हिन्दू धर्म त्याग कर डॉ. भीमराव आंबेडकर ने बौद्ध धर्म का ही क्यों किया पालन ?

डॉ. भीमराव अंबेडकर! नाम किसी पहचान का मोहताज नहीं है. भीमराव आंबेडकर जिन्होंने संविधान की रचना की. भीमराव आंबेडकर जिन्होंने कहा था, मैं पैदा तो हिन्दू हुआ हूँ लेकिन मरूँगा हिन्दू नहीं. डॉ, अम्बेडकर के सम्बन्ध में अक्सर सवाल उठाया जाता है कि उन्होंने आदिधर्मी, आजीवक पंथ को स्वीकार क्यों नहीं किया? बौद्ध धर्म को स्वीकार करने के पीछे का क्या कारण है. उन्होंने बौद्ध धम्म ही क्यों स्वीकार किया?
इस सवाल का जवाब ज़रूरी हो गया है. कोलंबिया विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान डॉ. अंबेडकर ने अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र के साथ-साथ इतिहास, दर्शन और धर्म ग्रंथों का भी गहनता से अध्ययन किया. डॉ. अंबेडकर ने अपने शोध द्वारा यह निष्कर्ष निकाला कि भारत वर्ष की गुलामी, गरीबी और दुर्दशा का कारण प्रचलित जाति-व्यवस्था है, जिसके कारण हमारे देश की बहुसंख्यक आबादी को समुचित विकास का अवसर नहीं मिल रहा है. डॉ. अंबेडकर ने एक ऐसे भारत का सपना देखा था जो समृद्ध हो, शक्तिशाली हो, विकसित हो और दुनिया में अग्रणी हो. डॉ. अंबेडकर का मानना था कि जाति-व्यवस्था को तोड़े बिना भारत को समृद्ध और शक्तिशाली नहीं बनाया जा सकता. जाति-व्यवस्था को बनाए रखने का अर्थ है कि भारत के समृद्ध और विकसित होने में बाधा खड़ी करना.
देश तभी शक्तिशाली और समृद्ध हो सकता है जब उस देश के प्रत्येक नागरिक को उसकी क्षमताओं के विकास का अवसर मिले और नागरिकों के बीच भेद-भाव, ऊंच-नीच और असमानता का बर्ताव न हो ताकि प्रत्येक नागरिक राष्ट्र के विकास में अपना योगदान देने में सक्षम हो. इसलिए डॉ. अंबेडकर एक ऐसे धर्म की तलाश में थे जिसमें सब को विकास का समान अवसर मिले, जो लोगों में स्वतंत्रता, समानता, न्याय, सौहार्द और भाईचारे की भावना का विकास कर सके.
बुद्ध की शिक्षाओं से हुआ परिचय

डॉ. अंबेडकर का तथागत बुद्ध की शिक्षाओं से परिचय सन् 1907 में ही हो गया था, जब उनके शिक्षक श्री केलुस्कर ने उन्हें स्वलिखित पुस्तक ‘गौतम बुद्ध की जीवनी’ भेंट की थी. लेकिन बौद्ध धम्म का गहन अध्ययन बाबासाहेब ने कोलंबिया जाने के बाद ही किया. सन् 1950 में महाबोधि सोसायटी द्वारा प्रकाशित ‘महाबोधि’ पत्रिका में प्रकाशित एक लेख में डॉ. अंबेडकर ने लिखा था कि एक अच्छे धर्म में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का समावेश होना चाहिए. प्रचलित धर्मों में से किसी में उपरोक्त तीन गुणों में से एक गुण या दो गुण ही मिलते हैं. केवल बौद्ध धर्म में उपरोक्त तीनों गुणों का समावेश है. तथागत गौतम बुद्ध ने अपनी शिक्षाओं द्वारा अहिंसा के साथ-साथ सामाजिक स्वतंत्रता, बौद्धिक स्वतंत्रता, आर्थिक स्वतंत्रता और राजनीतिक स्वतंत्रता का भी आंदोलन चलाया था.
बौद्ध धर्म में महिलाओं को बराबरी का दर्जा

बुद्ध ने महिलाओं को पुरूषों के बराबर अधिकार देकर महिला सशक्तिकरण के आंदोलन की नींव रखी थी. गौतम बुद्ध ने स्त्रियों को शिक्षा पाने, भिक्षुणी बनने आदि का अधिकार दिया और उन्हें पूर्ण बौद्धिक-स्वतन्त्रता प्रदान की. डॉ. अंबेडकर इस बौद्धिक क्रांति का उल्लेख करते हुए लिखते हैं, ‘महात्मा बुद्ध ने स्त्रियों को प्रव्रज्या का अधिकार देकर एक साथ दो दोषों को दूर किया. एक तो उनको ज्ञानवान होने का अधिकार दिया, दूसरे उन्हें पुरुष के समान अपनी मानसिक सम्भावनाओं को अनुभव करने का हक दिया. यह एक क्रांति और भारत में नारी-स्वतन्त्रता, दोनों थी.’
