“सत्संग वचन”
“खुद से परिचित होना जरूरी है : सदगुरु श्री आनन्द जी महाराज”
तुम कष्ट में इसलिये हो कि न तो तुम स्वयं से परिचित हो, ना ही अपनी अपार आंतरिक क्षमता से। तुम परेशान इसलिए हो क्योंकि तुम्हे अपना, अपने स्व का, अपने प्रभु का, और उस नाद का बोध खो गया है, जो तुम्हारा आधार है। नाद और शब्द तुम्हारे अंदर हर पल उतरते ही रहते हैं। वो तुम्हारे पास खिंचे चले आते हैं, जैसे तुम उनके केंद्र में हो। और वो तुम्हारे साथ साथ चलते हैं। जैसे तुम ही उनका लक्ष्य हो। पर तुम उन अन्दर के महाशब्दों को सुन नहीं पाते। क्योंकि तुम सुनने का प्रयास नहीं करते। कोशिश नहीं करते। तुम्हारा मन तुम्हारे ध्यान को जगत में, उसके नष्ट होने वाले पदार्थो के चिन्तन में लगाये रखता है। उलझाये रखता है। तुम्हारा मन तुम्हे बरगला कर तुम्हे तुम्हारी असली ख़ज़ाने को पाने की राह में अड़चन डाल कर इस संसार के पत्थरों और धूल-मिट्टी में बहलाये रखता है, जो तुम्हारी हैं ही नहीं। वो तुम्हे इन चमकते कंकड़-पत्थर को दौलत का आभास दिलाता है। तुम दफ्तर जाना, धन कमाना, भोजन करना, वस्त्र धारण करना, स्त्री-पुरुष, पति-पत्नि, बेटे बेटी, झूठी पद प्रतिष्ठा और तरक्की, मान और अपमान, ज़मीन-जायदाद और क्षणिक काम-वासना जैसी अर्थहीन गतिविधियों से इस कदर जुड़ गये कि अपने अंदर जाकर उन शब्दों को सुनना ही भूल गये, जो तुम्हारा आधार हैं, मूल है। इसीलिए तुम्हे अन्तर के शब्द, वेद वाणी, अनहद ध्वनि, आकाशवाणी, खुदा की आसमानी आवाज़ें सुनाई नहीं देती है। वो पल पल बह रही हैं तुम्हारे इर्द गिर्द, बज रही हैं, थिरक रही हैं, खनक रही हैं, फिर भी तुम्हे सुनाई नहीं दे रही हैं। वो तुम्हे लपेटे हुये हैं पर तुम्हे पता नहीं। तुम उन्हें नहीं जानते। जैसे वाइफाइ की वेव तुम्हारे डिवाइस के चारों ओर घूम रही हों, और तुम्हे पासवर्ड न हो, तो वो उन लहरों के मध्य रहकर भी कनेक्ट न हो सकेगा। यदि तुम्हे ऐसा महापुरुष मिले जो ऊपर के रहस्य जानता हो, ऊपर जाता आता हो, जो तकनीक जानता हो, वो तुम्हारा ध्यान संसार से उलटकर अनहद की नाम ध्वनि से जोड़ सके, और तुम्हारा परिचय तुम्हारे स्व से करा दे, ऊपर की ध्वनियों से करा दे तो काम हो जाये, बात बन जाये।वीडियो – सदगुरु श्री आनन्द जी महाराज
जब तुम्हारे अंदर निवेदन का भाव होगा तब ही तुम परम ऊर्जा की दया का स्पष्ट साक्षात्कार कर सकोगे। तुम पारलौकिक ही क्यूँ, इस लोक में भी जब तुम किसी भी छोटी से छोटी सत्ता या संस्था से जुड़ना चाहते हो, कृपा चाहते, कुछ चाहते हो, या अधिकार या हक़ भी चाहते हो तो तुम हुक्म नहीं देते, दे ही नहीं सकते। गुज़ारिश करते हो, निवेदन करते हो, रिक्वेस्ट करते हो, एप्लीकेशन देते हो। ठीक वैसे ही अंतर में अनुरोध करो। जब तुम नियमित रूप ध्यान में अनुरोध करोगे, गुहार लगाओगे तो शनैः शनैः तुम्हारे कर्मों की परतें दरकने लगेंगी सरकने लगेंगी। सद्गुरु