RELIGION WORLD — THE INDEPENDENT SCIENTIFIC & INTERFAITH JOURNAL
Navigation

© 2026 Religion World Foundation.

Global Faith • Scientific Heritage • Human Ethics

शरद पूर्णिमा 2018 : पौराणिक मान्यता, व्रत विधि और सावधानियां

शरद पूर्णिमा 2018 : पौराणिक मान्यता, व्रत विधि और सावधानियां

शरद पूर्णिमा 2018 : पौराणिक मान्यता, व्रत विधि और सावधानियां
Visual Archive

शरद पूर्णिमा 2018 : पौराणिक मान्यता, व्रत विधि और सावधानियां

शरद पूर्णिमा 2018

शरद पूर्ण‍िमा बड़ी ही उत्तम तिथि है शरद पूर्णिमा। इसे कोजागरी व्रत के रूप में भी मनाया जाता है। कहते हैं यह दिन इतना शुभ और सकारात्मक होता है कि छोटे से उपाय से बड़ीबड़ी विपत्तियां टल जाती हैं। इस वर्ष शरद पूर्णिमा आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को होती है। साल 2018 में शरद पूर्णिमा 23 अक्टूबर 2018 के दिन होगी। शरद पूर्णिमा का महत्व बहुत अधिक है। शरद पूर्णिमा के दिन लोग व्रत करते है।  पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार यह वहीं दिन है जब द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के संग रास रचाया था। ऐसी मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात को चन्द्रमा से अमृत की वर्षा होती है। यह अमृत चन्द्रमा की 16 कलाओं में से धरती पर बरसता है। शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा या कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है।

पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक इसी दिन मां लक्ष्मी का जन्म हुआ था। इसलिए धन प्राप्ति के लिए यह तिथि सबसे उत्तम मानी जाती है। इस दिन प्रेमावतार भगवान श्रीकृष्ण, धन की देवी मां लक्ष्मी और सोलह कलाओं वाले चंद्रमा की उपासना से अलगअलग वरदान प्राप्त किए जाते हैं।

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि शरद पूर्णिमा का महत्व शास्त्रों में भी बताया गया है।ऐसी मान्यता है कि चन्द्रमा से निकलने वाले अमृत को कोई भी साधारण व्यक्ति ग्रहण कर सकता है।चन्द्रमा से बरसने वाले अमृत को सफेद खाने योग्य वस्तु के माध्यम से कोई भी व्यक्ति अपने शरीर में प्राप्त कर सकता है।माना जाता है कि शरद पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा की रोशनी यानी चांदनी में समय बिताने वाले व्यक्ति को भी चन्द्रमा से बरसने वाले अमृत की प्राप्ति होती है।

चांद की रोशनी में बैठने से, चांद की रोशनी में 4 घण्टे रखा भोजन खाने से और चन्द्रमा के दर्शन करने से व्यक्ति आरोग्यता को प्राप्त करता है। रोगियों के लिए शरद पूर्णिमा की रात को बहुत विशेष माना जाता है। क्योकि शरद पूर्णिमा की रात को चन्द्रमा की रोशनी से निकलने वाला अमृत रोगियों के रोगों को दूर करता है। इस रात्रि की मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने करकमलों में वर और अभय लिए संसार में विचरती हैं और मन ही मन संकल्प करती हैं कि इस समय भूतल पर कौन जाग रहा है?

जागकर मेरी पूजा में लगे हुए उस मनुष्य को मैं आज धन दूँगी।इस प्रकार प्रतिवर्ष किया जाने वाला यह को जागर व्रत लक्ष्मी जी को संतुष्ट करने वाला है। इससे प्रसन्न हुईं माँ लक्ष्मी इस लोक में तो समृद्धि देती ही हैं और शरीर का अंत होने पर परलोक में भी सद्गति प्रदान करती हैं।

 शरद पूर्णिमा का शुभ मुहूर्त 

शरद पूर्णिमा या कहें कोजागर व्रत अश्विन माह की पूर्णिमा को रखा जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार इस वर्ष यह तिथि 23-24 अक्तूबर 2018 को है।

चंद्रोदय – 17:14 बजे (23 अक्तूबर 2018)

चंद्रोदय – 17:49 बजे (24 अक्तूबर 2018)

पूर्णिमा तिथि आरंभ – 22:36 बजे (23 अक्तूबर 2018)

पूर्णिमा तिथि समाप्त – 22:14 बजे (24 अक्तूबर 2018)

शरद पूर्णिमा का महत्व

शरद पूर्णिमा का महत्व शास्त्रों में भी बताया गया है। ऐसी मान्यता है कि चन्द्रमा से निकलने वाले अमृत को कोई भी साधारण व्यक्ति ग्रहण कर सकता है। चन्द्रमा से बरसने वाले अमृत को सफेद खाने योग्य वस्तु के माध्यम से कोई भी व्यक्ति अपने शरीर में प्राप्त कर सकता है।

पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि शरद पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा की रोशनी यानी चांदनी में समय बिताने वाले व्यक्ति को भी चन्द्रमा से बरसने वाले अमृत की प्राप्ति होती है। चांद की रोशनी में बैठने से, चांद की रोशनी में 4 घण्टे रखा भोजन खाने से और चन्द्रमा के दर्शन करने से व्यक्ति आरोग्यता को प्राप्त करता है।

रोगियों के लिए शरद पूर्णिमा की रात को बहुत विशेष माना जाता है। क्योकि शरद पूर्णिमा की रात को चन्द्रमा की रोशनी से निकलने वाला अमृत रोगियों के रोगों को दूर करता है। इस रात्रि की मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने करकमलों में वर और अभय लिए संसार में विचरती हैं और मन ही मन संकल्प करती हैं कि इस समय भूतल पर कौन जाग रहा है?

जागकर मेरी पूजा में लगे हुए उस मनुष्य को मैं आज धन दूँगी। इस प्रकार प्रतिवर्ष किया जाने वाला यह कोजागर व्रत लक्ष्मीजी को संतुष्ट करने वाला है। इससे प्रसन्न हुईं माँ लक्ष्मी इस लोक में तो समृद्धि देती ही हैं और शरीर का अंत होने पर परलोक में भी सद्गति प्रदान करती हैं।

शरद पूर्णिमा पूजा विधि

शरद पूर्णिमा के दिन ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नानादि कर पवित्र हो जाएं।

शरद पूर्णिमा के दिन सफेद वस्त्र धारण करने चाहिए।

इस दिन व्रत करने वाले को लक्ष्मीनारायण की उपासना करनी चाहिए।

पूरा दिन नाम जप, भजन व ध्यान आदि में व्यतीत करने का प्रयास करें।

संध्या के समय शरद पूर्णिमा कथा का श्रवण करें।

मां लक्ष्मी के श्री यंत्र का दर्शन करें।

लक्ष्मी नारायण की पूजा करें।

इस दिन खीर बनाकर चन्द्रमा की रोशनी में लगभग 4 घण्टे के लिए रखें।

खीर किसी पात्र में डालकर ऐसे स्थान पर रखें जहां चांदनी आती हो।

चाहें तो खीर को सफेद झीने वस्त्र से धककर भी रख सकते है।

खीर को चांदनी से हटाने के बाद श्री लक्ष्मीनारायण को उसका भोग लगाएं।

भोग लगी खीर को प्रसाद रूप में बांटें व खाएं।

शरद पूर्णिमा अमृत की खीर

पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात को चन्द्रमा से निकलने वाली ऊर्जा को अमृत के समान चमत्कारी माना जाता है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि इस रात चन्द्रमा से निकलने वाली समस्त ऊर्जा उस खीर के भोग में सम्माहित हो जाती है। इसे प्रसाद रूप में लेने वाले व्यक्ति की दीर्घायु होती है। इस प्रसाद से रोगशोक दूर होते है।

बिमारियों का नाश करने वाली है ये अमृत वाली खीर। रोगियों के लिए शरद पूर्णिमा की अमृत की खीर वरदान साबित होता है। स्वस्थ लोगों के लिए यह रात सेहत और सम्पति देने वाली है। इसलिए शरद पूर्णिमा को अमृत वाली खीर खाने के बहुत फायदे होते हैं। इस खीर को खाने वाला व्यक्ति प्रसिद्धि को प्राप्त करता है।

शरद पूर्णिमा वैज्ञानिक महत्व

शरद पूर्णिमा की रात औषधियों की स्पंदन क्षमता अधिक हो जाती है। रसाकर्षण के कारण जब अंदर का पदार्थ सांद्र होने लगता है, तब रिक्तिकाओं से विशेष प्रकार की ध्वनि उत्पन्न होती है। सोमचक्र, नक्षत्रीय चक्र और आश्विन के त्रिकोण के कारण शरद ऋतु से ऊर्जा का संग्रह होता है और बसंत में निग्रह होता है।

दुग्ध में लैक्टिक अम्ल और अमृत तत्व होता है। यह तत्व किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति का शोषण करता है। चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया और आसान हो जाती है। इसी कारण ऋषिमुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर खुले आसमान में रखने का विधान किया है। यह परंपरा विज्ञान पर आधारित है।

शरद पूर्णिमा व्रत विधि

  • पूर्णिमा के दिन सुबह में इष्टदेव का पूजन करना चाहिए।
  • इन्द्र और महालक्ष्मी जी का पूजन कर के घी के दीपक जलाकर उसकी गन्ध पुष्प आदि से पूजा करनी चाहिए।
  • ब्राह्मणों को खीर का भोजन कराना चाहिए और उन्हें दान दक्षिणा प्रदान करनी चाहिए।
  • लक्ष्मी प्राप्ति के लिए इस व्रत को विशेष रुप से किया जाता है. इस दिन जागरण करने वालों की धनसंपत्तिमेंवृद्धिहोतीहै।
  • रात को चन्द्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही भोजन करना चाहिए।
  • मंदिर में खीर आदि दान करने का विधिविधान है. ऐसा माना जाता है कि इस दिन चांद की चांदनी से अमृत बरसता है। 

