मनाने के कई तरीके हैं. आपने मथुरा या ब्रज की होली के बारे में तो सुना ही होगा लेकिन एक राज्य ऐसा भी है जहाँ होली खेलने का अंदाज़ ही कुछ निराला है. जी हाँ हम बात कर रहे हैं राजस्थान की. तो चलिए एक नजर डालते हैं राजस्थान में होली के तरीकों पर-

भरतपुर से आया ब्रज की लट्ठमार होली का चलन 


जब बात ब्रज की चली रही है तो हम शुरुआत करते हैं राजस्थान के भरतपुर की. भरतपुर के ब्रजांचल में फाल्गुन का आगमन कोई साधारण बात नहीं है. यहां की युवतियां भी फाल्गुन के आगमन पर  “सखी री भागन ते फागुन आयौ, मैं तो खेलूंगी श्याम संग फाग.” गा उठती हैं.  गांव की चौपालों पर ब्रजवासी ग्रामीण अपने लोकवाद्य “बम” के साथ अपने ढप, ढोल और झांझ बजाते हुए रसिया गाते हैं. डीग क्षेत्र ब्रज का हृदय है, यहां की ग्रामीण महिलाएं अपने सिर पर भारी भरकम चरकुला रखकर उस पर जलते दीपकों के साथ नृत्य करती हैं. संपूर्ण ब्रज में इस तरह आनंद की अमृत वर्षा होती है. यह परंपरा ब्रज की धरोहर है. रियासती जमाने में भरतपुर के ब्रज अनुरागी राजाओं ने यहां सर्वसाधारण जनता के सामने स्वांगों की परंपरा को संरक्षण दिया. दामोदर जैसे गायकों के रसिक आज भी भरतपुर के लोगों की जबान पर हैं जिनमें शृंगार के साथ ही अध्यात्म की धारा बहती थी. बरसाना, नंदगांव, कामां, डीग आदि स्थानों पर ब्रज की लट्ठमार होली की परंपरा आज भी यहां की संस्कृति को पुष्ट करती है. चैत्र कृष्ण द्वितीया को दाऊजी का हुरंगा भी प्रसिद्ध है.

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ब्रह्मा जी की नगरी की ‘कपड़ा फाड़’ होली

यूं तो राजस्थान में होली के त्यौहार पर अलग अलग रंग देखने को मिलते हैं, लेकिन ब्रहृमानगरी यानि  पुष्कर में होली का खुमार कुछ अलग हटकर ही छाता है. इस खुमार से न तो देशी और न हीं विदेशी बच पाते हैं. इसका अंदाज ही अलग तरह का है. पुष्कर की ‘कपड़ा फाड़’ होली ने देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपनी धाक जमा ली है. इसके चलते महीने भर पहले से ही पुष्कर में विदेशी पर्यटकों का जमावड़ा लगना शुरू हो जाता है. पुष्कर की ‘कपड़ा फाड़’ होली धीरे-धीरे एक ग्लोबल इवेंट के रूप में अपनी पहचान बना रही है. यहां विदेशी सैलानियों के साथ स्थानीय और देशी पर्यटक बड़ी धूमधाम के साथ होली खेलते हैं और एक दूसरे के कपड़े भी फाड़ते हैं. हालांकि इस दरमयान आज तक कभी कोई अप्रिय घटना देखने को नहीं मिली हैं क्योंकि पुलिस प्रशासन की निगरानी में ही इस तरह का खेल खेला जाता रहा है.

पाली का गेर नृत्य  


पाली के ग्रामीण इलाकों में फाल्गुन लगते ही गेर नृत्य शुरू हो जाता है. वहीं यह नृत्य डंका पंचमी से भी शुरू होता है. फाल्गुन के पूरे महीने रात में चौहटों पर ढोल और चंग की थाप पर गेर नृत्य किया जाता है. मारवाड गोडवाड इलाके में डांडी गैर नृत्य बहुत होता है और यह नृत्य इस इलाके में ख़ासा लोकप्रिय है. यहां फाग गीत के साथ गालियां भी गाई जाती हैं.

मेवाड़ की होली में मुर्दे की सवारी


सुनकर थोडा अचम्भा ज़रूर हो रहा होगा. मेवाड़ अंचल के भीलवाड़ा ज़िले के बरून्दनी गांव में होली के सात दिन बाद शीतला सप्तमी पर खेली जाने वाली लट्ठमार होली का अपना एक अलग ही मजा रहा है. माहेश्वरी समाज के स्त्री-पुरुष यह होली खेलते हैं. डोलचियों में पानी भरकर पुरुष महिलाओं पर डालते हैं और महिलाएं लाठियों से उन्हें पीटती हैं. पिछले पांच साल से यह परंपरा कम ही देखने को मिलती है. यहां होली के बाद बादशाह की सवारी निकाली जाती है, वहीं शीतला सप्तमी पर चित्तौड़गढ़ वालों की हवेली से मुर्दे की सवारी निकाली जाती है. इसमें लकड़ी की सीढ़ी बनाई जाती है और जिंदा व्यक्ति को उस पर लिटाकर अर्थी पूरे बाज़ार में निकालते हैं. इस दौरान युवा इस अर्थी को लेकर पूरे शहर में घूमते हैं. लोग इन्हें रंगों से नहला देते हैं.

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शेखावाटी में चंग-गींदड


फाल्गुन शुरू होते ही शेखावाटी में होली का हुडदंग शुरू हो जाता है. हर मोहल्ले में चंग पार्टी होती है. होली के एक पखवाडे पहले गींदड शुरू हो जाता है. जगह- जगह भांग घुटती है. हालांकि अब ये नजारे कम ही देखने को मिलते हैं. जबकि, शेखावाटी में ढूंढ का चलन भी है. परिवार में बच्चे के जन्म होने पर उसका ननिहाल पक्ष और बुआ कपड़े और खिलौने होली पर बच्चे को देते हैं.

बीकानेर में तणी काटने की प्रतियोगिता


बीकानेर क्षेत्र में भी होली मनाने का ख़ास अंदाज है. यहां रम्मतें, अनूठे फागणियां, फुटबाल मैच, तणी काटने और पानी डोलची का खेल होली के दिन के ख़ास आयोजन हैं. रम्मतों में खुले मंच पर विभिन्न कथानकों और किरदारों का अभिनय होता है. रम्मतों में शामिल होता है हास्य, अभिनय, होली ठिठोली, मौजमस्ती और साथ ही एक संदेश.

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श्रीगंगानगर की कोड़े वाली होली


श्रीगंगानगर में भी होली मनाने का ख़ास अंदाज है. यहां देवर-भाभी के बीच कोड़े वाली होली काफी चर्चित रही है. होली पर देवर- भाभी को रंगने का प्रयास करते हैं और भाभी-देवर की पीठ पर कोड़े मारती है. इस मौके पर देवर- भाभी से नेग भी मांगते हैं.

भीलों की अनोखी होली


राजस्थान और मध्य प्रदेश में रहने वाले भील आदिवासियों के लिए होली विशेष होती है. वयस्‍क होते लड़कों को इस दिन अपना मनपसंद जीवनसाथी चुनने की छूट होती है. भीलों का होली मनाने का तरीका विशिष्‍ट है. इस दिन वो आम की मंजरियों, टेसू के फूल और गेहूँ की बालियों की पूजा करते हैं और नए जीवन की शुरुआत के लिए प्रार्थना करते हैं.

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By Shweta February 28, 2018 6 min read
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