तंत्र साहित्य की पहली सीरीज में आपको हमने तांत्रिक साहित्य का परिचय विशेषताएं और उसके वर्गीकरण की जानकारी दी. तंत्र साहित्य की दूसरी सीरीज में आपको प्राचीन आगम और उनके प्रकार के बारे में आपको जानकारी देंगे. तो चलिए शुरू करते हैं-
प्राचीन आगम क्या है
सामान्यतया आगम तंत्र के लिए प्रयुक्त होता है. तन्त्र-शास्त्र का एक नाम-रूप आगम शास्त्र भी है. वाचस्पति मिश्र, योग भाष्य, तत्व वैशारदी व्याख्या के अनुसार,
“आगमात् शिववक्त्रात् गतं च गिरिजा मुखम्। सम्मतं वासुदेवेन आगमः इति कथ्यते ॥”
अर्थात- जिससे अभ्युदय-लौकिक कल्याण और निःश्रेयस-मोक्ष के उपाय बुद्धि में आते हैं, वह आगम कहलाता है.
आगम के प्रकार

उपास्य देवता की भिन्नता के कारण आगम के तीन प्रकार हैं :-
शैव आगम (पाशुपत, शैवसिद्धांत, त्रिक आदि)
वैष्णव आगम (पंचरात्र तथा वैखानस आगम),
शाक्त आगम
द्वैत, द्वैताद्वैत तथा अद्वैत की दृष्टि से भी इनमें तीन भेद माने जाते हैं.
आगम वेदमूलक और सम्पूरक हैं. इनके वक्ता प्रायः भगवान शिव माने जाते हैं.
आगम और निगम में अंतर
यह शास्त्र साधारणतया तंत्रशास्त्र के नाम से प्रसिद्ध है. निगमागम मूलक भारतीय संस्कृति का आधार जिस प्रकार निगम (वेद) है, उसी प्रकार आगम (तंत्र) भी है. दोनों स्वतंत्र होते हुए भी एक दूसरे के पोषक हैं. निगम कर्म, ज्ञान तथा उपासना का स्वरूप बतलाता है तथा आगम इनके उपायभूत साधनों का वर्णन करता है.
क्या कहता है तंत्र शास्त्र
वाचस्पति मिश्र -तत्ववैशारदी-योगभाष्य की व्याख्या के अनुसार
“आगच्छंति बुद्धिमारोहंति अभ्युदयनि:श्रेयसोपाया यस्मात्, स आगम:”
अर्थात- आगम का मुख्य लक्ष्य ‘क्रिया’ के ऊपर है, तथापि ज्ञान का भी विवरण यहाँ कम नहीं है.
वाराही तंत्र के अनुसार,” आगम इन सात लक्षणों से समवित होता है :- सृष्टि, प्रलय, देवतार्चन, सर्वसाधन, पुरश्चरण, षट्कर्म, (शांति, वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन तथा मारण) साधन तथा ध्यानयोग।
”
महानिर्वाण तंत्र कहता है,” कलियुग में प्राणी मेध्य (पवित्र) तथा अमेध्य (अपवित्र) के विचारों से बहुधा हीन होते हैं और इन्हीं के कल्याणार्थ भगवान महादेव ने आगमों का उपदेश माता पार्वती को स्वयं दिया।”
ऐसा भी कहा जाता है कि आगम शास्त्र का ज्ञान सुन कर या गुरमुख के द्वारा ही पाया जा सकता है. भगवान महादेव के द्वारा ये दिव्य ज्ञान लोमश ऋषि को प्राप्त हुआ और फिर गुरुमुख द्वारा अन्य को.
शिव की उक्ति

वीरशैव दर्शन-वाचनम् में कहा गया है ,”यह दर्शन पारम्परिक तथा शिव को ही पूर्णतया समस्त कारक, संहारक, सर्जक मानता है. इसमें जातिगत भेदभाव को भी नहीं माना गया है.
इस दर्शन के अन्तर्गत गुरु परम्परा का विशेष महत्व है. आगम का मुख्य लक्ष्य क्रिया के ऊपर है तथापि ज्ञान का भी विवरण यहाँ कम नहीं है.
