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शारदीय नवरात्रि विशेष : जानिए क्यों ख़ास है गर्दनीबाग ठाकुरबाड़ी की दुर्गापूजा

शारदीय नवरात्रि विशेष : जानिए क्यों ख़ास है गर्दनीबाग ठाकुरबाड़ी की दुर्गापूजा

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शारदीय नवरात्रि विशेष : जानिए क्यों ख़ास है गर्दनीबाग ठाकुरबाड़ी की दुर्गापूजा

शारदीय नवरात्रि विशेष: जानिए क्यों ख़ास है गर्दनीबाग ठाकुरबाड़ी की दुर्गापूजा

पटना, 4 अक्टूबर; पटना के गर्दनीबाग में अंग्रेजों के जमाने से ही दुर्गापूजा की धूमधाम हो रही है। गर्दनीबाग स्थित ठाकुरबाड़ी में 116 वर्षों से मां दुर्गा की पूजा हो रही है। हर बार की तरह इस बार भी भव्य पूजा की तैयारी है। मां दुर्गा के दर्शन के लिए प्रतिपदा से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगने लगती हैं।

1903 से ही गर्दनीबाग ठाकुरबाड़ी में पूजा 

अंग्रेजों के जमाने में वर्ष 1903 में ही गर्दनीबाग ठाकुरबाड़ी में दुर्गपूजा की शुरुआत हो गयी थी। स्थापना वर्ष से कई वर्ष पहले से यहां पूजा की शुरुआत हो गयी थी।

मिटटी की मूर्ति से स्थायी मूर्ति का सफ़र

ठाकुरबाड़ी में शुरुआत से वर्ष 1992 तक हर वर्ष मिट्टी की प्रतिमा ही दुर्गापूजा में स्थापित होती थी। हर साल पूजा के बाद मूर्ति का विसर्जन कर दिया जाता था। हालांकि मां काली की प्रतिमा स्थायी तौर पर यहां स्थापित है। वर्ष 1997 में यहां मां दुर्गा की भी स्थायी प्रतिमा स्थापित कर दी गयी। मां दुर्गा की प्रतिमा के साथ यहां हनुमानजी, महादेव, भगवान श्री राम, जानकी, और चित्रगुप्त महाराज की भी प्रतिमा स्थापित है। यहां माता के दर्शन का खास महत्व है। मान्यता है कि मां के दर्शन मात्र से ही श्रद्धालुओं के सारे दुख-दर्द दूर हो जाते हैं।

 यहां लगता है शहर का प्राचीनतम दशहरा मेला


गर्दनीबाग ठाकुरबाड़ी मां दुर्गा की पूजा के साथ ही दशहरा मेला के लिए भी चर्चित है। शुरुआती दिनों से ही यहां दशहरा में दसों दिन का मेला लगता रहा है। इस मेले का स्वरूप आज भी ग्रामीण मेले की तरह है। हर दिन खासकर सप्तमी से मेले में श्रद्धालुओं की महती भीड़ उमड़ती है।

बड़े बड़े राजनेताओं का आगमन

 

देश के प्रथम राष्ट्रपति बाबू राजेन्द्र प्रसाद भी यहां पूजन के लिए आते थे। सूबे के पहले मुख्यमंत्री स्व.श्रीकृष्ण सिंह से लेकर वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार  तक यहां पूजन के लिए आते रहे हैं।

यह भी पढ़ें – नवरात्रि विशेष: दुर्गा पूजा में बनी सबसे महंगी मूर्ति

किसने शुरू की थी पूजा

गर्दनीबाग ठाकुरबाड़ी में सचिवालय के कुछ बाबुओं ने दुर्गापूजा की शुरुआत की थी। उस समय बंगाल बिहार एक ही प्रांत था। बंगाल के लोग भी यहां सचिवालय में काम करते थे। उन्होंने ही यहां पहले कालीपूजा की शुरुआत की। पर जगह का अभाव था।  वे लोग खुले में ही पूजा करते थे। इसी दौरान तत्कालीन गर्वनर गेट साहब वहां पहुंचे और पूछा ये सब खुले में  क्या कर रहे हैं? जब उन्हें पता चला कि पूजा कर रहे हैं तो उन्होंने तत्काल मौजूदा जगह पूजन के लिए उपलब्ध करा दिया।

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By Shweta October 4, 2019 3 min read
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