शांतिकुंज से ऑनलाइन चांद्रायण साधना की सुविधा गुरुपूर्णिमा से शुरू

हरिद्वार 26 जुलाई : उत्तराखंड की धर्मनगरी हरिद्वार स्थित शांतिकुंज 27 जुलाई से ऑनलाइन चांद्रायण साधना की सुविधा शुरू करने जा रहा है। इंटरनेट और सोशल मिडिया के माध्यम से देश-विदेश में बैठा कोई भी साधक अपनी साधना पूरी कर सकता है। शास्त्रों के अनुसार, तपश्चर्या से तपस्वी में एक नयी परम सात्विक अग्रि पैदा होती है, जिसे दैवी विद्युत शक्ति, आत्मतेज, तपोबल आदि नामों से जाना जाता है। इस बल से अन्त:करण में छिपी हुई सुप्त शक्तियाँ जागृत होती हैं, दिव्य सद्गुणों का विकास होता है। पूर्वकृत पापों को गलाना, बदलना और जलना सम्भव है। कुसंस्कार, कुविचार, कुटेव, कुकर्म से छुटकारा मिलता है तथा स्फूर्ति, उत्साह, साहस, धैर्य, दूरदर्शिता, संयम, सन्मार्ग में प्रवृत्ति आदि अनेक गुणों की विशेषता प्रत्यक्ष परिलक्षित होने लगती है।
आयुर्वेद में शरीर के बाह्यांतर परिष्कार करने के लिये कल्प चिकित्सा का विवरण पढऩे में आता है वैसे ही अध्यात्म के क्षेत्र में चेतनात्मक काया-कल्प चिकित्सा के रूप में चान्द्रायण साधना का उल्लेख है। वमन, विरेचन, स्वेदन की तरह ही इस कठोर आध्यात्मिक अभ्यास में व्रत, तप, कल्प आदि के माध्यम से आत्म परिष्कार से आत्म साक्षात्कार तक की यात्रा पूरी की जाती है।
कल्प साधना वस्तुत: उपवास प्रधान है। इसका एक स्वरूप चान्द्रायण साधना के रूप में देखने को मिलता है। साधना में मन का सात्विक होना आवश्यक है। मन को शान्त, स्थिर एवं सात्विक बनाने के लिये उपवास पर, अन्न की सात्विकता पर ध्यान देना आवश्यक है। पूण कल्प साधना एक महीने की होती है एवं अनभ्यस्त व्यक्तियों के लिये दस की लघु साधना होती है। समय के अंतर के अतिरिक्त अनुशासन-विधान दोनों में एक से ही होते हैं। चान्द्रायण का सर्वविदित नियम-अनुशासन पूर्णिमा से अमावस्या से भोजन घटाने और तदुपरांत अगली पूर्णिमा तक क्रमश: बढ़ाते हुये नियत मात्रा तक ले पहुँचना है। आहार साधना के अतिरिक्त तप-तितिक्षा में प्रायश्चित की चर्चा की जाती है। बिना अपना मन-अंत:करण धोये साधना बाह्योपचार मात्र रह जाती है। इस प्रक्रिया से व्यक्तित्व धुल-पुँछ जाता है और साफ धुले कपड़े पर ही कोई और रंग चढ़ाया जा सकता है, इसी प्रकार व्यक्ति के व्यक्तित्व का परिष्कार करने के पश्चात् ही आध्यात्मिक प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ा जा सकता है और जीवन में समग्र विकास की बात सोची जा सकती है।
गंगा की गोद और हिमालय की छाया में बसे शांतिकुंज में हर साल नवरात्रि साधना के लिए लगभग २० हजार साधक ही आ पाते हैं. ऐसे में करोड़ों साधक इस महान साधना से वंचित रह जाते हैं, इसलिए इस नए प्रयोग ‘ऑनलाइन साधना’ से जुड़कर कोई भी साधक अपनी साधना पूरी करने से वंचित नहीं रह पाएगा.
शांतिकुंज के युवा प्रकोष्ठ के अनुसार अब तक २४०० से अधिक साधको ने, अब तक १२ से अधिक देशों के साधकों ने ऑनलाइन फॉर्म जमा कराया है. प्रगतिशील देशों के साथ भारत के दूरदराज गांवों में बसे साधकों ने भी इस अनूठे प्रयोग में काफी उत्साह दिखाया है. इसके अलावा गायत्री परिवार के संस्थापक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के विचारों व संदेशों पर आधारित वीडियो ‘साधना में सफलता’ का प्रसारण होगा. साथ ही साधकों के पंचकोशों के जागरण के लिए विशेष साधना हर रोज सुबह ५ बजे पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के मुख से कराई जाएगी. दोपहर में ज्योति अवधारण साधना मां भगवती देवी शर्मा के निर्देशन में तथा सायंकाल बांसुरी की धुन पर नादयोग साधना होगी. साधकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण इस साधना में वह समय खास होगा, जब वे १९२६ से जल रही अखंड दीप के लाइव दर्शन कर सकेंगे.
अमेरिका के न्यू जर्सी शहर के विपुल पटेल ने ऑनलाइन साधना के बारे में कहा, ‘अब हम गंगा की गोद और हिमालय की छाया में बस शांतिकुंज के साक्षात दर्शन अमेरिका में बैठे-बैठे कर सकेंगे. पटेल के अनुसार, अमेरिका की भागमभाग वाली जिंदगी में अब प्रवासी भारतीयों की सुबह से ही आध्यात्मिकता का बोध कराने वाली दिनचर्या शुरू होगी।
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