राम मंदिर पर संतों की पुकार और हुंकार : क्या संतों की आवाज सुनी जाएगी ?
- भव्य श्रीवास्तव

देश में राम मंदिर के मुद्दे पर हिंदू संतों ने अपनी-अपनी बात कहनी शुरू कर दी है। हर ओर से राम मंदिर के निर्माण की हुंकार सुनी जा रही है। दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में हुए दो दिन के सम्मेलन धर्मादेश में “जो राम का नहीं वो किसी काम का नहीं” जैसी बातें कहीं गई। सरकार को आदेश दिया गया कि वोकानून या अध्यादेश लाकर मंदिर निर्माण का रास्ता प्रशस्त करें। पर क्या राजनैतिक सत्ता इस दिशा में सोच रही है या केवल ये संतों की पुकार और हुंकार भर का मामला है, जिस पर मीडिया में हलचल मची है।
“जो राम का नहीं वो किसी काम का नहीं”
स्वामी रामदेव के इस बयान को पढिए “राम राजनीतिक मुद्दा है ही नहीं, राम विशुद्ध रूप से राष्ट्र की अस्मिता, राष्ट्र के सम्मान, स्वाभिमान, गौरव से जुड़ा हुआ मुद्दा है और यह सर्वविदित है कि राम मात्र हिन्दू ही नहीं हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई जो भी इस भारतवर्ष में निवास करते है, उन सब के पूर्वज है इसलिए राम को लेकर के कोई विपक्ष मुझे देश में दिखाई नहीं देता, तो ससंद में अब राम मंदिर को लेकर के कानून बनाकर के मंदिर बनाने का मार्ग मोदी जी को प्रशस्त इसलिए करना चाहिए”

श्रीश्री रविशंकर ने अखिल भारतीय संत समिति के दिल्ली के धर्मादेश आयोजन में कहा, “राम मंदिर को लेकर बातचीत करते रहना चाहिए, सुप्रीम कोर्ट ने अनुरोध करें कि वो फैसला जल्दी करें और सरकार से भी उम्मीद है। संतों को मंदिर की जरूरत नहीं है, पर भारत की जनता चाहती है कि भव्य मंदिर बनें। भारत की जनता की जो इच्छा है उसे पूरा करने का प्रयत्न और प्रार्थना दोनों करें। ![]()

