संत वामा खेपा – जिनका जूठन खाती थीं मां तारा

भक्ति में ऐसी शक्ति है जिसमें ईश्वर भी भक्त का गुलाम हो जाता है । भक्त की खुशी में ही ईश्वर की खुशी होती है, भक्त के दुख से ईश्वर भी दुखी होता है। भक्ति और प्रेम की ऐसी ही पराकाष्ठा का नाम था वामाक्षेपा या वामा खेपा। मूल नाम वामचरण चट्टोपाध्याय। पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले में जन्मा ऐसा संत जिसे लोग आदर पूर्वक पागल (खेपा) कहते थे। उसका पागलपन अपनी मां तारा (मां काली का श्मशान स्वरुप) के लिए था। वो अपनी मां काली या कहें तारा के लिए जीते थे और उसी के लिए उसका पूरा जीवन समर्पित था।

रामकृष्ण परमहंस के समकालीन वामाखेपा बचपन से ही मां तारा की भक्ति में लीन थे। उनके गांव के समीप ही नदी पार मां तारा का एक सिद्ध शक्तिपीठ था जिसे तारापीठ के नाम से पूरी दुनिया जानती है। वामा अल्पायु में ही एक दिन अचानक तारापीठ पहुंच गए और वहां उन्हें कैलाशपति बाबा का सानिध्य प्राप्त हुआ। कैलाशपति बाबा ने उन्हें तंत्र, योग और भक्ति से परिचित कराया। अपने गुरु के आशीर्वाद स्वरुप वो शीघ्र ही मां तारा की भक्ति को इस स्तर पर प्राप्त करने में सफल हो गए जिसकी कल्पना भी बड़े बड़े भक्त नहीं कर सकते हैं।


वामा औघड़ संप्रदाय से दीक्षित हुए थे इसलीए वो किसी भी तरह के कर्मकांड में विश्वास नहीं रखते थे। वो दिगंबर अर्थात नंगे ही रहते थे। एक दिन किसी भक्त ने उनसे दिंगबर रहने का कारण पूछा तो उनका जवाब था कि “मेरे पिता शिव दिंगबर रहते हैं और मेरी मां काली भी दिगंबर रहती है इसीलिए उनका पुत्र होने के नाते मैं भी दिगंबर ही रहता हूं।“ वामा मां तारा के इतने करीब थे कि वो खुद को पूर्ण रुपेण बालक समझते थे। कई बार वो अपनी मां तारा के सम्मुख ही मूत्र त्याग भी कर देते थे। एक बार मां तारा के लिए तैयार प्रसाद को उन्होंने मां के भोग से पहले ही खा लिया। इस पर मंदिर के अन्य पुजारियों ने उन्हें वहां से भगा दिया। वामा बिना कुछ खाए पिए चार दिनों तक मां तारा का नाम जपते रहें। तभी नटौर की रानी जो मंदिर की प्रबंधक भी थीं, उनके सपने में मां तारा आईं और उन्होंने कहा कि वो भूखी हैं क्योंकि उनका पुत्र भी भूखा है । वो तब तक प्रसाद ग्रहण नहीं करेंगे जब तक वामा को खाना नहीं खिलाया जाता । रानी ने अपने दूतों को भेज कर तुरंत वामा के खाने की व्यवस्था की । इसके बाद से पहले वामा को प्रसाद दिया जाने लगा इसके बाद ही उनका जूठन मां तारा को प्रसाद में लगाने की व्यवस्था शुरु हुई।

वामाक्षेपा पूरे जीवन मां तारा के मंदिर तारापीठ में ही रहे और वहीं पास के श्मशान में मां की साधना कर सर्वोच्च स्थिति प्राप्त की। कहा जाता है कि मां तारा ने उन्हें उस स्थान पर ही दर्शन देकर अपना दूध पिलाया था। वामा अपनी मां तारा से इतने निकट थे कि अगर मां तारा उनकी प्रार्थना नहीं सुनती थी तो वो बच्चों की तरह जमीन पर लेट कर रोना पिटना मचा देते थे और यहां तक कि मां तारा को ही भला बुरा कहने लगते थे। कहा जाता है कि वहां के श्मशान में एक स्थान ऐसा है जिस पर अगर किसी का पैर पड़ जाए तो उसे संसार की सारी सिद्धियां प्राप्त हो सकती हैं।

वामा जाति प्रथा को नहीं मानते थे और यहां तक कि वो सारी स्त्रियों को माता के समान ही देखते थें। एक बार उनके गांव के एक व्यक्ति ने उनके पास एक वेश्या को भेजा। जब वेश्या वामा के पास पहुंची तो वामा ने उससे कहा कि “मां तारा तुम आ गई। और इसके बाद वो वेश्या उनके शरण में आ गई। वामा की भक्ति की कहानी अनंत है। पूरे जीवन तारापीठ में रहते हुए 1922 में उनका निधन हो गया। वामा को आज भी मां काली के भक्तों में वो स्थान हासिल है जो हजारों सालों में कुछ लोगों को ही हो पाया।
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लेखक – अजीत मिश्रा
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