प्राचीन आगमों का विभाग

आगम ग्रंथ (तन्त्र ग्रन्थ) में साधारणतया चार पाद होते है – ज्ञान, योग, चर्या और क्रिया. इन पादों में इस समय कोई-कोई पाद लुप्त हो गया है, ऐसा प्रतीत होता है और मूल आगम भी सर्वांश में पूर्णतया उपलब्ध नहीं होता, परंतु जितना भी उपलब्ध होता है वही अत्यंत विशाल है.
ऐसा कहा जाता है कि विश्व के सबसे प्राचीनतम मठ आगम मठ मे लुप्तप्राय ग्रंथ उपलब्ध है
प्राचीन आगमों का विभाग इस प्रकार हो सकता है:
शैवागम (संख्या में दस),
रूद्रागम (संख्या में अष्टादश यानि 18)
ये अष्टाविंशति आगम (10 + 18 = 28) ‘सिद्धांत आगम’ के रूप में विख्यात हैं. ‘भैरव आगम’(इस आगम की जानकारी अगली सीरीज में दी जाएगी ) संख्या में चौंसठ सभी मूलत: शैवागम हैं. इन ग्रंथों में शाक्त आगम आंशिक रूप में मिले हुए हैं. इनमें द्वैत भाव से लेकर परम अद्वैत भाव तक की चर्चा है.
शैवागम
कामिकं योगजं चिन्त्यंकारणन्त्वजितन्तथा।
दीप्तं सूक्ष्मं सहस्रं च अंशुमान्सुप्रभेदकम्
विजयञ्चैव निश्वासं स्वायम्भुवमथानलम्
वीरं च रौरवञ्चैव मकुटं विमलन्तथा
चन्द्रज्ञानञ्च बिम्बं च प्रोद्गीतं ललितन्तथा
सिद्धं सन्तानशर्वोक्तं पारमेश्वरमेव च
किरणं वातुलन्त्वेतास्त्वष्टाविंशतिसंख्यकाः
किरणागम, में लिखा है कि, विश्वसृष्टि के अनंतर परमेश्वर ने सबसे पहले महाज्ञान का संचार करने के लिये दस शिवों का प्रकट करके उनमें से प्रत्येक को उनके अविभक्त महाज्ञान का एक एक अंश प्रदान किया. इस अविभक्त महाज्ञान को ही शैवागम कहा जाता है.
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कामिक आगम
वेद जैसे वास्तव में एक है और अखंड महाज्ञान स्वरूप है, परंतु साक्षात् परमेंश्वर से जिस आगम को प्राप्त किया था उसका नाम ‘कामिक’ आगम है. प्रसिद्वि है कि उसकी श्लोकसंख्या एक परार्ध थी.
प्रणव शिव से त्रिकाल को और त्रिकाल से हर को क्रमश: यह आगम प्राप्त हुआ. इस कामिक आगम का नामांतर है, कामज, त्रिलोक, की जयद्रथकृत टीका में कही नाम मिलता है.
योग
द्वितीय शिवागम का नाम है – योग. ऐसी मान्यता है कि इसकी श्लोक संख्या एक लक्ष है. इस आगम के पाँच *अवांतर भेद हैं. पहले सुधा नामक शिव ने इसे प्राप्त किया था. उनसे इसका संचार भस्म में; फिर भस्म से प्रभु में हुआ.
चित्य
तृतीय आगम चित्य है. इसका भी परिमाण एक लक्ष श्लोक था. इसके छ: अवांतर भेद हैं. इसे प्राप्त करनेवाले शिव का नाम है दीप्त. दीप्त से गोपति ने, फिर गोपति से अंबिका ने प्राप्त किया.
कारण
चौथा शिवागम कारण है. इसका परिमाण एक कोटि श्लोक है . इसमें सात भेद हैं. इसे प्राप्त करनेवाले क्रमश: कारण, कारण से शर्व, शर्व से प्रजापति हैं.
अजित
पाँचवां आगम अजित है. इसका परिमाण एक लक्ष श्लोक है. इसके चार अवांतर भेद हैं. इसे प्राप्त करनेवालों के नाम हैं सुशिव, सुशिव से उमेश, उमेश से अच्युत.
