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“भद्रा” “सूतक” “ग्रहण” का रक्षाबंधन पर प्रभाव : वैदिक यात्रा परिवार

“भद्रा” “सूतक” “ग्रहण” का रक्षाबंधन पर प्रभाव : वैदिक यात्रा परिवार

“भद्रा” “सूतक” “ग्रहण” का रक्षाबंधन पर प्रभाव : वैदिक यात्रा परिवार
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“भद्रा” “सूतक” “ग्रहण” का रक्षाबंधन पर प्रभाव : वैदिक यात्रा परिवार

॥वेदोऽखिलो धर्ममूलम्॥
॥जयतु भागवतं भवनाशनम्॥

रक्षाबंधन “भद्रा” “सूतक” “ग्रहण” पर विचार-विमर्श

(१) प्रत्येक पूर्णिमा के “पूर्वार्द्ध” को “भद्रा” होती है। भद्रा में किया गया कार्य सिद्ध नहीं होता है, इसलिए भद्रा में मांगलिक कार्यों के साथ-२ रक्षा बंधन का भी निषेध किया गया है। इस बार तो रक्षाबंधन में भद्रा के साथ चन्द्रग्रहण भी है। इस विषय में शास्त्रमत निम्न प्रकार है-

‘इदं रक्षाबंधन्धनं नियतकालत्वात भद्रावर्ज्य ग्रहणदिनेपि कार्ये होलिकावत्।
ग्रहसंक्रान्त्यादौ रक्षानिषेधाभावात्। सर्वेषामेव वर्णानां सूतकं राहुदर्शने॥’
इति तत्कालमात्रनिषेधाच्च । (निर्णय सिन्धु, पृष्ठ संख्या १८०)

इसी निर्णय सिंधु के पृष्ठ संख्या १८० की ११वीं पंक्ति में लिखा है कि रक्षाबंधन नियत काल में होने से भद्रा को छोड़कर, ग्रहण के दिन भी होली के समान ही करना चाहिए। अर्थात् ग्रहण का सूतक अनियतकाल के कर्मों में लगता है जबकि रक्षाबंधन श्रावण सुदी पूर्णिमा को ही मनाया जाता है । अर्थात् उसी दिन मनाया जाता है ना पहले और ना बाद के दिन। इसलिए नियत कर्म होने के कारण इसको ग्रहण का दोष नहीं लगता है।

(२) अब बात रही भद्रा की, तो भद्रा चन्द्रमा की राशि के आधार पर तीन स्थानों पर रहती है- स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल। तीनों स्थानों पर भद्रा के अलग-२ फल होते हैं।

स्वर्गे भद्रा धनं धान्यं पाताले च धनागमः।
मृत्युलोके यदा भद्रा कार्यसिद्धिस्तदा नहि॥

जब भद्रा स्वर्ग लोक में होती है तब धन-धान्य प्रदान करती है, जब पाताल लोक में होती है तब धन आगमन का मार्ग प्रशस्त करती है। लेकिन; जब पृथ्वी लोक में होती है तब कार्य सिद्धि नहीं होती।

परन्तु; इस वर्ष रक्षाबंधन के दिन चन्द्रमा “मकर” राशि में होने के कारण भद्रा का वास पाताल में है और इस सम्बन्ध में शास्त्र का सुनिश्चित मत है कि भद्रा केवल तभी त्याज्य है जब “भद्रा” का वास “भूलोक” अर्थात् पृथ्वीलोक में हो। अत: इस बार पृथ्वीलोक पर भद्रा निषिद्ध नहीं है।

निष्कर्ष

१. भद्राविचार निष्कर्ष:-
इस बार रक्षाबंधन पर्व पर भद्रा का वास पाताल लोक में होने के कारण भद्रकाल में भी सून जिमाने में कोई दोष या निषेध नहीं है। रक्षाबंधन सूर्योदय के उपरांत अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं।

२. ग्रहण-सूतक विचार निष्कर्ष:-
निर्णय सिंधु के अनुसार रक्षाबंधन पर्व नियतकाल में होने के कारण यहाँ सूतक भी मान्य नहीं होगा। अत: सूतक में भी रक्षासूत्र बाँध सकते हैं।

उपरोक्त संदेश “वैदिक यात्रा शोध-केन्द्र” द्वारा प्रमाणित है अत: सभी वैदिक-पथिकों एवं सनातन प्रेमियों को सूचित किया जाता है कि रक्षाबंधन पर्व ७ अगस्त २०१७ को सूर्योदय के उपरान्त पूरे दिन ग्रहण काल से पूर्व तक मना सकते हैं। अफवाहों से दूर रहते हुए इस सनातन संदेश प्रवाह को रक्षाबंधन मनाने वाले सभी भाई-बहनों तक पहुँचा दें, जिससे अधिकांश लोग इस त्यौहार को आनंदपूर्वक मना सकें।

वैदिक यात्रा परिवार
वैदिक यात्रा गुरुकुल (भागवत विद्यालय)
श्री अमरनाथ धाम, श्री श्रीनाथ शास्त्री मार्ग, वृन्दावन

RW

Editorial Review Note

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By Religion World August 6, 2017 3 min read
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