नारी शक्ति का धार्मिक और लौकिक महत्व : मातृ शक्ति का हिंदू दृष्टिकोण

विश्व महिला दिवस के मौके पर आज दुनियाभर में नारी शक्ति का गुणगान हो रहा है लेकिन यह कोई एक दिन की बात नहीं। सृष्टि के आरंभ से ही महिला शक्ति को हम किसी ना किसी रूप में पूजते, देखते और महसूस करते आ रहे हैं। इसके लिए कहीं और जाने की आवश्यकता नहीं बल्कि अपने घरों में ही हम इसे देख सकते हैं। मां को दुर्गा, पुत्री को सरस्वती और गृहिणी को अनादि काल से लक्ष्मी का रूप मानते आ रहे हैं। सृष्टि निर्माण में महिलाओं का योगदान अमूल्य और अतुल्यनीय है। नौ महीने तक गर्भधारण कर बच्चे को जन्म देने की सामर्थ्य सिर्फ महिलाओं को ही दी गई है। मां गर्भ में खून से और गर्भ के बाहर अपने दूध से बच्चे को सींचती है।
श्लोक – ना गृह गृह मृत्या हु गृहिणी गृह मुच्यते
अर्थ– जिस घर में माताओं का सम्मान नहीं होता वो घर घर नहीं बल्कि मकान बनकर रह जाता है।जिस प्रकार बिना लिखे हुए कोरे कागज का कोई मूल्य नहीं होता उसी प्रकार बिना विवेक और ज्ञान वाले व्यक्ति का कोई मूल्य नहीं।
शास्त्रों में भी कहा गया है कि– ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता’ अर्थात जिस घर में पुत्रियों और माताओं का अनादर होता है उस घर में देवता भी रमण नहीं करते।
समय समय पर भगवान के अंश के रूप में इस धरती पर कई शक्तिओं और योद्धाओं ने मां के गर्भ से जन्म लिया है।
नारी का धार्मिक महत्व

सुबह उठते ही सबसे पहले हाथों को देखते हुए मां लक्ष्मी और सरस्वती का ध्यान करते हुए यह श्लोक जपने का का विधान बताया गया है।
कराग्रे वसते लक्ष्मी, कर मध्य सरस्वती
कर मूले तू गोविंदम्, प्रभाते कर दर्शनम्
भावार्थ – हाथ के अग्र भाग में लक्ष्मी का वास है, मध्य में सरस्वती विराजती हैं। मूल में नारायण का निवास है। जो व्यक्ति इस प्रकार से नित्य इस श्लोक को बोलकर अपने हाथों को देखता है उसा त्रिविध्य कल्याण होता है।
मनुस्मृति अध्याय 1-26 के मुताबिक भी लक्ष्मी और महिलाओं में कोई अंतर नहीं है।
भागवताचार्य श्री वैंक्टेश आचार्य के मुताबिक…
“भारत भूमि की माताओं ने भक्त को भी अपने गर्भ से जन्म दिया है तो भगवान को भी अपने गर्भ से जन्म दिया है, लेकिन एक माता ऐसी भी हुईं जिन्होंने भक्त और भगवान दोनों को एक साथ अपने गर्भ में धारण किया जिनका नाम उत्तरा है जिसका उल्लेख श्रीभागवत महापुराण में मिलता है। राजर्षि परीक्षित को गर्भ में ही नष्ट करने के लिए अश्वत्थामा ने ब्रहाम्स्त्र चलाया तब माता उत्तरा के द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति की गई। तब भगवान ‘अंगुष्ठ मात्र ममलम् ’ रूप धारण कर उत्तरा के गर्भ में स्थापित हुए और ब्रह्मास्त्र से परीक्षित की रक्षा की। इस तरह परीक्षित ही ऐसे जीव मात्र हैं और ऐसे भक्त हुए जिन्होंने जन्म बाद में लिया लेकिन भगवान को गर्भ में ही पा लिया ”
माता सीता के जीवन से हमें कर्तव्यनिष्ठ और पतिव्रता होने की प्रेरणा मिलती है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जिस रावण ने माता सीता को लंका में ले जाकर वहां रखा तो वह लंका, लंका ना रहकर श्रीलंका हो गई। यहां श्री का अर्थ कल्याण से है। इसी तरह जीव के अंदर श्री विराजमान हो जाए तो वो जीवन भटकता नहीं है।
राधा जी के जीवन से सच्चे प्रेम और त्याग की सीख मिलती है। रुक्मिणी जी के जीवन से हमारे लिए पारिवारिक सरोकारों और अन्य लौकिक परंपराओं से संबंधित मार्ग प्रशस्त होता है।
पिता के घर पति महादेव का अनादर देख माता सती ने अपनी पंच भौतिक देह का परित्याग कर दिया। जिसके पश्चात देवताओं के द्वारा प्रार्थना करने पर भगवान शंकर ने यज्ञ पूर्ण करवाया और माता सती की देह को लेकर व्याकुल हो उठे। तब भगवान विष्णु के चक्र सुदर्शन ने माता सती की देह के अलग–अलग अंश किए जो धरती पर गिरकर शक्तिपीठों रूप में प्रतिष्ठित हो गए।माता वैष्णो देवी भी उन्हीं में से शक्तिपीठ हैं।
मातृ शक्ति का हिंदू दृष्टिकोण–
नारी प्रकृति और ईश्वर की अनुपम कृति है। प्राणी जगत में नारी जीवन का आधार और संजीवनी है। वो सौंदर्य रति रंभा है। नारी का चरित्र गंगा के समान पवित्र है, पृथ्वी के समान धैर्यवान है और दृढ़ता में हिमालय के समान उच्च है। वक्त पड़ने पर नारी सरस्वती के रूप में सृष्टि का सृजन करती है, लक्ष्मी के रूप में पालन करती है और महाकाली के रूप में संघार करने की शक्ति भी रखती है। क्षमा नारी का आभूषण है, करुणा, ममता और त्याग की प्रतिमूर्ति हैं। मां के रूप में नारी शिशु की प्रथम पाठशाला होती है। पत्नी के रूप में भटके हुए कालिदास को भी सद्मार्ग दिखाती है।

कन्या जन्म पर कहा जाता है कि घर में लक्ष्मी का आगमन हुआ है। सनातन धर्म में कन्या पूजन का भी विधान है। जिसकी झलक 18 मार्च से शुरू हो रहे चैत्र के नवरात्रों में साकार देखने को मिलेगी। इस दौरान नौ दिन तक मां के नौ स्वरूपों की आराधना, उपासना और पूजन के साथ ही मां के रूप में कन्या पूजन के भी दर्शन होंगे।
नारी कल भी भारी थी, नारी आज भी भारी है
पुरुष कल भी आभारी था, पुरुष आज भी आभारी है
सही मायनों में यही विश्व महिला दिवस का सच्चा संदेश है।
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रिपोर्ट– डॉ. देवेन्द्र शर्मा
Email: sharmadev09@gmail.com
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