श्री श्रीभूति कृष्ण गोस्वामी जी महाराज
संतजन, गुरुजन,भगवद्जन जबँ भी पृथ्वी पर आते हैं तो अपने कर्मों का भुगतान करने नहीं अपितु हम जैसे अधम जीवों पर राधारमण जी का कृपा प्रसाद बरसाने। दीन हीन भटके हुए जीवों को राधारमण जी की ओर बढ़ने की दिशा दिखाने और उनकी कृपा और शरणागत वत्सल होने का अनुभव कराने। गुरु= माता और पिता अर्थात जिसमें दोनों के ही भाव हों वही गुरु हैं।

बड़े महाराज जी श्रीअतुलकृष्ण गोस्वामी जी की अप्रैल 1963 में एक बहुत ही ऐतिहासिक कथा वृंदावनमहिमामृत पर हुई, जिसमें कई सैंकड़ों संत और महातमा जन श्रोता के रूप में उपस्थित थे।
[उस समय महाराज जी (श्री श्रीभूतिकृष्ण गोस्वामी जी) अपनी माता के गर्भ में थे।]
बड़े महाराज जी को कथा में पहुँचने में कुछ विलम्ब हो गया जिसके लिए उन्होंने सबसे करबद्ध क्षमा याचना की और बताया कि उनकी पत्नी प्रसव करने की स्थिति में है तो अस्पताल की औपचारिकता के कारण कुछ देरी हो गयी। तो सब संत महात्मा जनों ने एक ही स्वर में आशीर्वाद दिया कि आपके यहाँ एक महान पुत्र रत्न की जन्म होगा जिससे
“”सब लोग आत्म गौरव करेंगे,
महिमा का अनुभव करेंगे,
आपको भी आत्म लाभ होगा।””
जब कथा के भोग के बाद महाराज जी अस्पताल पहुँचे तो महाराज जी का जन्म हुआ ( 12 अप्रैल, 1963)
सब भक्त जनों ने पूज्य पाद महाराज जी के अतिशय कोमल और सरल ह्रदय, वात्सलय और करूणा से परिपूर्ण स्वभाव का दर्शन और अनुभव किया ही है जो प्रशंसनीय और प्रणमय है। उनके सान्निध्य और कृपा आशीर्वाद के छत्रछाया में जो भी रहा, उसे तो उन्होंने ‘हरि नाम रस धारा’ में बहा कर राधारमण जू की और प्रेषित कर दिया।
जैसे उनका स्वभाव सरल व निर्मल है वैसे ही उनकी कथा शैली जो कि जन जन के ह्रदय का विषेदन कर उसमें हरि नाम रस का बीजारोपण करदे।
उनका वात्सलय , करूणा और दैन्यता तो शब्दों में बयान करना तो संभव ही नहीं। सबका (चाहे छोटा हो या बड़ा) ह्रदय से स्वागत तो करते ही , साथ में बख़ूबी उनका ध्यान रखते।
प्रसाद की पंक्ति लगती तो हर एक से स्वयं पूछते,
“”कुछ और आए?””
“”आपने ये प्रसाद पाया, वो प्रसाद पाया?””
“”कोई कमी तो नहीं?””
उन्हीं के परिश्रम और आनुगत्य में काफ़ी शिष्यों ने और नाम में रुचिकर लोगों ने कई तीर्थ स्थानों के दर्शन लाभ किए जहाँ अकेले जाना बहुत दुर्गम है। सबको हर तरह की सुविधा मिले, किसी को कोई कष्ट न हो इसके लिए वे पहले ही उस जगह पर जाकर सब व्यवस्था करवाते और फिर यात्रा लेकर जाते। जब ब्रज चौरासी कोस की यात्रा हुई तो उन्होंने गुरू माँ से कहा कि इस बार आप यात्रा पर साथ न चलें, वहीं रहकर सब(रहन सहन खान पान) प्रबंध सुंदरता से करें।ताकि सबको घर वाला परिवेश मिले।सबके संतोष के लिए वे सदा तत्पर रहते।
हर छोटे से बड़े बड़े उत्सव को वो इतने हर्ष , उल्लास व वैभव से मनाते कि सब आचंभित हो जाते। श्रीराधारमण जू कि सेवा में उनका भाव अनिर्वचनीय है।

महाराज जी की हार्दिक इच्छा थी कि वे बड़े महाराज जी कथा का प्रचार करें, हर भावुक और हरी नाम में डूबे भक्त तक बड़े महाराज जी की श्रीमुख से झरती हरि नाम कथा मंदाकिनी में उन सबको पलावित करें। इसी इच्छा की पूर्ति हेतु उन्होंने प्रथम बार गिरिराजजी में हुई कथा का आस्था चैनल पर लाईव प्रसारण कराया।
उन्होंने केवल प्रांत में ही नहीं , सीमावर्तन में ही नही बल्कि विश्व में….हरि कथा….हरि नाम का प्रचार और प्रसारण किया है। श्री राधारमणदेवजु के कुछ गोस्वामी जनो ने तो यहाँ तक कहा कि किसी भी राधारमणीय गोस्वामीजी ने हरि नाम का इतना प्रचार देश विदेश में नहीं किया जितना उन्होंने किया।
विदेश में हरि नाम प्रचार जब करने जाते को खाने की सही व्यवस्था न होने पर केवल फलाहार पाकर ही कितनी कितनी देर प्रचार करते।तब भी हरि नाम की मस्ती में आनंदित रहते और सबको भी सराभोर करने के लिए अथक प्रयास करते रहते।गुरु माताजी ने बताया कि गुरु जी जब भी कथा करते तो अपने वस्त्रों से ज़्यादा राधारमण जी के चित्र,कार्ड साथ लेकर जाते ताकि राधारमणजी का घर घर में प्रचार हो।
वे सदा सबसे कहते कि सदा प्रसन्न रहो, हरि नाम में मस्त रहो। सबसे अनुरोध करते कि कम से कम १६ माला महामंत्र की नित्य करो। सभी के साथ,सभी के बीच महामंत्र करते, नृत्य करते हुए आत्मविभोर होते।
कहने को तो बहुत है पर कहाँ तक कहें, शब्द ही कम पड़ जाए। महाराजश्री अस्वस्थता के कारण जब अस्पताल में थे तो अस्पताल में भी वहाँ के मरीज़ों को भी हरि नाम अमृत बांचते रहे। निकुंज पधारने से एक दो दिन पूर्व उन्होंने छोटे महाराज जी (श्री श्री पुंडरीक कृष्ण गोस्वामी जी) से एक गोष्ठी में कहा कि, ”मेरी बुद्धी और मन पूर्ण रूप से श्रीराधारमण जी के चरणों में स्थिर है और ये शरीर मेरा है ही नहीं।”
और 15 अक्तूबर, 2010 आश्विन मास शुक्ल अष्टमी तिथि दोपहर के 1.04 मिनट पर निकुंज लीला में ,राधारमण जू की कथा रस पान करने की लालसा को शांत करने हेतु उन्हीं को उनकी कथा श्रवण कराने की सेवा में लीन हो गए।
हम पर अनुग्रह कर हमें हरिनाम प्रदान किया और हरि नाम की ज्योतj को हमारे ह्रदय में सदा ही प्रज्वलित रखने के लिए हमे गुरु माँ और छोटे महाराज जी की छत्र छाया का संरक्षण प्रदान किया।
सदगुरू महाराज की जय हो ।

Editorial Review Note
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