इस्लाम क्या है, क्या है इस्लाम के मूलभूत सिद्धांत
इस्लाम धर्म की शुरुआत सातवीं सदी में सऊदी अरब से हुई थी। इसी कारण इस्लाम को दुनिया के सबसे नए धर्मों में गिना जाता है। कहा जाता है कि पैगंबर मोहम्मद ने इस्लाम धर्म की शुरुआत 610 ईस्वी में की थी। पैगंबर मोहम्मद ही वह इंसान है जिसने दुनिया को कुरान से रूबरू कराया हालांकि कई लोगों का मानना है कि इस्लाम धर्म पैगेंबर मोहम्मद के जन्म से पहले ही दुनिया में आ गया था।
कौन थे पैगाम्बर मोहम्मद ?
पैगंबर मोहम्मद का जन्म 570 ईस्वी में मक्का में हुआ था। पैगंबर के वालिदैन का नाम अब्दुल्लाह और अमिनाह बताया जाता है उनके सर से वालिदैन का साया कम उम्र में ही उठ गया था जिसके बाद उनकी परवरिश उनके चाचा-जान ने की। बताया जाता है कि मोहम्मद के चाचा ने उनका निकाह 25 वर्ष की उम्र में एक 40 वर्ष की खादिरझा के साथ तय कर दिया था, शादी के बाद उनकी चार बेटियां और दो बेटे थे।
पैगेंबर मोहम्मद ही वह व्यक्ति हैं जिन्होंने इस्लाम को मक्का से मदीना कि ओर बढ़ाया था। उन्होंने धीरे-धीरे अपने साथ लोगों को इस्लाम का महत्व बताते हुए मक्का से मदिना कि ओर ले गए। 632ईस्वी में 63 साल के पैगंबर मोहम्मद का इंतकाल हो गया लेकिन इस्लाम धर्म को अपने आगे बढ़ाने के लिए एक नया वारिस मिल गया जिनका नाम था खलीफा अबुबक्र.। खलीफा ने इस्लाम को सभी देशों में आगे बढ़ाया जिसकी वजह से आज इस्लाम इतना बड़ा और इतना पवित्र धर्म बन गया है।
मोहम्मद कि मौत के बात उनको मदिना के ऊपर मकबरे में दफना दिया गया जिसे आज को मदिना मस्जिद के नाम से जाना जाता है. और हर साल ईद के अफसर पर यहाँ हजारों मुसलमान ईद मनाने आते हैं यह मंजर दुनिया के सबसे खूबसूरत नजारो में से एक माना जाता है. इस मस्जिद को दुनिया कि सबसे पवित्र मस्जिद माना जाता है और यह दुनिया के सभी इस्लाम का पालन करने वाले लोगों के जीवन में एक महत्वपूर्ण जगह रखती है.
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कुरान का अस्तित्त्व

इस्लाम के अनुयायी, विश्वास करते हैं, कि कुरान पहले से ही अस्तित्व में है और अल्लाह के सिद्ध वचन हैं. इसके अतिरिक्त, कई मुस्लिम कुरान के अन्य सभी भाषाओं में किए हुए अनुवादों को अस्वीकार कर देते हैं. कुरान का अनुवाद एक वैध संस्करण नहीं है, वैध संस्करण केवल अरबी में ही विद्यमान है. यद्यपि कुरान मुख्य रूप से पवित्र है, सुनाह को धार्मिक निर्देशों का द्वितीय स्रोत माना जाता है. सुनाह मुहम्मद के साथियों के द्वारा जो कुछ मुहम्मद ने कहा, किया और स्वीकृत किया इत्यादि को लिखा गया है.