शरद पूर्णिमा पूजन में  सावधानियां

इस दिन पूर्ण रूप से जल और फल ग्रहण करके उपवास रखने का प्रयास करें।

उपवास ना भी रखें तो भी इस दिन सात्विक आहार ही ग्रहण करना चाहिए। 

शरीर के शुद्ध और खाली रहने से आप ज्यादा बेहतर तरीके से अमृत की प्राप्ति कर पाएंगे। 

इस दिन काले रंग का प्रयोग न करें, चमकदार सफेद रंग के वस्त्र धारण करें तो ज्यादा अच्छा होगा। 

शरद पूर्णिमा व्रत की कथा

शरद पूर्णिमा की पौराणिक कथा भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोपियों संग महारास रचाने से तो जुड़ी ही है लेकिन इसके महत्व को बताती एक अन्य कथा भी मिलती है जो इस प्रकार है।

प्रचलित मान्यतानुसार बहुत समय पहले एक नगर में एक साहुकार रहता था। उसकी दो पुत्रियां थी। दोनों पुत्री पूर्णिमा को उपवास रखती लेकिन छोटी पुत्री हमेशा उस उपवास को अधूरा रखती और दूसरी हमेशा पूरी लगन और श्रद्धा के साथ पूरे व्रत का पालन करती। समयोपरांत दोनों का विवाह हुआ। विवाह के पश्चात बड़ी जो कि पूरी आस्था से उपवास रखती ने बहुत ही सुंदर और स्वस्थ संतान को जन्म दिया जबकि छोटी पुत्री के संतान की बात या तो सिरे नहीं चढ़ती या फिर संतान जन्मी तो वह जीवित नहीं रहती। वह काफी परेशान रहने लगी। उसके साथसाथ उसके पति भी परेशान रहते। उन्होंने ब्राह्मणों को बुलाकर उसकी कुंडली दिखाई और जानना चाहा कि आखिर उसके साथ ऐसा क्यों हो रहा है। विद्वान पंडितों ने बताया कि इसने पूर्णिमा के अधूरे व्रत किये हैं इसलिये इसके साथ ऐसा हो रहा है। तब ब्राह्मणों ने उसे व्रत की विधि बताई व अश्विन मास की पूर्णिमा का उपवास रखने का सुझाव दिया। इस बार उसने विधिपूर्वक व्रत रखा लेकिन इस बार संतान जन्म के पश्चात कुछ दिनों तक ही जीवित रही। उसने मृत शीशु को पीढ़े पर लिटाकर उस पर कपड़ा रख दिया और अपनी बहन को बुला लाई बैठने के लिये उसने वही पीढ़ा उसे दे दिया। बड़ी बहन पीढ़े पर बैठने ही वाली थी उसके कपड़े के छूते ही बच्चे के रोने की आवाज़ आने लगी। उसकी बड़ी बहन को बहुत आश्चर्य हुआ और कहा कि तू अपनी ही संतान को मारने का दोष मुझ पर लगाना चाहती थी। अगर इसे कुछ हो जाता तो। तब छोटी ने कहा कि यह तो पहले से मरा हुआ था आपके प्रताप से ही यह जीवित हुआ है। बस फिर क्या था। पूर्णिमा व्रत की शक्ति का महत्व पूरे नगर में फैल गया और नगर में विधि विधान से हर कोई यह उपवास रखे इसकी राजकीय घोषणा करवाई गई।

RW

Editorial Review Note

Religion World is the country's only website that provides complete information on all religions. Religion World will always present information about all religions impartially. You can send us all kinds of information, news, updates, opinions, and suggestions at religionworldin@gmail.com.You can also follow us on X (Twitter), Facebook, and YouTube.

By Religion World October 24, 2018 9 min read
Share:

Related Historical & Critical Essays

Hinduism

क्या आप जानते हैं, शरद पूर्णिमा की रात को दूध और खीर क्यों रखी जाती है?

क्या आप जानते हैं, शरद पूर्णिमा की रात को दूध और खीर क्यों रखी जाती है? शरद पूर्णिमा, जिसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है, भारतीय परंपरा में…

Read now
Hinduism

जानिये कार्तिक पूर्णिमा को क्यों मनाते हैं देव दीपावली? पढ़ें ये दो पौराणिक कथाएं

कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को भगवान शिव की नगरी काशी यानी बनारस में देव दीपावली मनाई जाती है। देव दीपावली के दिन भगवान शिव और गंगा माता…

Read now
Hinduism

शरद पूर्णिमा: जानिए क्या है चांद की रोशनी में खीर रखने का वैज्ञानिक महत्व

इस वर्ष शरद पूर्णिमा 30 अक्टूबर को मनाई जाएगी. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से पूर्ण होकर अमृत वर्षा करता है. इस दिन चाँद…

Read now

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *