नीलकंठ विवाद को लेकर मोरारी बापू के समर्थन में आये साधू संत
अहमदाबाद, 11 सितम्बर; कथावाचक मोरारी बापू द्वारा नीलकंठ के बारे में की गई टिप्पणी के कारण वे विवादों में आ गए। स्वामीनारायण संप्रदाय के सभी साधु-संत मोरारी बापू से माफी मांगने को कह रहे हैं। इसी के चलते गुजरात के साधु-संत भी मोरारी बापू के समर्थन में आ गए हैं। जूनागढ़ की इंद्रभारती बापू ने एक बयान में कहा, “मोरारी बापू माफी नहीं मांगेंगे और हम उन्हें माफी नहीं मांगने देंगे, अब भावनगर में वैष्णव समाज के साधु–संत मोरारी बापू के समर्थन में आए और एक बैठक का आयोजन किया।”
भिक्षुओं और संतों के अलावा, अब गायक-गीतकार और लोक-लेखक भी मोरारी बापू के समर्थन में आ गए हैं। लोक गायक कीर्तिदान गढ़वी, लोक लेखक मायाभाई अहीर और गायक जिग्नेश कविराज मोरारी बापू के समर्थन में आए।
कीर्तिदान गढ़वी ने कहा, “बापू मेरे लिए पिता के समान हैं, इसलिए बापू के बारे में कोई कुछ भी कहे ये मुझे जरा भी पसंद नहीं है।” मैं इस बात का खंडन करता हूं कि आप इस तरह के शब्दों को इस्तेमाल कर सकते हैं जो सनातन धर्म का मसाला लेकर चलते हैं और सोशल मीडिया के सभी विवादों को खत्म करते हैं, सभी हिंदुओं को एक होने दें और हमें उसी भाषा में संवाद करें जो हमें अलंकृत करता है।
जिग्नेश कविराज ने कहा, “जो लोग टिप्पणी कर रहे हैं उन्हें बता रहा हूं कि मैं जाति, पुरुष या महिला, उच्च और निम्न और रंग में विश्वास नहीं करता क्योंकि सनातन धर्म इस पर विश्वास नहीं करता। मैं ब्राह्मणी, महादेव की और विश्वरूप में शक्ति की पूजा करता हूं क्योंकि सनातन धर्म में शक्ति की पूजा होती है। मेरा कोई पंथ नहीं है। मेरा कोई सिर नहीं है। नीलकंठ हमारा एकमात्र भोलेनाथ है, बाकी नदियाँ अपार जल प्रवाहित करती हैं लेकिन इन सभी जल को अंततः समुद्र में मिलाना पड़ता है।
दूसरी ओर, लोकगीतकार मायाभाई अहीर ने भी मोरारी बापू का समर्थन किया, और स्वामीनारायण संप्रदाय के संतों के सामने कुछ उदाहरण प्रस्तुत किए गए।
क्या था विवाद
राजकोट में एक रामकथा के दौरान संत मोरारी बापू ने कहा था कि स्वामीनारायण भगवान के किशोर स्वरूप को नीलकंठवर्णी कहा जाता है, यह भ्रम फैलाने जैसा है। नीलकंठ तो वो होता है जो जहर पीता है, लाडू खाने वाला नीलकंठ नहीं हो सकता। हालांकि विवाद बढता देख मोरारी बापू ने संपूर्ण समाज को मिच्छामी दुक्कडम अर्थात गलती हो गई हो तो क्षमा कह चुके हैं। लेकिन बापू के इसी बयान को लेकर स्वामी नारायण संप्रदाय पूरी तरह उनसे नाराज है, वे अब उनके सार्वजनिक रूप से माफी की मांग कर रहे हैं।
संत सत्यस्वरूप स्वामी ने कहा कि “बापू को इस मामले में संभलकर बोलना चाहिए, स्वामीनारायण के नीलकंठ स्वरूप का खंडन करने से पहले अपनी वाणी पर काबू रखना चाहिए। संत विवेक स्वरुप व संत नित्यस्वरुप सवामी ने कहा कि बापू अपने बयान से समाज को गुमराह कर रहे हैं। रामकथा के दौरान स्वामीनारायण के नीलकंठ स्वरुप को नकारने के साथ उसे बनावटी बताकर बापू ने संप्रदाय की आस्था पर चोट की है।”
उधर स्वामीनारायण संप्रदाय ने मंगलवार को अपनी वेबसाइट के ज़रिए एक पत्र जारी करके इस मामले में अपने भक्तों से शांति रखने और सनातन धर्म के लिए काम करने की बात कही।

मंगलवार को ही दोपहर में स्वामीनारायण के संतों ने स्वामीनारायण संप्रदाय के कई संतों और जूनागढ़ के स्वामी इंद्रभारती बापू ने इस मामले शांति की अपील करते हुए कहा कि इस मामले का अब समाधान हो गया है
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