स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने श्रीमती सुषमा स्वराज जी को अर्पित की भावभीनी श्रद्धाजंलि
- देश के सम्बंधों की उष्मा थी सुषमा जी-स्वामी चिदानन्द सरस्वती
- परमार्थ गंगा आरती सुषमा जी को समर्पित की
ऋषिकेश, 7 अगस्त। देश की करूणा हृदय और कद्दावर नेता श्रीमती सुषमा स्वराज जी के निधन पर परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने भावभीनी श्रद्धाजंलि अर्पित की और उनके साथ बिताये कई अनमोल क्षणों को याद किया। परमार्थ निकेतन में आज विश्व के कई देशों से आये लोगों के बीच गंगा जी की आरती सुषमा जी को समर्पित की। स्वामी जी महाराज के पावन सान्निध्य में परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों ओर विश्व के अनेक देशों से आये लोगों ने दो मिनट मौन रखकर आदरणीय सुषमा जी को भावभीनी श्रद्धांजलि समर्पित की और माँ गंगा से प्रार्थना की कि वे पूनः भारत में जन्म लेकर भारत की सेवा और रक्षा करे।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि जैसे ही मैने श्रीमती सुषमा जी के निधन के बारे में सुना तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ। ऐसे लगा कि मानो हम अभी तो मिले ही थे। उनका भीना-भीना अपनापन, मुस्कराता हुआ चेहरा उस पर रजनीगंधा सी मुस्कराहट अद्भुत और अभूतपूर्व उनकी आत्मीयता से वें सहज ही मन को मोहित कर लेती थीं; दिल को छू लेती थी। सुषमा जी सचमुच देश की शान और महिला शक्ति का पहचान थी। साथ ही देश की लोकप्रिय नेता, अद्भुत वक्ता और राजनीतिक शुचिता की धनी थीं। न जाने वे किस माटी की बनी थीं अद्भुत व्यक्तित्व था उनका। वे देश की सुषमा ही नहीं बल्कि वह विश्व के साथ इस देश के सम्बधों की उष्मा भी थी। वह एक राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ भीतर से बहुत ही कोमल भी थी। उनके हमेशा से ही अटल इरादे और सच्चे वादे थे। वे गरीबों, मुश्किल और मजबुरियों में फंसे लोगों के लिये बहुत ही बड़ा सहारा थी। लोग बस एक ट्वीट कर देते और वे तुरन्त सक्रिय हो जाती थीं। उनके पास सभी के लिये मातृ हृदय था, उनके लिये सभी अपने थे।

स्वामी जी महाराज ने कहा कि हमेशा से अखण्ड भारत को देखना चाहती थीं तभी तो उन्होने कुछ घन्टे पहले ही विस्तार से प्रधानमंत्री जी को लिखा कि ’’आदरणीय प्रधानमंत्री जी हार्दिक अभिनन्दन! मैं अपने जीवन में इस दिन को देखने की प्रतीक्षा कर रही थी।’’ ऐसी निष्ठा और समर्पण था उनका, क्योकि वे जानती थीं कि धारा 370 को हटाने का परिणाम कश्मीर के लोग भले ही अभी न समझ रहे हो लेकिन एक दिन अवश्य समझेंगे कि इससे मोदी जी का हित नहीं उनका हित है पूरे देश का हित है।
स्वामी जी ने स्वर्गीय सुषमा स्वराज जी के साथ हुई पुरानी मुलाकातों का जिक्र करते हुये कहा कि हम जब भी मिले कुछ नये और नवोदित करने की ही चर्चा हुई। उनसे हुई हर मुलाकात सचमुच बहुत प्रभावी थी और हृदय को आकर्षित करती थी। उनका व्यक्तित्व, वक्तव्य और उनकी आत्मीयता अत्यंत प्रभावी थी। वे भारत की कद्दावर नेता थी, उनका आन्तरिक कद आसमान को छू लेने वाला था। उनकी राष्ट्र निष्ठा गंगा के समान पवित्र और पावन थी। देश के प्रति जो उनकी समझ थी उसकी गहरायी सागर जैसी थी।