की नियमित दया से अरबों खरबों जन्मों के जन्मों के तुम्हारे कर्मों के जखीरे जलने लगेंगे। तब जाकर तुम स्वयं के अंदर सद्गुरु की वास्तविक हैसियत का अनुभव कर सकोगे। उसके पहले तो संभव ही नहीं है। यदि तुम्हारा मन तुम्हे ध्यान में उतरने ना दे, साधना पर बैठने ना दे तो सद्गुरु को ह्रदय से पुकारो। आवाज़ दो। अपने पूर्व के अज्ञात कर्मो का पश्चाताप करो। धीरे धीरे कर्मों का कूड़ा कचरा साफ होने लगेगा और तुम अन्तर के शब्दों से रूबरू होने लगोगे। वो शब्द व प्रकाश प्रकट होने लगेंगे। तब तुम्हे सद्गुरु की दया का आभास होने लगेगा। जब भी ऐसा महान सुअवसर घटित हो तो तुम स्वयं को भाग्यशाली समझो और सद्गुरू को उसकी इस विशिष्ट कृपा के लिये कोटि कोटि धन्यवाद दो। अब तुम्हारी नींद टूटने की प्रथम प्रक्रिया आरम्भ हुई है। जयगुरुदेव।
ध्यान में बैठने पर यदि सद्गुरु की कृपा से तुम्हे नाम ध्वनि का रस आने लगे, तुम्हे दोनों आँखो के सामने एक बिंदु, यानि तीसरे तिल का परिचय हो जाये तो तुम्हारी आध्यात्मिक यात्रा आरम्भ हो जाये। तो तुम भी उस महा शब्द से कनेक्ट हो जाओगे। तीसरा तिल वो है जहाँ से तुम इस जगत से आगे की यात्रा आरम्भ करते हो, इस कायनात से आगे की कायनात की ओर उन्मुख होते हो। वो बिन्दु तत्काल दिखाई नहीं देता। तुरंत नज़र नहीं आता। और जब दिखता भी है, तो तुरंत स्थिर नहीं होता। चंचलता का आभास होता रहता है। वो भागता हुआ या घूमता हुआ प्रतीत होता है। वो तो स्थिर है, रुका हुआ है। पर मन उसे अस्थिर महसूस कराता है। वो बिंदु पहले सूक्ष्म और स्याह यानि काला दिखता है। पर रफ़्ता रफ़्ता सुर्ख और श्वेत और उसके बाद विराट और महाविराट हो जाता है। वो द्वार यानि तीसरा तिल तुम्हे सद्गुरु की कृपा के बगैर ना मिल सकेगा। सद्गुरू से उनकी दया और अन्दर का रहस्य जानकर, भेद लेकर, युक्ति यानि तकनीक सीख कर यदि तुम अपना रूहानी सफ़र शुरू कर दो, तो तुम स्वयं में उतर कर गुरु के द्वारा अपने मूल को, अपने स्व को उपलब्ध हो जाओगे। प्रभु की दया पाने के लिये अंतर् में सदैव उनसे प्रार्थना करते हुये तुम ऊँचा ध्यान चढ़ाते जाओ। तब बहुत आगे एक विचित्र सा प्रकाश दिखाई देगा, एक अजीब मगर अदभुत रोशनी तुम्हारे रूबरू होगी। बस उसी रोशनी को थाम कर,उसका ही सहारा लेकर अन्तर का सफ़र आरम्भ कर दो। ध्यान रहे कि ध्यान भजन के वक़्त आंख एक जगह रुकी रहे, टिकी रहे। स्थिर। दृष्टि को हिलने मत देना। रोक कर रखना। पर सनद रहे, कि ह्रदय में तड़प होनी चाहिये, याचना होनी चाहिये, प्रेम होना चाहिये, सरलता होनी चाहिये। बिना प्रार्थना और निवेदन के तुम लक्ष्य तक ना पहुँच सकोगे।जयगुरुदेव।
यदि तुम्हारा मन तुम्हे ध्यान में उतरने ना दे, साधना पर बैठने ना दे तो प्रभु को ह्रदय से पुकारो। प्रार्थना करो। आवाज़ दो।
प्रणाम।
जयगुरुदेव।
Editorial Review Note
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