क्या आप जानते हैं होली मनाने के पीछे के वैज्ञानिक कारण
होली यानी रंगों और खुशियों का त्यौहार. हिन्दु कैलेंडर के अनुसार होली का त्योहार शिशिर और वसंत ऋतु के बीच में पड़ता है. यह ऋतुएं संधिकाल कहलाती हैं. मौसम में जैसे ही बदलाव होता हमारा शरीर भी उसके अनुरूप ढलने लगता है. हमेशा यह बदलाव सकारात्मक नहीं होते कई बार यह आने वाले बदलाव रोग का कारण भी होते हैं. आइये जानते हैं इसके वैज्ञानिक कारण और इससे बचने के उपाय.
क्या कहता है आयुर्वेद
आयुर्वेद के अनुसार दो ऋतुओं के संक्रमण काल में मानव शरीर रोग और बीमारियों से ग्रसित हो जाता है. आयुर्वेद के अनुसार शीत ऋतु में ठंड के प्रभाव से शरीर में कफ की अधिकता हो जाती है और वसंत ऋतु में तापमान बढ़ने पर कफ के शरीर से बाहर निकलने की क्रिया में कफ दोष पैदा होता है, जिसके कारण सर्दी, खांसी, सांस की बीमारियों के साथ ही गंभीर रोग जैसे खसरा, चेचक आदि होते हैं. इनका बच्चों पर प्रकोप अधिक दिखाई देता है. इसके अलावा वसंत के मौसम का मध्यम तापमान शरीर के साथ मन को भी प्रभावित करता है. इससे आलस्य भी उत्पन्न होता है.
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होली से इसका सम्बन्ध
होली के त्यौहार पर होलिका दहन की परंपरा है। वैज्ञानिक रूप से यह वातावरण को सुरक्षित और स्वच्छ बनाती है क्योंकि सर्दियॉ और वसंत का मौसम के बैक्टीरियाओं के विकास के लिए आवश्यक वातावरण प्रदान करता है.पूरे देश में समाज के विभिन्न स्थानों पर होलिका दहन की प्रक्रिया से वातावरण का तापमान 145 डिग्री फारेनहाइट तक बढ़ जाता है जो बैक्टीरिया और अन्य हानिकारक कीटों को मारता है.
उसी समय लोग होलिका के चारों ओर एक घेरा बनाते है जो परिक्रमा के रूप में जाना जाता है जिस से उनके शरीर के बैक्टीरिया को मारने में मदद करता है. पूरी तरह से होलिका के जल जाने के बाद, लोग चंदन और नए आम के पत्तों को उसकी राख के साथ मिश्रण को अपने माथे पर लगाते है,जो उनके स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में मदद करता है.
इस पर्व पर रंग से खेलने के भी स्वयं के लाभ और महत्व है. यह शरीर और मन की स्वस्थता को बढ़ाता है. घर के वातावरण में कुछ सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह करने और साथ ही मकड़ियों, मच्छरों को या दूसरों को कीड़ों से छुटकारा पाने के लिए घरों को साफ और स्वच्छ में बनाने की एक परंपरा है
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