कहानी एक युगदृष्टा की : श्रीराम शर्मा आचार्य

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य अखिल भारतीय गायत्री परिवार के संस्थापक और एक युगदृष्टा मनीषी. युगदृष्टा मनीषी इसलिए कह रही हूं क्योंकि जो व्यक्तिगत जीवन से परे समाज की भलाई और सांस्कृतिक और चरित्र उत्थान के लिए स्वयं को समर्पित कर दे उसे हम युगदृष्टा के सिवा और क्या कह सकते हैं.
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य ने आधुनिक व प्राचीन विज्ञान व धर्म का समन्वय करके आध्यात्मिक नवचेतना को जगाने का कार्य किया ताकि वर्तमान समय की चुनौतियों का सामना किया जा सके. उनका व्यक्तित्व एक साधु पुरुष, आध्यात्म विज्ञानी, योगी, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, लेखक, सुधारक, मनीषी व दृष्टा का समन्वित रूप था.
कैसा था उनका बाल्यकाल
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य का जन्म 20 सितम्बर,1911 (आश्विन कृष्ण त्रयोदशी विक्रमी संवत् 1967) को उत्तर प्रदेश के आगरा जनपद के आंवलखेड़ा गांव में हुआ था. उनका बाल्यकाल गांव में ही बीता. उनके पिता श्री पं.रूपकिशोर जी शर्मा जी जमींदार घराने के थे और दूर-दराज के राजघरानों के राजपुरोहित, उद्भट विद्वान, भगवत् कथाकार थे.
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साधना के प्रति रूचि
साधना के प्रति उनका झुकाव बचपन में ही दिखाई देने लगा, जब वे अपने सहपाठियों को, छोटे बच्चों को अमराइयों में बिठाकर स्कूली शिक्षा के साथ-साथ सुसंस्कारिता अपनाने वाली आत्मविद्या का शिक्षण दिया करते थे. कहते हैं कि बचपन में वह एक बार हिमालय की ओर भाग निकले और बाद में पकड़े जाने पर बोले कि हिमालय ही उनका घर है और वहीं वे जा रहे थे .
महान समाजसेवी
महामना पं.मदनमोहन मालवीय जी ने श्रीराम आचार्य को काशी में गायत्री मंत्र की दीक्षा दी थी. पंद्रह वर्ष की आयु में वसंत पंचमी की वेला में सन् 1926 में ही लोगों ने उनके अंदर के अवतारी रूप को पहचान लिया था. उन्हें जाति-पाँति का कोई भेद नहीं था. वह कुष्ठ रोगियों की भी सेवा करते थे. इस महान संत ने नारी शक्ति व बेरोजगार युवाओं के लिए गाँव में ही एक बुनताघर स्थापित किया व अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया.
गायत्री परिवार को बनाया युग निर्माण का माध्यम
पूज्य गुरुदेव ने युग निर्माण के मिशन को गायत्री परिवार, प्रज्ञा अभियान के माध्यम से आगे बढ़ाया. वह कहते थे कि अपने को अधिक पवित्र और प्रखर बनाने की तपश्चर्या में जुट जाना- जौ की रोटी व छाछ पर निर्वाह कर आत्मानुशासन सीखना . इसी से वह सार्मथ्य विकसित होगी जो विशुद्धतः परमार्थ प्रयोजनों में नियोजित होगी . राष्ट्र के परावलम्बी होने की पीड़ा भी उन्हे उतनी ही सताती थी जितनी कि गुरुसत्ता के आनेदशानुसार तपकर सिद्धियों के उपार्जन की ललक उनके मन में थी. उनके इस असमंजस को गुरुसत्ता ने ताड़कर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाते संघर्ष करने का भी संकेत था. 1927 से 1933 तक का उनका समय एक सक्रिय स्वयं सेवक व स्वतंत्रता सेनानी के रूप में बीता. घरवालों के विरोध के बावजूद पैदल लम्बा रास्ता पार कर वे आगरा के उस शिविर में पहुंचे, जहां शिक्षण दिया जा रहा था. मित्रों के साथ भूमिगत हो कार्य करते रहे तथा समय आने पर जेल भी गये . उन्हें कई बार जेल हुई.
