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ओणम 2020: जानिए क्यूँ कहलाता है ओणम पारम्परिक उत्सव

ओणम 2020: जानिए क्यूँ कहलाता है ओणम पारम्परिक उत्सव

ओणम 2020: जानिए क्यूँ कहलाता है ओणम पारम्परिक उत्सव
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ओणम 2020: जानिए क्यूँ कहलाता है ओणम पारम्परिक उत्सव

ओणम दक्षिण भारत में मुख्यतः केरल का सबसे प्राचीन और पारंपरिक उत्सव है. जिस तरह देशभर में दशहरा, दुर्गापूजा और गणेशोत्सव दस दिनों तक बड़ी धूम धाम से मनाए जाते हैं उसी तरह केरल में दस दिवसीय ओणम पर्व बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है.



ओणम का महत्व

यह विशेषतः एक मलयाली त्यौहार है जो मलयालम भाषी लोगों के द्वारा मुख्य रूप से मनाया जाता है. ओणम का दिन सौर कैलेण्डर पर आधारित होता है. यह  पर्व मलयालम सौर कैलेण्डर के चिंगम माह में मनाया जाता है.

चिंगम माह अन्य सौर कैलेण्डरों में सिंह माह तथा तमिल कैलेण्डर में अवनी माह के नाम से जाना जाता है. चिंगम माह में जिस दिन थिरुवोणम नक्षत्र प्रबल होता है, उस ही दिन ओणम पर्व मनाया जाता है. थिरुवोणम नक्षत्र अन्य भारतीय पञ्चाङ्गों में श्रवण नक्षत्र के नाम से जाना जाता है.

भगवान विष्णु के वामन रूप में अवतार लेने और महान सम्राट महाबलि के धरती पर पुनः आगमन के उपलक्ष्य में ओणम का पर्व मनाया जाता है.

जिस दिन अथम नक्षत्र प्रबल होता है, ओणम का उत्सव उस दिन से आरम्भ होता है और 10 दिन तक अर्थात थिरुवोणम तक जारी रहता है. अथम नक्षत्र को अन्य हिन्दु पञ्चाङ्गों में हस्त नक्षत्र के नाम से जाना जाता है.

ओणम किसानों का महत्वपूर्ण पर्व

भारत एक कृषि प्रधान देश है. देश की कुल जनसंख्या का 60 प्रतिशत आबादी इसी क्षेत्र में कार्यरत है और अपना जीवन यापन कर रहा है. ओणम पर्व का कृषि और किसानों से गहरा संबंध है. यह पर्व ऐसे समय पर मनाया जाता है, जब दक्षिण भारत में फसलें पककर तैयार होती हैं. इन फसलों में चाय, इलायची, अदरक और धान जैसी अन्य फसलें शामिल हैं. जो जनमानस में एक नई उम्मीद और बेहतर कल का निर्माण करने में अहम भूमिका निभाती हैं. फसलों की सुरक्षा और अपनी इच्छाओं की पूर्ति की कामना के लिये लोग ओणम के दिन श्रावण देवता और पुष्पदेवी की आराधना करते हैं. हालांकि इस पर्व की तैयारियां दस दिन पहले से ही शुरु हो जाती हैं.

यह भी पढ़ें-10 Days of Onam Celebrations : Know importance of each day

ओणम से जुड़ी पौराणिक मान्यता

ऐसी पौराणिक मान्यता है कि एक समय में महाबली नाम का असुर राजा हुआ करता था. वह अपनी प्रजा के लिये किसी देवता से कम नहीं था. अन्य असुरों की तरह वह तपोबल से कई दिव्य शक्तियाँ हासिल कर देवताओं के लिये मुसीबत बन गया. शक्ति अपने साथ अंहकार भी लेकर आती है.

देवताओं में किसी के भी पास महाबली को परास्त करने का सामर्थ्य नहीं था. राजा महाबली ने देवराज इंद्र को हराकर स्वर्गलोक पर अपना अधिकार कर लिया. पराजित इंद्र की स्थिति देखकर देव माता अदिति ने अपने पुत्र के उद्धार के लिए विष्णु की आराधना की.

आराधना से प्रसन्न होकर श्री हरि प्रकट हुए और बोले- देवी! आप चिंता न करें. मैं आपके पुत्र के रूप में जन्म लेकर इंद्र को उसका खोया राजपाट पुनः दिलाऊंगा. कुछ समय बाद माता अदिति के गर्भ से वामन के रूप में भगवान विष्णु ने अवतार लिया. उनके ब्रह्मचारी रूप को देखकर सभी देव और ऋषि-मुनि आनंदित हो उठे.

श्री विष्णु ने लिया वामन अवतार

वहीं राजा महाबली स्वर्ग पर स्थायी अधिकार प्राप्त करने के लिए अश्वमेध यज्ञ करा रहे थे. यह जानकर वामन रूप धरे श्रीहरि वहां पहुंचे. उनके तेज से यज्ञशाला प्रकाशमय हो गई. महाबली ने उन्हें एक उत्तम आसन पर बिठाकर उनका सत्कार किया और अंत में उनसे भेंट मांगने के लिए कहा.

तब वामन रूप में अवतरित भगवान विष्णु ने महाबली से तीन कदम रखने के लिये जगह मांगी. जिसे महाबली ने स्वीकार कर लिया. वामन ने अपने एक कदम में भू लोक तो दूसरे कदम में आकाश को नाप लिया अब महाबली का वचन पूरा कैसे हो? तब उन्होंने वचन को पूरा करने के लिये वामन के समक्ष अपना सिर झुका दिया.

वामन के कदम रखते ही महाबली पाताल लोक चले गये. जब प्रजा तक यह सूचना पंहुची तो हाहाकार मच गया. प्रजा का उनके प्रति अगाध स्नेह देखकर भगवान विष्णु ने महाबली को वरदान दिया कि वे वर्ष में एक बार तीन दिनों तक अपनी प्रजा से मिलने आ सकेंगें.



माना जाता है कि तब से लेकर अब तक ओणम के अवसर पर महाबली केरल के हर घर में प्रजाजनों का हाल-चाल लेने आते हैं और उनके कष्टों को दूर करते हैं.

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By Shweta August 30, 2020 4 min read
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