सुदीप्तक
षष्ठ आगम का नाम सुदीप्तक (परिमाण में एक लक्ष एवं अवांतर भेद नौ) हैं. इसे प्राप्त करनेवालों के नाम क्रमश: ईश, ईश से त्रिमूर्ति, त्रिमूर्ति से हुताशन.
सूक्ष्म
सप्तम आगम का नाम सूक्ष्म (परिमाण में एक पद्म) है. इसके कोई अवांतर भेद नहीं हैं. इसे प्राप्त करनेवालों के नाम क्रमश: सूक्ष्म, भव और प्रभंजन हैं.
सहस्र
अष्टम आगम का नाम सहस्र है. अवांतर भेद दस हैं. इसे प्राप्त करनेवालों में काल, भीम और खग हैं.
सुप्रभेद
नवम आगम सुप्रभेद है. इसे पहले धनेश ने प्राप्त किया, धनेश से विघनेश और विघनेश से शशि ने.
अंशुमान
दशम आगम अंशुमान है जिसके अवांतर भेद 12 हैं. इसे प्राप्त करनेवालों के नाम क्रमश: अंशु, अब्र और रवि है.
दस आगमों की उपर्युक्त सूची किरणागम के आधार पर है.
श्रीकंठी संहिता में दी गई सूची में सुप्रभेद का नाम नहीं है. उसके स्थान में कुकुट या मकुटागम का उल्लेख है.
रूद्रागम
इन आगमों के नाम और प्रत्येक आगम के पहले और दूसरे श्रोता के नाम दिए जा रहे हैं:
विजय रुद्रागम (पहले श्रोता अनादि रूद्र, दूसरे स्रोता परमेश्वर)
नि:श्वास रुद्रागम (पहले श्रोता दशार्ण, दूसरे श्रोता शैलजा),
परमेश्वर रुद्रागम (पहले श्रोता रूप, दूसरे श्रोता उशना:)
प्रोद्गीत रुद्रागम (पहले श्रोता शूली, दूसरे श्रोता कच)
मुखबिम्ब रुद्रागम (पहले श्रोता प्रशांत, दूसरे श्रोता दघीचि)
सिद्ध रुद्रागम (पहले बिंदु, दूसरे श्रोता चंडेश्वर)
संतान रुद्रागम (पहले श्रोता शिवलिंग, दूसरे श्रोता हंसवाहन)
नरसिंह रुद्रागम (पहले श्रोता सौम्य, दूसरे नृसिंह)
चंद्रान्शु रुद्रागम (पहले श्रोता अनंत दूसरे श्रोता वृहस्पति)
वीरभद्र रुद्रागम (पहले श्रोता सर्वात्मा, दूसरे श्रोता वीरभद्र महागण)
स्वयंभू रुद्रागम (पहले श्रोता निधन, दूसरे पद्यजा)
विरक्त रुद्रागम (पहले तेज, दूसरे प्रजापति)
कौरव्य रुद्रागम (पहले ब्राह्मणेश, दूसरे नंदिकेश्चर)
मकुट रुद्रागम (पहले शिवाख्य या ईशान, दूसरे महादेव ध्वजाश्रय)
किरण रुद्रागम (पहले देवपिता, दूसरे रूद्रभैरव)
गणित रुद्रागम (पहले आलय, दूसरे हुताशन)
आग्नेय रुद्रागम (पहले श्रोता व्योम शिव, दूसरे श्रोता का उल्लेख नहीं )
वतुल रुद्रागम (किसी भी श्रोता का उल्लेख नहीं )
श्रीकंठी संहिता में रूद्रागमों की जो सूची है उसमें रौरव, विमल, विसर और सौरभेद ये चार नाम अधिक हैं. उसमें विरक्त, कौरव्य, मकुट एवं आग्नेय ये चार नाम नहीं है. कुछ लोग अनुमान लगाते हैं कि ये कौरव्य ही रौरव हैं. बाकी तीन इनसे भिन्न हैं. अष्टादश आगम का नाम कहीं नहीं मिलता. इसमें किरण, परमेश्वर और रौरव का नाम है.
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निःश्वास तंत्र सहिंता

नेपाल में आठवीं शताब्दी का गुप्त लिपि में लिखा हुआ नि:श्वास तंत्र संहिता नामक ग्रंथ है. इसमें लौकिक धर्म, मूल सूत्र, उत्तर सूत्र, नय सूत्र, गुह्य सूत्र ये पाँच विभाग हैं.