सामजिक समानता की स्थापना

भगवान् बुद्ध समाजिक समानता के समर्थक थे. भिक्षु संघ का संविधान सबसे अधिक लोकतांत्रिक संविधान था. वह अन्य भिक्षुओं में से केवल एक भिक्षु थे. अधिक से अधिक वह मंत्रि-मंडल के सदस्यों के बीच एक प्रधानमंत्री के समान थे. वह तानाशाह कभी नहीं थे. महात्मा बुद्ध की मृत्यु से पहले उनको दो बार कहा गया कि वह संघ पर नियंत्रण रखने के लिए किसी व्यक्ति को संघ का प्रमुख नियुक्त कर दें, परंतु हर बार उन्होंने यह कह कर इंकार कर दिया कि ‘धम्म’ संघ का सर्वोच्च सेनापति है.
गौतम बुद्ध की शिक्षाओं के केन्द्र में जातिगत भेदभाव खत्म करके सामाजिक समानता की स्थापना करना था. बुद्ध ने बारंबार कहा कि जन्म से न कोई ब्राह्मण होता है और न कोई शूद्र. इंसान का मूल्य उसकी जाति से नहीं, उसके कामों से आंका जाता है. उन्होंने कहा कि कर्म से ही इंसान ब्राह्मण बनता है और कर्म से ही चाण्डाल. बौद्ध धम्म पूरी तरह समतावादी है. भिक्षु और स्वयं बुद्ध भी मूलतः जीर्ण-शीर्ण वस्त्र (चीवर) पहनते थे.
भगवान बुद्ध ने प्रजातान्त्रिक मूल्यों को बहुत महत्त्व दिया. उनके द्वारा स्थापित भिक्खु संघ और भिक्खुणी संघ दोनों का संगठन और संचालन पूरी तरह प्रजातान्त्रिक ढंग से होता था. संघ के कायदे-कानून और उनको चलाने की प्रक्रिया से पता चलता है कि ब्रिटेन में प्रजातंत्र आने से दो हजार साल पहले बुद्ध ने भिक्खु और भिक्खुणी संघ में प्रजातंत्र की प्रणाली लागू कर दी थी. संघ की भाषा इस बात का उदाहरण है. गौतम बुद्ध चौदह भाषाओं में दक्ष थे, फिर भी उन्होंने सारे उपदेश उन दिनों की लोकभाषा पालि में ही दिए, जिससे आम जनता धम्म को समझ सके और अपने जीवन में अपना सके. बुद्ध ने भारत के इतिहास में पहली बार अभिजात वर्ग की भाषा के स्थान पर लोकभाषा को प्रतिष्ठित किया.
अपराधिक प्रवृत्तियां दूर करने पर जोर

भगवान बुद्ध ने अपने आर्थिक और राजनीतिक विचार चक्कवत्ती सिंहनाद सूत्त और कूटदन्त सूत्त में व्यक्त किए हैं. महात्मा बुद्ध कहते थे, “चोरी,हिंसा, नफरत, निर्दयता जैसे अपराधों और अनैतिक कार्यों का कारण गरीबी है. इन अपराधों को सजा देकर नहीं रोका जा सकता है.”
यहाँ महात्मा बुद्ध का एक संस्मरण प्रस्तुत है…
एक बार एक गाँव में महात्मा बुद्ध उपदेश देने वाले थे तभी वहां एक गरीब व्यक्ति भूखा पहुंचा. बुद्ध बोले, पहले इस व्यक्ति को खाना खिलाओ तब उपदेश शुरू होंगे भगवान बुद्ध ने कहा, ‘भूखे आदमी का मन उपदेश सुनने में कैसे लगेगा? भूख से बड़ा कोई दुःख नहीं होता. भूख हमारे शरीर की ताकत को खत्म कर देती है, जिससे हमारी खुशी, शांति,स्वास्थ्य सभी समाप्त हो जाते हैं. हमको भूखे लोगों को कभी नहीं भूलना चाहिए. अगर हमें एक समय का खाना न मिले तो परेशानी होने लगती है, तो उन लोगों के कष्ट की कल्पना कीजिए जिनको दिनों और हफ्तों तक बराबर खाना नहीं मिलता. हमें ऐसा इन्तजाम करना चाहिए जिससे इस दुनिया में एक भी व्यक्ति को भूखा रहना न पड़े.’
