हिन्दू धर्म में पशु-पक्षियों को पूजने का विधान है। नाग पंचमी के दिन नागों की पूजा की जाती है। महाभारत में नागों की उत्पत्ति का वर्णन मिलता है। हिंदू धर्म में नागों को भी देवता माना गया है।
महाभारत आदि ग्रंथों में नागों की उत्पत्ति के बारे में बताया गया है। नागपंचमी के दिन आठ नागों की पूजा होती है। इनमें अनन्त, वासुकि, पद्म, महापद्म, तक्षक, कुलीक, कर्कट और शंख हैं।
अनंत (शेषनाग)
कद्रू के बेटों में सबसे पराक्रमी शेषनाग थे जिसको अनंत के नाम से भी जाना जाता है. जब शेषनाग को पता चला की उनकी माता और भाइयो में मिलकर विनता के साथ छल-कपट किया है तो वे अपनी माँ और भाइयो को छोड़ कर गंधमादन पर्वत पर तपस्या करने के लिए चले गए और तपस्या से प्रसन होकर ब्रह्मा ने उन्हें वरदान दिया की तुम्हारी बिद्धि कभी धर्म से विचलित नहीं होगी.
ब्रह्मा ने शेषनाग को प्रसन हो कर एक और बात कही की यह पृथ्वी निरंतर हिलती और दुलती रहती है तो तुम अपनी फन पर उस प्रकार धारण करो की वे स्थिर हो जाये. तो इस प्रकार शेषनाग में अपनी फन पर पूरी पृथ्वी को धारण कर लिया. पुराणों के मुताबिक भगवान् विष्णु शेषनाग के आसन पर ही बिराजित है, और पुराणों में वर्णित है की श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम और श्री राम के छोटे भाई लक्ष्मण शेषनाग के ही अवतार है.
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वासुकि
अनेक ग्रंथो में वासुकी को ही नागो का राजा बताया गया है, और ये भी महर्षि कश्यप और कद्रू के ही संतान थे. जब माता कद्रू ने नागो को सर्प यज्ञ में भस्म होने का श्राप दिया तब नाग जाती को बचने के लिए वासुकी बहुत ही चिंतित हुए और तभी एलापत्र नाम के एक नाग ने उन्हें बताया की आपकी बहन जरत्कारू से उत्पन पुत्र ही ये सर्प यज्ञ को रूक पायेगा.
तभी नागराज वासुकी ने अपनी बहन का विवाह ऋषि जरत्कारू से करवा दिया और समय आने पर जरत्कारू ने आस्तिक नामक विद्वान् पुत्र को जन्म दिया. आस्तिक ने ही प्रिय वचन कह कर राजा जनमेजय के सर्प यज्ञ को बंध करवाया. अगर धर्म ग्रंथो की माने तो समुद्र मंथन के अनुसार नागराज वासुकी की नेति बने थी और वो त्रिपुरदाह के समय वासुकी ही शिव धनुष की डोर बने थे.
पद्म
पद्म नागों का गोमती नदी के पास के नेमिश नामक क्षेत्र पर शासन था। बाद में ये मणिपुर में बस गए थे। कहते हैं असम में नागवंशी इन्हीं के वंशज हैं।
महापद्म
विष्णुपुराण में सर्प के विभिन्न कुलों में महाद्म का नाम आया है।
तक्षक नाग
तक्षक के संदर्भ में महाभारत में वर्णन मिलता है की तक्षक पातालवासी आठ नागो में से एक है. शृंगी ऋषि के श्राप के कारण तक्षक ने परीक्षित को डसा था और उनकी मृत्यु हो गयी थी. और इस बात का बदला लेने के लिए परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने एक सर्प यज्ञ करवाया और उसमे अनेक सर्प आ कर गिरने लगे यह देख कर तक्षक इंद्रा की शरण में चला गया.
और जैसे ही यज्ञ करने वाले ब्राह्मणों ने तक्षक का नाम ले कर आहुति यज्ञ में डाली तो तक्षक देवलोक के यज्ञ कुंड में गिर गया. तभी ही आस्तिक ऋषि ने अपने मंत्रो से उन्हें आकाश में ही स्थिर कर दिया तभी आस्तिक मुनि के कहने पर जनमेजय ने सर्प यज्ञ को रोक दिया और तक्षक के प्राण भी बच गए. अगर ग्रंथो की माने तो तक्षक ही भगवान् शिव के गले में लिपटा हुआ रहता है।
कुलिक
कुलिक नाग जाति में ब्राह्मण कुल की मानी जाती है। कुलिक नाग का संबंध ब्रह्मा जी से भी माना जाता है।
कर्कट नाग
कर्कट शिव के एक गण हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सर्पों की मां कद्रू ने जब नागों को सर्प यज्ञ में भस्म होने का श्राप दिया तब भयभीत होकर कंबल नाग ब्रह्माजी के लोक में, शंखचूड़ मणिपुर राज्य में, कालिया नाग यमुना में, धृतराष्ट्र नाग प्रयाग में, एलापत्र ब्रह्मलोक में और अन्य कुरुक्षेत्र में तप करने चले गए।
कर्कोटक नाग ने महाकाल वन में महा माया के सामने स्थित लिंग की स्तुति की तभी भगवान् शिव ने प्रस्सन होकर कहा की जो भी नाग धर्म का आचरण करते है उनका विनाश नहीं होगा. और इसके उपरांत कर्कोटक नाग उसी शिवलिंग में समा गया. और तभी से उस लिंग को कर्कोतेश्वर के नाम से जाना जाता है. एक मान्यता है की जो भी लोग पंचमी, चतुर्दशी या फिर रविवार के दिन कर्कोतेश्वर शिवलिंग की पूजा करते है उनको सर्प पीड़ा नहीं भुगतनी पड़ती.
शंख
नागों के आठ कुलों में शंख एक हैं। शंख नाग जातियों में सबसे बुद्धिमान है।
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