सावन माह भगवान शिव को अति प्रिय है। सावन के महीने में ही शिवजी को प्रसन्न करने के लिए शिवभक्त सावन सोमवार का व्रत करते हैं।
कांवड में गंगाजल भरकर सैंकड़ों किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हैं और फिर उस जल से भोले बाबा का अभिषेक करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, कहा जाता है कि सावन में भगवान शिव की पूजा करने से जीवन सफल हो जाता है और भक्तों को समस्त कष्टों से छुटकारा मिल जाता है।
सावन में शिव की आराधना से सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। कहते हैं देवों के देव महादेव ने सृष्टि की रक्षा के लिए समुद्र मंथन से निकला हलाहल विष पी लिया था। विष का ताप इतना ज्यादा था कि इंद्र देव ने बारिश करके उन्हें शीतल किया था।
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जानिये पौराणिक कथा
देवासुर संग्राम में समुद्र मंथन से निकले विष को शिव जी ने पी लिया था। इससे उनका शरीर बहुत ही ज्यादा गर्म हो गया जिससे शिवजी को काफी परेशानी होने लगी थी। भगवान शिव को इस परेशानी से बाहर निकालने के लिए इंद्रदेव ने जमकर बारिश करवाई थी। कहते हैं कि यह घटना सावन माह में घटी थी। इस प्रकार से शिव जी ने विषपान करके सृष्टि की रक्षा की थी। तभी से यह मान्यता है कि सावन के महीने में शिव जी अपने भक्तों का कष्ट अति शीघ्र दूर कर देते हैं। इसलिए सावन माह में उज्जैन, हरिद्वार, वाराणसी, देवघर जैसे अन्य तीर्थ स्थलों पर शिव के भक्तों का सैलाब देखने को मिलता है।
एक अन्य कथा के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि पर्वतराज हिमालय के घर पर देवी सती का पार्वती के रूप में दोबारा जन्म हुआ था। देवी पार्वती ने भगवान शिव को दोबारा से अपना पति बनाने के लिए सावन के महीने में ही कठोर तपस्या की थी। इसके बाद भगवान शिव प्रसन्न होकर माता पार्वती की मनोकामना को पूरा करते हुए उनसे विवाह किया था। सावन के महीने में ही भगवान भोले शंकर ने देवी पार्वती को पत्नी माना था इसलिए भगवान शिव को सावन का महीना बहुत ही प्रिय होता है।
सभी देवी-देवताओं में भगवान शिव की पूजा विधि सबसे आसान मानी जाती है। सावन सोमवार के दिन सबसे जल्दी उठकर स्नान कर साफ कपड़े पहनें। इसके बाद अपने घर के आसपास के शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव को गंगाजल और दूध से जलाभिषेक करें। इसके बाद शिव लिंग पर सभी तरह की पूजा सामग्री को शिवलिंग पर अर्पित करें और भगवान शिव के मंत्रों का जाप करें।
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