इसी तरह एक और प्रसंग जहाँ श्रावस्ती के राजा को महात्मा बुद्ध ने अपराधियों को शारीरिक दंड न देकर उनके अपराधी बनने के पीछे के कारण को जानकर उस समस्या का समाधान करने को कहा. इस तरह बुद्ध ने कानून-व्यवस्था और अमन-चैन कायम करने के लिए भय और दण्ड का सहारा न लेकर लोगों की समस्याओं को समझकर उन्हें सुलझाने को कहा. जिससे समस्या की जड़ को समाप्त किया जा सके.
बौद्ध धर्म धर्मनिरपेक्षता पर आधारित
भगवान बुद्ध सर्वधर्म समभाव के पक्षधर थे. उन्होंने कभी अपनी शिक्षाओं की प्रशंसा को न तो जरूरत से ज्यादा महत्व दिया और न ही उसकी आलोचना करने वाले की निन्दा की. अम्बालथ्थिका में ब्रह्मजाल सुत्त का उपदेश देते हुए उन्होंने कहा, ‘भिक्खुओं, जब भी आप लोग मेरी या सद्धर्म मार्ग की आलोचना सुनें, तो उस पर न तो क्रोध करने की, न परेशान होने और न ही अमर्ष अनुभव करने की आवश्यकता है. ऐसी भावनाओं से आपकी अपनी ही हानि होगी. जब भी कोई मेरी या सद्धर्म मार्ग की प्रशंसा करे, तब भी प्रसन्न, हर्षित अथवा संतोष की भावनाएं मन में मत आने दीजिए. इनसे भी आपकी स्वयं की ही हानि होगी.
बौद्ध धर्म का वैज्ञानिक आधार
ऐसा माना जाता है कि बौद्ध धर्म वैज्ञानिक धर्म है जिसमें रूढ़िवाद और अंधविश्वास के लिए कोई स्थान नहीं है. जिस प्रकार से वैज्ञानिक प्रयोग करके विश्लेषण और विभाजन करके किसी भी प्रक्रिया की तह तक जाकर निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, उसी प्रकार भगवान बुद्ध ने प्रयोग करके और जीव जगत की घटनाओं का और उनमें घटित होने वाली सच्चाइयों का विभाजन-विश्लेषण किया. अंतर केवल इतना है कि वैज्ञानिक यह प्रयोग प्रयोगशालाओं में करते हैं जबकि भगवान बुद्ध ने सारे प्रयोग अपने शरीर, चित्त और प्रकृति की प्रयोगशाला में किए.
विश्व शांति के लिए उपदेश
गौतम बुद्ध ने युद्ध का हर सम्भव विरोध किया है. उन्होंने बार-बार कहा कि युद्ध किसी भी समस्या का हल नहीं होता है क्योंकि हर युद्ध में जन-धन की अपार हानि होती है. दुनिया में ‘धर्म युद्ध’ या ‘उचित युद्ध’ या ‘न्याय के लिए युद्ध’ जैसे शब्द को गुमराह करने और मूर्ख बनाने के लिए गढ़े गए हैं. कोई भी युद्ध उचित या न्याय के लिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि हर युद्ध (बगैर किसी अपवाद के) अपने पीछे बर्बादी और तबाही ही छोड़कर जाता है. जो शक्तिशाली हैं उनके द्वारा किया गया युद्ध उचित और जो कमजोर हैं उनके द्वारा किया गया युद्ध अनुचित? हम जो करें वह उचित, दूसरे जो करें अनुचित, यह कैसे चलेगा? इसलिए भगवान बुद्ध ने कहा कि हर राष्ट्र की विदेश नीति पंचशील और परस्पर शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर आधारित होनी चाहिए.
बौद्ध धर्म स्वतंत्र विचारों का किया स्वागत
बौद्ध धम्म ने विचार-स्वतंत्रता और वैज्ञानिक मनोवृत्ति के लिए आवाज़ उठाकर पूरे विश्व का मार्गदर्शन किया. बुद्ध ने अपने अनुभव और अपने विवेक को अपना मार्गदर्शक मानने का उपदेश देते हुए कालाम सुत्त में कहा:
‘हे कालामो (कालाम क्षेत्र के निवासियों को कालाम कहा जाता था)! किसी बात को केवल इसलिए मत मानो कि वह परम्परा से प्राप्त हुई है. किसी बात को इसलिए मत मानो कि बहुत से लोग उसके समर्थक हैं. किसी बात को केवल इसलिए मत मानो कि वह धर्म ग्रन्थों में लिखी है. किसी बात को केवल इस लिए मत मानो कि वह तर्क शास्त्र के अनुसार है, किसी बात को केवल इसलिए मत मानो कि ऊपरी तौर पर वह मान्य प्रतीत होती है. किसी बात को केवल इसलिए मत मानो कि वह अपने अनुकूल प्रतीत होती है. किसी बात को केवल इसलिए मत मानो कि यह ऊपरी तौर पर सच्ची प्रतीत होती है. किसी बात को केवल इसलिए मत मानो कि वह किसी आदरणीय आचार्य की कही हुई है.’’
