वैसे तो आध्यात्म और योग दो अलग अलग विषय हैं लेकिन यह दोनों एक दूसरे के पूरक हैं. दरअसल आध्यात्म का पथ प्रदर्शन योग की निरंतर साधना से ही संभव है। चलिए आज हम आपको योग और आध्यात्म के सम्बन्ध की जानकारी देते हैं । दरअसल योग हमारे भारत में प्राचीन समय से चलते आ रहा है, आधुनिक जमाने में इसे लोग योगा कहने लगे।
शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा है योग
योग शरीर, मन व बुद्धि को स्वस्थ करते हुए, आत्मस्वरूप तक पहुंचने का तरीका है। योग के जरिए हम अपनी चेतना की सबसे ऊंची स्थिति से जुड़कर जीवन जीते हैं। इस प्रकार का जीवन, पूर्णता से भरा होता है। यही कारण है कि योग और आध्यात्म इन दोनों को एक दूसरे का पूरक माना जाता है। अध्यात्म का पथ प्रदर्शन योग की निरंतर साधना से ही संभव है।
योग और योगा में अंतर का कारण
भगवद गीता के सभी अठारह अध्यायों के नाम किसी न किसी योग पर ही रखे गए हैं। जैसे- अर्जुनविषादयोग,सांख्ययोग,
कर्मयोग, ज्ञान कर्म सन्यास योग, कर्मसन्यास योग ,आत्मसंयम योग,ज्ञान विज्ञानं योग,अक्षर ब्रह्मं योग,राजविद्याराजगुह्ययोग,विभूति योग,विश्व रूप दर्शन योग,भक्तियोग,क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग , गुणत्रयविभागयोग, पुरुषोत्तमयोग,दैवासुरसम्पद्विभाग योग, श्रद्धात्रयविभागयोग और मोक्षसंन्यासयोग।
प्रत्येक अध्याय में योग और सांसारिक जीवन और आध्यत्म से जुड़ी बातें इस बात का संकेत देती हैं कि अगर योग को आध्यात्म से अलग कर दिया जाए तो इसका कोई वजूद नहीं रहेगा। दूसरी तरह से इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि योग अगर हमरा शरीर है तो आध्यात्म हमारा मस्तिष्क है। जिस प्रकार मस्तिष्क के बिना शरीर बेकार है वैसे ही बिना आध्यात्म के योग भी बेकार हो जाता है। जब तक योग आध्यात्म से जुड़ा रहता है तो वह तन-मन को स्वस्थ रखने के साथ ही साथ मुक्ति मार्ग की साधना भी प्रदर्शित करता है।
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योग कैसे बना योगा
जब योग ने भारत से पाश्चात्य देशों की ओर रुख किया तब वह योगा बन गया, उदाहरण के रूप में जैसे राम- रामा और कृष्ण-कृष्णा हो गया। पाश्चात्य देशों में योग का केवल शारीरिक पक्ष मजबूत हुआ।इसे और लचीला बनाने के लिए योगा का प्रचलन हुआ। आज के समय में जो भी योग अपना रहे हैं वो सिर्फ उसका शरीरिक पक्ष देख रहे हैं और आध्यात्म और इश्वर से जुड़ने की साधना से दूर हो रहे हैं।
आज योग और आध्यात्म दो पक्षों में बंट गए हैं- अभी भी बहुत ही कम संख्या में लोग ऐसे होंगे जिन्हें योग और आध्यात्म की पूर्ण जानकारी होगी। आज ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जिन्हें योग की जानकारी है लेकिन आध्यात्म से वो जुड़ नहीं पाते और जिनका जुड़ाव आध्यात्म की ओर है, उन्हें योग के शारीरिक पक्ष की अच्छी समझ नहीं।
पाश्चात्य देशों में आध्यात्मिक पक्ष की ओर रुझान
वैसे देखा जाए तो योग विशेषज्ञों के प्रयास व जागरूकता से अब पाश्चात्य देशों में भी योग के आध्यात्मिक पक्ष की ओर भी रुझान बढ़ रहा है।
योग के साथ-साथ अध्यात्म का ज्ञान प्राप्त करने से ही उसका सही अर्थ समझ आएगा और इसका लक्ष्य भी प्राप्त होगा। योग के माध्यम से ही आंतरिक शांति मिलती है। अगर योग का ज्ञान प्राप्त करने वाला व्यक्ति अध्यात्म का ज्ञान प्राप्त न कर सके तो वो योग के मूल स्वरूप से भटक जाएगा।
वहीं हम आसनों के अभ्यास से शरीर को स्वस्थ और लचीला बना सकते हैं, लेकिन योगी नहीं बन सकते हैं। अगर शरीर को लचीला बनाना योग है तो फिर तो सबसे बड़े योगी जिम्नास्टिक हो जाएंगे, क्योंकि उनमें संतुलन, लचीलापन और फुर्ती सब शामिल है। अतः योग में आध्यात्म शामिल करना अत्यंत आवश्यक है। योग की आध्यात्मिकता से भारत हमेशा ही विश्व गुरु बना रहेगा।
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