“धर्म की राजनीति”
“धर्म की राजनीति” – वर्तमान में इन शब्दों का प्रयोग हम अपने देश में प्रायः सुना करते हैं, कभी नेताओं के भाषण में तो कभी लेखकों के लेख में या फिर पत्रकारों की पत्रकारिता अथवा समाचार में। प्रायः लोगो को कहते हुए सुनते हैं कि धर्म की राजनीती नहीं होनी चाहिए अर्थात राजनितिक स्वार्थों को साधने के लिए धर्म का प्रयोग नहीं होना चाहिए। यधपि, आज हम चर्चा ‘धर्म की राजनीति’ नहीं अपितु ‘धार्मिक-राजनीती’ पर करेंगे। धर्म की राजनीति के स्थान पर अगर धार्मिक-राजनिति हो, तो फिर दृश्य परिवर्तित हो जाते हैं। और ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि राजा अथवा राजनेता अपनी प्रजा की नज़र में एक आदर्श के रूप में होता है। और अगर वह आदर्श धार्मिक गुणों (धैर्य, क्षमा, दम, अस्तेय, धी, विद्या, सत्य आदी धर्म के 10 गुण बताये गए हैं) से अलंकृत ना हो, तो प्रजा और राष्ट्र को पतन के मार्ग पर ले जाएगा। इसको समझने के लिए धर्म और राजनीति के मौलिक अन्तर को समझना होगा। राजनीति जीवों के सामाजिक विकास की बाह्य प्रकृति है। और धर्म मनुष्य की चेतना के विकास की अन्तः-प्रकृति है। राजनीति अन्य जीवों में भी पायी जाती है जैसे बन्दर, भेड़, कुत्ता, आकाश में उड़ने वाले पक्षी ये सब भी अपना मुखिया अथवा नेता चुनते हैं, परन्तु धर्म मनुष्य जाती का ही महत्वपूर्ण स्वभाव है। अगर हम धर्म और राजनीति दोनों को पृथक पृथक समझ जाएँ तो पता चलेगा धर्म की राजनीति संभव ही नहीं है। धर्म के नाम पर धार्मिक विकृतियाँ अथवा धार्मिक मान्यताओं और सम्प्रदाय की राजनीति ही हो सकती है लेकिन धर्म की राजनिति संभव नहीं है। परन्तु, धार्मिक-राजनीती संभव भी है और होनी भी चाहिए। सत्य तो यह है कि राजनीति और धर्म का सम्बन्ध तो लक्ष्मी-नारायण का सम्बन्ध है, जहां पर नारायण धर्म के प्रतीक हैं और लक्ष्मी जी धर्म-पालन करते हुए श्रीनारायण की चरण सेवा में लगी हैं, वह राजनीति के प्रतिक स्वरुप में हैं। दूसरा उदाहरण हम विद्युत के उपकरण का भी ले सकते हैं – जैसे विद्युत उपकरण को क्रियाशील करती है लेकिन उपकरण बिजली को नहीं। यह विद्युत धर्म स्वरुप है। राजनीति का सर्वोत्तम सदुपयोग धर्म-रक्षा एवं धर्म-पालना ही है अतः सर्वप्रथम राजा का धार्मिक गुण संपन्न होना अनिवार्य है, अन्यथा राजा फिर अपने राजनितिक स्वार्थों को साधने के लिए धर्म की राजनीति शुरू कर देता है । हमारे प्राचीन इतिहास में ऐसा ही एक प्रसंग मिलता है जो इस विषय को और भी स्पष्ट कर देता है।

