कड़ी सुरक्षा में पवित्र गुफा के लिए रवाना हुई छड़ी मुबारक
श्रीनगर, 3 अगस्त; दशनामी अखाड़ा के महंत दीपेंद्र गिरी के संरक्षण में भगवान अमरेश्वर की छड़ी मुबारक को बुधवार सुबह कड़ी सुरक्षा के बीच पवित्र गुफा के लिए ले जाया गया. पहलगाम में रात्रि विश्राम के बाद तीन अगस्त को छड़ी मुबारक चंदनबाड़ी के लिए रवाना हुई और सात अगस्त को मुख्य पूजा व दर्शन के लिए पवित्र गुफा में प्रवेश करेगी. आधिकारिक तौर पर इस साल बाबा अमरनाथ यात्रा 29 जून से शुरू हुई थी, लेकिन पौराणिक व धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक इसका शुभारंभ नौ जुलाई को आषाढ़ पूर्णिमा के दिन हुआ.

दशनामी अखाड़ा श्रीनगर के महंत दीपेंद्र गिरी ही बाबा बर्फानी की छड़ी मुबारक के संरक्षक हैं. दशनामी अखाड़ा ही छड़ी मुबारक का विश्राम स्थल है. बुधवार सुबह वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच भगवान शिव की पूजा के बाद छड़ी मुबारक कड़ी सुरक्षा में दशनामी अखाड़ा से पहलगाम के लिए रवाना हुई. इस मौके पर महंत दीपेंद्र गिरी के संग बड़ी संख्या में संत-महात्मा और देश-विदेश से आए श्रद्धालु मौजूद थे.
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महंत दीपेंद्र गिरी ने पहलगाम पहुंचने के बाद बताया कि रात्रि विश्राम के बाद तीन अगस्त को द्वादशी की सुबह पहलगाम में पूजा अर्चना के बाद छड़ी मुबारक चंदनबाड़ी के लिए रवाना होगी. पांच अगस्त को छड़ी मुबारक शेषनाग पहुंचेगी और रात्रि विश्राम के बाद छह अगस्त को पंचतरणी पहुंचेगी.

क्या है छड़ी मुबारक की गाथा
ऐसी मान्यता है कि यह यात्रा सर्वप्रथम भृगु ऋषि ने की थी. अमरनाथ यात्रा की सदियों से परम्परा चली आ रही है. दर्शनार्थियों एवं साधु-महात्माओं का एक विशाल समूह प्रतिवर्ष श्रीनगर से रवाना होता है. समूह के साथ शैव्य निर्मित दंड भगवान शिव के झंडे के साथ आगे चलता है, इसे छड़ी मुबारक कहते हैं. आजकल इस छड़ी का नेतृत्व दशनामी अखाड़ा श्रीनगर के महंत श्री दीपेन्द्र गिरि कर रहे हैं. रक्षाबंधन की पूर्णिमा के दिन जो सामान्यत: अगस्त माह में पड़ती है, भगवान भोलेनाथ भंडारी स्वयं श्री पावन अमरनाथ गुफा में पधारते हैं.
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रक्षाबंधन की दिन स्थापित होती है छड़ी मुबारक
रक्षा बंधन के दिन ही पवित्र छड़ी मुबारक भी गुफा में बने हिमशिवलिंग के पास स्थापित कर दी जाती है. परम्परा के अनुसार श्रीनगर के दशनामी अखाड़े में पहले भूमि पूजन, फिर ध्वजा पूजन करके छड़ी मुबारक को श्री शंकराचार्य मंदिर और हरि पर्वत पर स्थित क्षारिका भवानी मंदिर ले जाया जाता है इसके बाद एक बड़े जत्थे के साथ छड़ी मुबारक रवाना होती है. कल्हण रचित ग्रंथ राजतरंगिणी के अनुसार श्री अमरनाथ यात्रा का प्रचलन ईस्वी से भी एक हजार वर्ष पूर्व का है.

एक मान्यता यह भी
एक किंवदंती यह भी है कि कश्मीर घाटी पहले एक बहुत बड़ी झील थी जहां सर्पराज नागराज दर्शन दिया करते थे. अपने संरक्षक मुनि कश्यप के आदेश पर नागराज ने कुछ मनुष्यों को वहां रहने की अनुमति दे दी. मनुष्यों की देखा-देखी वहां राक्षस भी आ गए जो बाद में मनुष्य व नागराज दोनों के लिए सिरदर्द बन गए. अंतत: नागराज ने कश्यप ऋषि से इस संबंध में बातचीत की. कश्यप ऋषि ने अपने अन्य संन्यासियों को साथ लेकर भगवान भोले भंडारी से प्रार्थना की. तब शिव भोले नाथ ने प्रसन्न होकर उन्हें एक चांदी की छड़ी प्रदान की. यह छड़ी अधिकार एवं सुरक्षा की प्रतीक थी. भोलेनाथ ने आदेश दिया कि इस छड़ी को उनके निवास स्थान अमरनाथ ले जाया जाए जहां वह प्रकट होकर अपने भक्तों को आशीर्वाद देंगे. संभवत: इसी कारण आज भी चांदी की छड़ी लेकर महंत यात्रा का नेतृत्व करते हैं.
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रक्षा बंधन वाले दिन पवित्र श्री अमरनाथ गुफा पहुंचने पर पवित्र हिमशिवलिंग के पास महंत दीपेन्द्र गिरि पारम्परिक विधि विधान और वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ छड़ी मुबारक का पूजन करेंगे. इस विशाल पूजा के साथ 40 दिन चलने वाली पवित्र अमरनाथ यात्रा का समापन हो जाएगा. पवित्र एवं पावन गुफा में पूजन के उपरांत 2 दिन बाद लिद्दर नदी के किनारे पहलगांव में पूजन एवं विसर्जन की रस्म अदा की जाएगी और शिव भक्त फिर से अगले वर्ष की यात्रा का इंतजार करने लगेंगे.
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