श्रीमती सुषमा स्वराज जी की परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश यात्रा का स्मरण करते हुये स्वामी जी महाराज ने कहा कि जब वे गंगा तट पर आयी, गंगा आरती में सहभाग किया और उस दिन उन्होने चुनरी महोत्सव में भी भाग लिया था। उन्होने परमार्थ गंगा तट के अनुभव को व्यक्त करते हुये कहा कि यह मेरे जीवन का सबसे बेहतरीन और शानदार दिन है, इस दिन की यादे हमेशा मेरे लिये शान्ति प्रदान करने वाली होंगी। स्वामी जी ने कहा कि उसके बाद जब भी वे उनसे मिलना होता तो गंगा आरती के बारे में अवश्य बात करती थीं और कहती थीं कि मैं जब भी समय मिलेगा गंगा आरती में सहभाग करने जरूर आऊँगी, मेरे मन में गंगा जी के दर्शन की हमेशा आस रहती है। स्वामी जी ने कुरूक्षेत्र के मैदान और गीता जयंती को याद करते हुये कहा कि वहां पर हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल खट्टर जी, योगगुरू स्वामी रामदेव जी और लगभग 18 हजार बच्चे थे कुरूक्षेत्र की धरती पर और उन बच्चों के हाथ में भगवत गीता थी, उन सभी ने वहां पर गीता के 18 अध्याय का पाठ किया और उसके बाद आदरणीय सुषमा जी का जो उद्बोधन हुआ, क्या अद्भुत उनकी शैली थी, उस दिन उनके शब्दों ने सभी के दिलों को छू लिया। उन्हों ने कहा था कि ’’ आत्मा अमर है, शरीर अनित्य है और जो भी हमें मिला है, जितने पल मिले हैं, हम उसे राष्ट्र की सेवा के लिये समर्पित करें; अपने कर्मो को कुशलता से सम्पन्न करे; अपना सौ प्रतिशत अपने काम में लगा दें यही जीवन योग है। योगस्थ होकर अपने कर्मों को करने की शिक्षा उन्होने बच्चों को दी। उनके शब्दों को सुनकर ऐसे लगा जैसे वे गीता पढ़ती ही नहीं बल्कि गीता को जीती भी हैं। गीता के प्रति उनकी निष्ठा ही थी कि वे देश की सभी समस्याओं का समाधान उसी के अनुरूप करती थीं।
स्वामी जी महाराज ने कहा कि ऋषिकेश, एम्स इस क्षेत्र के लिये सुषमा जी कि ओर से दिया वरदान ही तो है। वे स्वयं यहां पर आयीं और एम्स को गति प्रदान की और हम जब भी उनसे मिलते वे पूछती थीं कि कैसे चल रहा है ’एम्स’। उन्होने मुझसे शौचालय निर्माण के विषय में भी चर्चा की थी। विदेश मंत्रालय में एनआरआई के लिये एक सदस्य के रूप में कमेटी गठित की गयी थी उसमें उन्होने मुझसे भी प्रार्थना कि थी कि मैं भी उस बैठक में सहभाग कंरू और अपना मार्गदर्शन दूँ। एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि शौचालयों की देश में बहुत जरूरत है, कुछ शौचालय बनायें जाने चाहिये और उन्होने कहा कि शौचालय का एक बड़ा यूनिट जो कि कई शौचालयों का होगा लगभग पांच लाख रूपये तक का बनेगा तो मैने कहा कि लगभग दस यूनिट के लिये हम प्रयास करेंगे। उसके लिये राशि सरकार को भेंट की गयी, शौचालयों के यूनिट बनें। एक बार मिलने पर वे बोली कि अब शौचालय यूनिट का उद्घाटन भी करना है। इतनी व्यस्तता के बाद भी छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखना ही उनकी ही विशेषता थी। लोगों को शौचालय मिले यह उनके लिये देवालय के बराबर था।
जब कोई भी ऐसा शानदार जीवन जीता है तो उन्हें मौत भी मार नहीं सकती है। सुषमा जी हमेशा उनके कार्यो और विचारों के कारण अमर रहेंगी। ’’क्या मार सकेंगी मौत उसे औरों के लिये जो जीता है। उसका हर पल है रामायण, प्रत्येक कर्म ही गीता है।’’ क्या भरोसा है इस जिन्दगी का कुछ भी तो नहीं। इसलिये जब भी मिले जिससे भी मिलें, दिल खोल के मिलें। न जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाये।
परमार्थ गंगा तट पर श्रीमती सुषमा स्वराज जी को भावभीनी श्रद्धाजंलि अर्पित की गयी और आज की विशाल गंगा आरती भी उन्हें समर्पित की गयी।
Editorial Review Note
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