इस्लाम की मान्यताएं
इस्लाम की मुख्य मान्यताएँ यह हैं, कि एक ही सच्चा परमेश्वर है और यह कि मुहम्मद अल्लाह का नबी अर्थात् भविष्यद्वक्ता था. बस इस वाक्य को कहने मात्र से ही, एक व्यक्ति इस्लाम में धर्म परिवर्तित हो जाता है. शब्द “मुस्लिम” का अर्थ “वह व्यक्ति जो स्वयं को अल्लाह को समर्पित करता है.” इस्लाम स्वयं को एक सच्चा धर्म कहता है, जहाँ से अन्य सभी धर्मों (जिसमें यहूदी और ईसाई धर्म भी सम्मिलित हैं) निकल कर आए हैं.
इस्लाम के मूलभूत सिद्धांत
मुस्लिम अपने जीवनों को पाँच स्तम्भों पर आधारित करता है:
1. विश्वास की गवाही देना : “एक ही सच्चा परमेश्वर (अल्लाह) है और यह कि मुहम्मद अल्लाह का नबी (भविष्यद्वक्ता) है.”
2. प्रार्थना करना :पाँच प्रार्थनाओं का पालन प्रतिदिन करना चाहिए.
3. दान देना : एक व्यक्ति को आवश्यकता में पड़े हुओं की सहायता करनी चाहिए, क्योंकि सब कुछ अल्लाह की ओर से आता है.
4. उपवास करना : कभी-कभी के उपवास के अतिरिक्त, सभी मुसलमानों को रमजान (जो इस्लाम के पंचांग का नौवां महीना है), के महीने में किए जाने वाले उपवास को भी मनाना चाहिए).
5. हज़ पर जाना : मक्का की तीर्थयात्रा (मकाह) को जीवन में कम से कम एक बार अवश्य किया जाना चाहिए (जो इस्लाम के पंचांग का बारहवां महीना है)
इन पांच सिद्धान्तों, जो मुसलमानों के लिए आज्ञाकारिता के ढांचे हैं, को गम्भीरता से और शाब्दिक रीति से लिया जाना चाहिए. एक मुस्लिम का स्वर्गलोक में प्रवेश इन पाँच सिद्धान्तों की आज्ञा पालन के ऊपर ही टिका हुआ है।
ईसाई धर्म के सामान होते हुए भी बहुत अलग है इस्लाम
ईसाई धर्म के सम्बन्ध में, इस्लाम की बहुत सी समानताएँ और महत्वपूर्ण भिन्नताएँ हैं. ईसाई धर्म की तरह ही, इस्लाम एकेश्वरवादी धर्म है, परन्तु मसीहियत के विपरीत, इस्लाम त्रिएकत्व के सिद्धान्त को अस्वीकार कर देता है. इस्लाम बाइबल के निश्चित संदर्भों को स्वीकार करता है, जैसे कि व्यवस्था और सुसमाचार, परन्तु इसके बहुत से संदर्भों को ईशनिन्दा और प्रेरणारहित मानते हुए अस्वीकार कर देता है.
इस्लाम दावा करता है, कि यीशु मात्र एक भविष्यद्वक्ता ही था, परमेश्वर का पुत्र नहीं (केवल अल्लाह ही परमेश्वर है, मुस्लिम विश्वास करते हैं, और यह कि कैसे उसका एक पुत्र हो सकता है?). इसकी अपेक्षा, इस्लाम यह मानता है, कि यद्यपि वह एक कुँवारी से उत्पन्न हुआ, तो भी वह आदम की तरह ही, पृथ्वी की मिट्टी से रचा गया था. मुस्लिम विश्वास करते हैं, कि यीशु क्रूस के ऊपर नहीं मरा था, वे मसीहियत की इस केन्द्रीय शिक्षाओं में इस का इन्कार कर देते हैं.
इस्लाम की शिक्षा
अन्त में, इस्लाम शिक्षा देता है, कि स्वर्गलोक भले कामों और कुरान के प्रति आज्ञाकारी रहने से प्राप्त हो सकता है. इसके विपरीत, बाइबल, प्रगट करती है, कि मनुष्य कभी भी पवित्र परमेश्वर के मानकों तक नहीं पहुँच सकता है. उसकी दया और प्रेम के कारण मसीह में विश्वास करने के द्वारा ही मात्र पापियों का उद्धार हो सकता है।
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