शाक्य मुनि गौतम बुद्ध के जन्म के समय हीं यह भविष्यवाणी हो गई थी कि वह एक विश्व-स्तरीय महान सम्राट या फिर महान साधू बनेंगे | सत्य तो यह है कि महात्मा बुद्ध दोनों हीं बन गए साधू वह अपरोक्ष रूप से थे और सम्राट परोक्ष रूप से | महात्मा बुद्ध का धम्म-प्रचार उनके रहते हीं इतना विस्तारित हुआ कि बिना किसी राजनैतिक लक्ष्य के भी बुद्ध के धम्म ने राजनितिक रूप धारण कर लिया | उत्तर भारत के कई राजा अपने साम्राज्य के साथ बुद्ध के अनुयायी बन गए, अर्थात वह बुद्ध के दिए दिशा निर्देश से ही अपने राज-धर्म का पालन करते थे | मगध, कोसल, काशी, अंग, वैशाली, बंग, कलिंग और कौशाम्बी भी भगवान् बुद्ध के आध्यात्मिक आलोक से आलोकित एवं प्रेरित हो रहे थे | मगध नरेश बिम्बिसार एवं कोसल नरेश प्रसेनजीत तो बुद्ध के धम्म-पथ के उपासक बन गए थे | बुद्ध बिना किसी राजभवन के राज-गद्दी पर बैठे वन विहारों में कुश के आसन पर बैठ कर ही सभी राजाओं एवं उनकी प्रजा को राजधर्म-निर्देश देते थे | उनके अनुयायी राजा उनके निर्देशों का पालन किसी सम्राट की आज्ञा की भाँती ही करते थे बस अन्तर इतना था कि बुद्ध उनके ह्रदय के भी सम्राट थे | बुद्ध के शरण में कई राजा धार्मिक राजनीति की शिक्षा प्राप्त करते थे | वैदिक मतों के अनुसार भी राजाओं को धर्मोपदेश सुनना अनिवार्य था | समय बिता, और बिम्बिसार के हर्यक वंश के बाद शिशुनाग वंश और फिर नन्द वंश का समय आया नन्द वंश का नौवां राजा धननंद बहुत अत्याचारी और भोग-विलासी था | उसका आचरण धर्म-विरुद्ध एवं मानवता-विरुद्ध था | तब उसका विरोध मगध के आचार्यों ने अहिंसक रूप से किया | परन्तु हिंसा के पुजारी धननंद ने शस्त्र-बल से इस विरोध का दमन कर दिया | उस समय आचार्य चणक के पुत्र चाणक्य जो कि तक्षशीला विद्यापीठ के कुलपति भी हुए उन्होंने अपने भाषण-प्रवचन से राजा के विरुद्ध प्रजा को जागृत करना शुरू किया | उसी समय धननंद ने धर्म की राजनीति शुरू की | धननंद ने देखा कि उसका विरोध ब्राह्मण आचार्यों एवं गुरुकुल में रहने वाले ब्रह्मचारियों के द्वारा हीं किया जा रहा है | तब धननंद ने बौद्ध भिक्षुओं की बड़ी बड़ी सभाएं आयोजन करवाई | और प्रजा के बीच घोषणा करवा दिया कि “अब गुरुकुल के ब्रह्मचारियों को कोई भिक्षा नहीं देगा ! भिक्षा के अधिकारी मात्र बौद्ध भिक्षुक होंगे ये भिक्षुक उन ब्रह्मचारियों से श्रेष्ट हैं” | कुछ समय तक मगध की जनता मानने लगी कि उनका राजा धार्मिक हो गया है | परन्तु उस समय ब्राह्मण वर्ग और भिक्षुक वर्ग में किसी प्रकार का मतभेद नहीं था और आचार्य चाणक्य तो स्वयं बुद्ध के धम्म-पथ के उपासक बनने में विश्वास करते थे, अंततः बौद्ध भिक्षुओं ने आचार्य चाणक्य का ही साथ दिया और धननंद को हटा चन्द्रगुप्त मौर्य को राजा बनाया गया | तब चन्द्रगुप्त ने ब्राह्मणों एवं बौद्ध भिक्षुओं को अपने राज्य में बिना किसी भेद भाव के उचित एवं सम्मानित स्थान प्रदान किया और धार्मिक-राजनीति का ज्वलंत प्रमाण प्रस्तुत किया | उसी प्रकार मौर्य-वंश का अंतिम राजा बृहद्रथ धर्मच्युत एवं विलासी हो गया तब महर्षि पतंजलि ने उसे हटा अपने शिष्य पुष्यमित्र शुंग का राज्याभिषेक एक धार्मिक-राजा के रूप में किया |

अतः आज हमारे देश की वर्तमान परिस्थितियों में जन-मानस को यह समझना आवश्यक है कि ‘धर्म की राजनीति’ एवं ‘धार्मिक राजनीति’ में बहुत अन्तर है | नहीं तो कोई धन का लोभी धननंद धर्म और जाती के नाम पर हमें विभाजित कर के फिर से हमें ठग सकता है |

– मनीष देव
ये लेखक के स्वयं के विचार है।
Editorial Review Note
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