जाने माने पत्रकार और धर्म और राजनीति को करीब से समझने वाले विनोद अग्निहोत्री सीधे कहते हैं कि, “ये राजीनिति प्रायोजित गर्माहट लाने की जद्दोजहद है। संतों का इस्तेमाल हो रहा है राजनैतिक एजेंडे को पूरा करने के लिए। संतों की परिभाषा तो तुलसीदास ने साफ कही है, आज मंचों से राम मंदिर के नाम पर फिर से सरकार की वापसी की बात की जा रही है। जो संत इक्टठा होते है धर्मसंसद जैसी जगहों पर, इसके अलावा इस देश में तमाम संत है जो इस आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण है”।
दिल्ली के आयोजित हुई अखिल भारतीय संत समिति के धर्मादेश के मंच से जो धर्मादेश पारित किया गया उसमें सरकार को आदेश तो दिया पर साथ ही सरकार को दोबारा लाने की अपील भी की गई।
विनोद जी आगे कहते हैं कि, “राम मंदिर बनना चाहिए, लेकिन मेरा मानना है संत मांग करें, इसमें कोई आपत्ति नहीं, विशुद्ध रूप से संतों की इच्छा का सम्मान रखना चाहिए, पर सुप्रीम कोर्ट को फैसला लेना है, उस पर दबाव नहीं बनाया जा सकता है। देश भावनाओं से नहीं संविधान से चलता है। मामला अदालत में है, अच्छी बात है कि सहमति से बनें मंदिर। और अगर संत गंभीर हैं तो उन्हें दूसरे पक्ष को संपर्क करके बीच का रास्ता निकालना चाहिए।
वैसे राम मंदिर को लेकर संतों की भावनाएं बह रही है। हाल ही में एक टीवी न्यूज डिबेट में आध्यात्मिक गुरु स्वामी दीपांकर के आसुं बह निकले। उनके गुरु ब्रह्मानंद सरस्वती जो अब 104 साल के है राम मंदिर के आंदोलन ने सालों जुड़े रहे, वे अब कहते हैं कि पता नहीं जीवित रहते मंदिर देख पाउंगा या नहीं। इसे बताते हुए स्वामी दीपांकर भाव विह्लल हो गए और रो पड़े।
रिलीजन वर्ल्ड ने स्वामी दीपांकर से पूछा कि राम मंदिर का मुद्दा उनके जैसे बेहद युवा संत के लिए क्या मायने रखता है, “राम देश के आराध्य हैं, देश का विषय नहीं राम इस देश के भाव हैं। राम इस देश की दिल के भीतर धड़कने वाली धड़कन हैं। राम कोई मुद्दा नहीं है राम तो भारत वर्ष की आध्यात्मिकता के अभिप्राय और इस देश में रहने वाला कोई भी व्यक्ति, मनुष्य वर्तमान राम मंदिर का विरोध नहीं कर सकता संसद में क़ानून लाकर मंदिर का निर्माण करना ही देश को अखंड बनाने जैसा है”।
संतों की भावनाओं से देश का मीडिया भी हर दिन “राम मंदिर” बना रहा है। हर दिन पक्ष, विपक्ष, संत और समाज खिड़कियोें में बैठकर धर्म और राजनीति को समझने और समझाने में लगा है। पर कुछ लोग जमीन पर काफी समय से एक्टिव है, लेकिन सफलता दूर की कौड़ी की तरह प्रतीत होती है। इसकी वजह जानने के लिए रिलीजन वर्ल्ड ने विनोद जी से पूछा कि श्रीश्री रविशंकर दोनों पक्षों के बीच सुलह की कोशिश में लगें है, तब विनोद जी ने कहा कि, “स्वामी जयेन्द्र सरस्वतीजी बाजपेयी के जमाने में लखनऊ गए थे, नदवा भी गए थे, पर उनका विरोध शुरू हो गया। आज श्रीश्री को भी हो सकता है कुछ हिंदूवादी संगठन नहीं पसंद कर रहे हो।
विनोद जी ने इस बात के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया कि “प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने पहली बार इस मामले में दोनों पक्षों को आमने सामने बिठाकर दस्तावेजों का आदान प्रदान करवाया था। इसके बाद किसी भी सरकार ने कोई सार्थक प्रयास नहीं किया। वैसे आम आदमी इस बात को लेकर वैसे आश्वस्त है कि मंदिर आज नहीं तो कल बनेगा ही। दो पीढ़िया गुजर गई इस आंदोलन में। देखना होगा कि आज कितने जवान लोगों को इसमें रूचि है। जो लोग आंदोलन के अगुवा थे उनकी साख पर भी खतरा हो गया है, अगर ये सरकार गंभीर होती तो एक मंत्री की तैनाती करते जो इस मामले को देखता, वो दोनों पक्षों से बात करता और कोई बीच का रास्ता निकालता। और इससे शायद कोई रास्ता निकल आता। दक्षिण कोरिया जैसे देश में तो बाकायदा एक मंत्रालय है जो ऐसे विवादों को सुलझाता है। बाजपेयी की सरकार में प्रधानमंत्री कार्यालय में अयोध्या सेल थी, तो क्या ये सरकार एक मंत्री नहीं बना सकती थी। नरसिंहाराव ने चारों शंकराचार्यों को बुलाकर रामालय ट्रस्ट बनाया था। प्रयास किए गए थे, पर आज प्रयास नहीं दिखते हैं”।
कानपुर से लेकर कुुन्नुर तक राम मंदिर का मुद्दा जमीन पर उतर चुका लगता है। भागवताचार्य देवकीनंदन ठाकुर ने आज कानपुर में पदयात्रा निकालकर कूच किया। हजारों लोगों के संग वे राम मार्च कर रहे थे।

“मन में राम, भाषण में मंदिर” की तर्ज पर देश के हिंदू संत एकसुर में कानून या अध्यादेश की बात पर जोर दे रहे है। मुद्दा धार्मिक से राजनैतिक हुए बरसो हो चलें है, अब मुद्दा भावनात्मक भी हो चला है। प्रधानमंत्री चुप है, शायद राज्यों के चुनाव के बाद वे कुछ बोलें जिससे संतों की आस्था सरकार में बनी रहे।
- भव्य श्रीवास्तव, धर्म पत्रकार (bhavyasri@outlook.com)
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