“संत” बावलिया बाबा – मां दुर्गा के परमहंस भक्त और बिड़ला परिवार के मार्गदर्शक

नवरात्र स्पेशल में अब ऐसे संत की कहानी बताने जा रहे हैं जिन्हें मां दुर्गा का ऐसा आशीर्वाद प्राप्त था कि कोई भी उनके दर से खाली हाथ नहीं लौटता था। परमहंस पंडित गणेश नारायण जी जिन्हें राजस्थान के शेखावटी के रहने वाले प्यार से बावलिया (पागल) बाबा कहते थे। जिन्हें मां दुर्गा ने स्वयं दर्शन दिया था और शिव की उपासना करने का आदेश दिया था। साल 1903 में राजस्थान के झूंझनू जिले में जन्में गणेश नारायण जी को बचपन से ही अघोर पंथ की तरफ श्रद्धा थी। लेकिन सन 1942 में उनके जीवन में एक बड़ा मोड़ तब आया जब झूंझनू के एक परिवार ने उनसे मां दुर्गा की आराधना कर उनके लिए आशीर्वाद मांगने को कहा।

गणेश जी पूरे 9 दिनों तक पास के एक शिवालय में आराधना में लीन हो गए। ठीक नौंवे दिन जब उन्हें मां दुर्गा दर्शन दे ही रही थीं कि लोगों ने दरवाजा खोल दिया। हालांकि इससे पहले मां दुर्गा ने उन्हें दर्शन देकर भोलेशंकर की अराधना के आदेश के साथ साथ उन्हें भविष्य देखने की का वरदान दे दिया था। इसके बाद गणेश नारायण जी का पूरा जीवन मां दुर्गा और भगवान शिव की अराधना में समर्पित हो गया। धीरे धीरे उनकी भक्ति और साधना का प्रताप चारो तरफ फैलने लगा। उनका हर आशीर्वाद लोगों के जीवन को बदलने लगा । उनकी प्रसिद्धि और सिद्धियों के कारण लोग उन्हें परमहंस कहने लगे। चूंकि वो अघोर पंथ का अनुसरण करते थे इसी लिए उनकी जीवन शैली बड़ी विचित्र थी। गणेशनारायणजी भगवती दुर्गा के परमभक्त थे तथा दुर्गामंत्र का हर वक्त जाप करते रहते थे। इनके मुंह से उस वक्त जो भी बात निकल जाती वह सत्य होती। यह चमत्कार देख कई लोग इनके परमभक्त बन गये, वहीं कई लोग इनसे डरने लगे क्योंकि ये अनिष्ट घटने वाली घटना का भी पूर्व संकेत कर देते थे, सच्चे साधक होने के उपरान्त भी दुनिया इन्हें पागल मानती थी। ये सदैव लोगों से दूर रहने का प्रयत्न करते थे।

औरत ओर बच्चे तो इनसे बहुत डरते थे क्योंकि इनकी वेशभूषा ही ऐसी थी। समाज में बहिष्कृत तथा शास्त्रों में निषिद्ध नीले रंग के वस्त्रों का ही गणेशनारायण जी प्रयोग करते थे। ये सिले हुये कपड़े नहीं पहनते थे। ये कभी श्मशान में लोट लगाते तो कभी पास के भगीनिये जोहड़े में बैठे रहते थे। भोजन करते समय कुत्ते और कौवे भी इनके साथ खाते थे। ये कुत्तों के मुंह से टपकते तथा हंडियों में पड़े पदार्थ को पहले गुदा से लगाकर बड़ी खुशी से ग्रहण करते थे। इनकी दृष्टि में किसी भी पदार्थ के प्रति घृणा नहीं थी। इसी वजह से लोग उन्हें बावलिया बाबा भी कहने लगे ।

बाद में वो पास के ही शहर चिड़ावा आ गए और यहीं रहने लगें। उनके प्रमुख शिष्यों में खेतड़ी के महाराज अजीत सिंह थे जिन्होंने विवेकानंद को शिकागो अपने खर्चे से भेजा था। आज बिड़ला परिवार में भगवान से पहले परमहंस गणेश नारायण जी की पूजा की जाती है । इसके पीछे उनकी भविष्यवाणी की सिद्धि प्रमुख वजह है। उन्होंने बिड़ला परिवार को ऐसा आशीर्वाद दिया था जिसकी वजह से आज भी बिड़ला परिवार देश के सबसे धनाढ्य परिवारों में एक है । पिलानी निवासी सेठ जुगलकिशोर बिड़ला से परमहंस का विशेष स्नेह था तथा इनके आशीर्वाद से ही बिड़ला परिवार उद्योग, व्यापार के क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित कर सका। एक बार पण्डितजी ने कहा कि जुगलकिशोर जा, कमाने निकल जा, आज तेरा शुभ दिन है। पण्डितजी की आज्ञा मानकर सेठ कलकत्ता की ओर चल दिये। रास्ते में उसे दाहिनी तरफ फन उठाये काला सांप मिला जो शुभ शकुन था मगर सेठ उसे अपशकुन मानकर वापिस लौट आये और पण्डितजी को पूरी घटना बतायी। पण्डित जी बोले जुगलकिशोर तुम से भारी गलती हो गयी यदि चला जाता तो चक्रवर्ती सम्राट बनता। जा अब भी तू यशस्वी बनेगा। अपनी करनी बरनी बन्द मत होने देना इसे सदैव चालू रखना। बिड़ला परिवार का नाम इसी प्रकार देश के प्रमुख उद्योगपतियों में गिना गया। ऐसी चमत्कार पूर्ण बातों से परमहंस के प्रति श्रद्धालुओं की भक्ति बढ़ती गयी। इनके भक्तजन देश के सभी भागों में रहते हैं। इनके मनमौजी स्वभाव के कारण ही लोग इन्हें ”बावलिया’’ संत के नाम से भी पुकारते हैं।
महात्मा गणेशनारायणजी ने संवत 1969 में पौष मास की नवमी को योग मार्ग द्वारा शरीर त्याग दिया। इनके अन्तिम संस्कार स्थल पर एक मन्दिर बना हुआ है जहां इनकी भव्य प्रतिमा स्थापित है तथा पास ही बिड़ला परिवार ने एक ऊॅंची स्तूप का निर्माण करवा दिया जिस पर संगमरमर की ब्रह्मा, विष्णु, महेश की मूर्तियां लगी हैं। चिड़ावा वासी गणेशनारायणजी को अपना ग्राम देवता मानते हैं। इनकी निर्वाण तिथि पर विशाल मेला लगता है जिसमें हजारों श्रद्धालु दर्शनार्थ आते हैं।
लेखक – अजीत मिश्रा (infodesk@religionworld.in)
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