जेल में भी किया शिक्षा का आदान प्रदान
जेल में भी वह निरक्षर साथियों को शिक्षण देकर व स्वयं अंग्रेजी सीखकर लौटे. स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान कुछ उग्र दौर भी आये, जिनमें शहीद भगतसिंह को फांसी दिये जाने पर फैले जनआक्रोश के समय श्रीराम शर्मा ने भी जमकर इसका विरोध दर्ज कराया.
कैसे मिला श्रीराम मत्त नाम
नमक आन्दोलन के दौरान वे आततायी शासकों के समक्ष झुके नहीं, आन्दोलन के दौरान फिरंगी उन्हें पीटते रहे, झण्डा छीनने का प्रयास करते रहे लेकिन उन्होंने झण्डा नहीं छोड़ा. उन्होंने मुंह से झण्डा पकड़ लिया, गिर पड़े, बेहोश हो गये लेकिन झण्डा नहीं छोड़ा. उनकी सहनशक्ति देखकर सब आश्चर्यचकित रह गये. उन्हें तब से ही आजादी के मतवाले उन्मत्त श्रीराम मत्त नाम मिला. अभी भी आगरा में उनके साथ रहे व्यक्ति उन्हें मत्त जी नाम से ही जानते हैं. स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर मिलने वाली पेंशन को भी उन्होंने प्रधानमंत्री राहत फण्ड को समर्पित कर दिया.
जीवन में आया नया दौर
1935 के बाद उनके जीवन का नया दौर शुरू हुआ, जब गुरुसत्ता की प्रेरणा से वे श्री अरविन्द से मिलने पाण्डिचेरी, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगौर से मिलने शांति निकेतन तथा बापू से मिलने साबरमती आश्रम, अहमदाबाद गये. सांस्कृतिक, आध्यात्मिक मंचो पर राष्ट्र को कैसे परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त किया जाये, यह र्निदेश लेकर अपना अनुष्ठान यथावत् चलाते हुए उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया. आगरा में सैनिक समाचार पत्र के कार्यवाहक संपादक के रूप में श्रीकृष्णदत्त पालीवाल जी ने श्रीराम शर्मा को अपना सहायक बनाया.
अखंड ज्योति पत्रिका का शुभारम्भ
बाबू गुलाब राय व पालीवाल जी से सीख लेते हुए उन्होंने “अखण्ड ज्योति” नामक पत्रिका का पहला अंक 1938 की वसंत पंचमी पर प्रकाशित किया. हाथ से बने कागज पर पैर से चलने वाली मशीन से छापकर अखण्ड ज्योति पत्रिका का शुभारंभ किया, जो पहले तो दो सौ पचास पत्रिका के रूप में निकली, किन्तु आज दस लाख से भी अधिक संख्या में विभिन्न भाषाओं में छपती व करोड़ से अधिक व्यक्तियों द्वारा पढ़ी जाती है.
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कैसे हुआ गायत्री परिवार का निर्माण
आसनसोल जेल में वे पं.जवाहरलाल नेहरू की माता श्रीमती स्वरूपरानी नेहरू, श्री रफी अहमद किदवई, महामना मदनमोहन मालवीय जी, देवदास गाँधी जैसी हस्तियों के साथ रहे व वहां से एक मूलमंत्र सीखा जो मालवीय जी ने दिया था कि जन-जन की साझेदारी बढ़ाने के लिए हर व्यक्ति के अंशदान से, मुट्ठी फण्ड से रचनात्मक प्रवृत्तियां चलाना. यही मंत्र आगे चलकर एक घंटा समयदान, बीस पैसा नित्य या एक दिन की आय एक माह में तथा एक मुट्ठी अन्न रोज डालने के माध्यम से लाखों-करोड़ों की भागीदारी वाला गायत्री परिवार बनता चला गया, जिसका आधार था – प्रत्येक व्यक्ति की यज्ञीय भावना का उसमें समावेश. गायत्री परिवार आज विश्व भर में गायत्री मंत्र की शक्ति का प्रचार-प्रसार कर रहा है.
परम पूज्य गुरुदेव पं.श्रीराम शर्मा आचार्य को एक ऐसी ही सत्ता के रूप में देखा जा सकता है, जो युगों-युगों में गुरु एवं अवतारी सत्ता दोनों ही रूपों में हम सबके बीच प्रकट हुई. गुरु जी की आत्मा 2 जून 1990 को शरीर त्याग कर परमात्मा में विलीन हो गयी. लेकिन आज भी गायत्री परिवार ने उनके मूल्यों और आदर्शों की अखंड ज्योति को संभल के रखा हुआ है.
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