इसलिए कालाम सुत्त को स्वतंत्र चिंतन का प्रथम घोषणा पत्र कहा जाता है.
बौद्ध धर्म स्वावलंबन पर देता है जोर
महात्मा बुद्ध के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपना मालिक स्वयं है. यह स्वावलम्बी बनने की प्ररेणा है,जिसका सानी भारतीय इतिहास में नहीं मिलता. बुद्ध ने कहा, ‘अत्तदीप भवथ अत्त सरणा’ अर्थात तुम अपने दीपक, मार्गदर्शक स्वयं बनो. अपनी शरण, अपने सहारे स्वयं बनो. तुम्हारी सहायता करने के लिए कोई ऊपर से नहीं आएगा. उन्होंने फिर कहा, ‘अत्ता हि अत्तनो नाथो. अत्ता हि अत्तनो गति.’
“अपने मालिक तुम खुद हो, कोई दूसरा तुम्हारा मालिक नहीं. इस तरह स्वावलम्बी व्यक्ति भाग्य और देवी-देवताओं के भरोसे न रहकर अपनी मेहनत और शील सदाचार से अपनी मंजिल स्वयं तय करता है.
बुद्ध धम्म ने भारतीयों को सबसे पहले इतिहास-बोध दिया. बौद्धों ने बुद्ध के जीवन की घटनाओं, बुद्ध धम्म के विकास आदि को लिपिबद्ध किया, जिसका प्रमाण तिपिटक (पाली में त्रिपिटक) है. जो मार्ग तिपिटक ने दर्शाया उसी का अनुसरण परवर्ती टीका व भाष्यकारों ने किया. इस पद्धति ने राजनैतिक इतिहास की भी नींव डाली. भारत में बौद्ध ही सबसे पहले लोग थे, जिन्होंने इतिहास को परिवर्तन के नियम के संदर्भ में पढ़ा. इन्हीं लोगों ने भावी पीढ़ियों तक अतीत की प्राप्तियों व उपलब्धियों को पहुंचाने के उद्देश्य से सर्वप्रथम इतिहास का प्रयोग किया, जो कि मानवता को एक अद्वितीय और महत्त्व देन है.
डॉ. अंबेडकर के मतानुसार किसी भी अन्य धर्म संस्थापक ने बुद्ध की तुलना में जीवन के सभी पहलुओं पर इतने विस्तार से उपदेश नहीं दिए और न ही महिला और पुरूष की समानता के लिए इतना बड़ा आंदोलन चलाया. डॉ. अंबेडकर के अनुसार तथागत बुद्ध की शिक्षाएं आधुनिक हैं, उपयोगी हैं और वैज्ञानिक कसौटी पर कसी जा सकती है. बुद्ध की शिक्षाओं में अंधविश्वास और रूढ़िवादिता के लिए कोई स्थान नहीं है.
डॉ. अंबेडकर का विश्वास था कि बौद्ध धम्म अपनाने से भारतीयों के बीच जातीय भेद-भाव की भावना समाप्त होगी, लोगों में रोटी और बेटी का संबंध बढ़ेगा जिससे राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी. डॉ. अंबेडकर ये भी मानते थे कि बौद्ध धम्म अपनाने से लोगों के मन में व्याप्त हीन भावना समाप्त होगी, उनमें आत्म-विश्वास और आत्म-बल बढ़ेगा, जिससे वे दैवीय शक्तियों के भरोस न रहकर आत्म-सहायता के द्वारा अपना विकास करेंगे. डॉ. अंबेडकर ये भी कहते थे कि भगवान बुद्ध के कारण आज आधी से ज्यादा दुनिया भारत को अपना आध्यात्मिक गुरू मानती है. डॉ. आबेडकर का यह मानना था कि आज के शूद्र और विशेषकर दलित पहले बौद्ध धम्म के अनुयायी थे. इसलिए बौद्ध धम्म को अपनाना धर्म परिवर्तन न होकर घर वापसी जैसा है.
इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए डॉ अंबेडकर ने समाधान निकाला कि बौद्ध धर्म अपनाने से भारत की अधिकतर समस्याएं हल हो जाएंगी.
साभार: इतिहास की प्रो. अंजू पाठक
चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी, मेरठ
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