प्रसिद्ध चार धामों के पीछे की पौराणिक कथाएँ
अप्रैल माह में शीघ्र ही श्रद्धालुओं को चार धाम की यात्रा का सुखद अनुभव प्राप्त होगा. चार धाम यानि यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ. आइये जानते हैं इन धामों के पीछे की पौराणिक कथाएँ-
कथा यमुनोत्री धाम की
कहते हैं यमुना नदी सूर्य देव की पुत्री है और मृत्यु के देवता यम की बहन है. कहते है कि भैयादूज के दिन जो भी व्यक्ति यमुना में स्नान करता है. उसे यमत्रास से मुक्ति मिल जाती है. इस मंदिर में यम की पूजा का भी विधान है. यमुनोत्री धाम के इतिहास का वर्णन हिन्दुओं के वेद-पुराणों में भी किया गया है, जैसे:- कूर्मपुराण, केदारखण्ड, ऋग्वेद, ब्रह्मांड पुराण मे , तभी यमुनोत्री को ‘‘यमुना प्रभव’’ तीर्थ कहा गया है.और यह भी कहा जाता है कि इस स्थान पर “संत असित” का आश्रम था.महाभारत के अनुसार जब पाण्डव उत्तराखंड की तीर्थयात्रा मे आए.तो वे पहले यमुनोत्री , तब गंगोत्री फिर केदारनाथ-बद्रीनाथजी की ओर बढ़े थे, तभी से उत्तराखंड में चार धाम यात्रा की जाती है.
कथा गंगोत्री धाम की
भगवान श्री राम चन्द्र के पूर्वज रघुकुल के चक्रवर्ती राजा भगीरथ ने यहां एक पवित्र शिलाखंड पर बैठकर भगवान शंकर की प्रचंड तपस्या की थी. गंगोत्री धाम के इतिहास के अनुसार “देवी गंगा” ने इसी स्थान पर धरती का स्पर्श किया. अन्य मान्यता यह है कि पांडवों ने भी महाभारत के युद्ध में मारे गए अपने परिजनों की आत्मिक शांति के निमित इसी स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ करवाया था.
गंगोत्री से 19 किलोमीटर दूर, समुद्रतल से तकरीबन 3,892 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है “गौमुख” . यह गंगोत्री ग्लेशियर का मुहाना तथा भागीरथी नदी का उद्गम स्थल है . कहते हैं कि यहां के बर्फिले पानी में स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं. गंगोत्री मंदिर की पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिवजी इस जगह में अपनी जटाओं को फैला कर बैठ गए और उन्होंने गंगा माता को अपनी घुंघराली जटाओ में लपेट दिया.
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कथा केदारनाथ धाम की
हिमालय के केदार पर्वत पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे. उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया. यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं.
पंचकेदार (केदारनाथ) की कथा
ऐसा माना जाता है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृ हत्या अर्थात (परिवार वालो की हत्या) के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे. इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे लेकिन भगवान शंकर पांडवो से नाराज़ थे. भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव काशी गए, पर भगवान शंकर पांडवो को वहां नहीं मिले. वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे. भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतर्ध्यान हो कर केदार में जा बसे. दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए. भगवान शंकर ने बैल का रूप धारण करके अन्य पशुओं में जा मिले. पांडवों को संदेह हो गया था कि भगवान शंकर इन पशुओ के झुण्ड में उपस्थित है. तभी भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाड़ों पर पैर फैला दिए.
अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल का रूप धारण कर पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए. तब भीम पूरी ताकत से बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतर्ध्यान होने लगा. तब भीम ने बैल का पीठ का भाग पकड़ लिया. और भगवान शंकर पांडवों की भक्ति, दृढ संकल्प देख कर प्रसन्न हो गए. उन्होंने तुरंत दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया. उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ धाम में पूजे जाते हैं.
कथा बद्रीनाथ धाम की
पौराणिक कथा के अनुसार यह स्थान भगवान शिव भूमि( केदार भूमि ) के रूप में व्यवस्थित था. भगवान विष्णु अपने ध्यानयोग के लिए एक स्थान खोज रहे थे और उन्हें अलकनंदा के पास शिवभूमि का स्थान बहुत भा गया. उन्होंने वर्तमान चरणपादुका स्थल पर (नीलकंठ पर्वत के पास) ऋषि गंगा और अलकनंदा नदी के संगम के पास बालक रूप धारण किया और रोने लगे. उनके रोने की आवाज़ सुनकर माता पार्वती और शिवजी उस बालक के पास आये और उस बालक से पूछा कि तुम्हे क्या चाहिए. तो बालक ने ध्यानयोग करने के लिए शिवभूमि (केदार भूमि) का स्थान मांग लिया. इस तरह से रूप बदल कर भगवान विष्णु ने शिव पार्वती से शिवभूमि (केदार भूमि) को अपने ध्यानयोग करने हेतु प्राप्त कर लिया. यही पवित्र स्थान आज बद्रीविशाल के नाम से भी जाना जाता है
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