लौकिक सूत्र प्राय: उपेक्षित हो गया है. बाकी चारों को भीतर उत्तरसूत्र कहा जाता है. इस उत्तर सूत्र में 18 प्राचीन शिव सूत्रों का नामोल्लेख है. ये सब नाम वास्तव में उसी नाम से प्रसिद्ध शिवागम के ही नाम हैं, जैसे-
नि:श्वास ज्ञान
स्वयंभुव मुखबिंब
मकुट या माकुट प्रोद्गीत
वातुल ललित
वीरभद्र सिद्ध
विरस (वीरेश) संतान
रौरव सर्वोद्गीत
चंद्रहास किरण परमेश्वर
इसमें 10 शिवतंत्रों के नाम है यथा – कार्मिक, योगज, दिव्य (अथवा चिंत्य), कारण, अजित, दीप्त सूक्ष्म, साहस्र अंशुमान और सुप्रभेद.
ब्रह्मयामल
ब्रह्मयामल (लिपिकाल 1052 ई0) के 39 अध्याय में ये नाम पाए जाते हैं – विजय, नि:श्वास, स्वयंभुव, बाबुल, वीरभद्र, रौरव, मुकुट, वीरेश, चंद्रज्ञान, प्रोद्गीत ललित, सिद्ध संतानक, सर्वोद्गीत, किरण और परमेश्वर. कामिक आगम में भी 18 तंत्रो का नामोल्लेख है.
हरप्रसाद शास्त्री ने अष्टादश आगम की प्रति नेपाल में देखी थी जिसका लिपिकाल 624 ई. था.
डॉ॰ प्रबोधचंद्र बागची के अनुसार, पूर्ववर्णित ‘नयोत्तर सूत्र’ का रचनाकाल छठीं से सातवीं ई. हो सकता है.
‘ब्रह्मयामल’ के अनुसार नि:श्वास आदि तंत्र शिव के मध्य स्रोत से उद्भूत हुए थे और ऊर्ध्व वक्ष से निकले हैं. ब्रह्मयामल के मतानुसार ही नयोत्तर सम्मोहन अथवा शिरश्छेद वामस्रोत से उद्भूत हैं.
जयद्रथयामल में भी उल्लेख है कि शिरच्छेद, नयोत्तर और महासम्मोहन– ये तीन तंत्र शिव के वामस्रोत से उद्भूत हैं.
द्वैत और द्वैताद्वैत शैव आगम अति प्राचीन है, इसमें संदेह नहीं. परंतु जिस स्वरुप में वे मिलते हैं और मध्य युग में भी जिस प्रकार उनका वर्णन मिलता है, उससे ज्ञात होता है कि उसका यह रूप अति प्राचीन नहीं है.
ऐतिहासिक परिस्थिति

काल भेद से विभिन्न ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण ऐसा परिवर्तन हो गया है. फिर भी ऐसा माना जा सकता है कि मध्य युग में प्रचलित पंचरात्र आगम का अति प्राचीन रूप जैसा महाभारत शांति पर्व में दिखाई देता है उसी प्रकार शैवागम के विषय मे भी संभावित है.
महाभारत के मोक्ष पर्व के अनुसार स्वयं श्रीकृष्ण ने द्वैत और द्वैताद्वैत शैवागम का वर्णन किया था.
‘कामिक आगम’ में सदाशिव के पंचमुखों में से पांचरात्र स्रोतों का संबंध है. इसके कुल स्रोत 25 हैं. पांचमुखों के पांच स्रोतों के नाम हैं-
1. लौकिक
2. वैदिक
3. आध्यात्मिक
4. अतिमार्ग
5. मंत्र
पांच मुख इस प्रकार हैं-
1 सद्योजात
2 बामदेव
3 अघोर
4 तत्पुरूष
5 ईशान
‘सोम सिद्धांत‘ के अनुसार लौकिक तंत्र पांच प्रकार के हैं और वैदिक भी पांच प्रकार के हैं.
इन सब तंत्रों में परस्पर उत्कर्ष या अपकर्ष का विचार पाया जाता है. तदनुसार ऊर्ध्वादि पांच दिशाओं के भेद के कारण तंत्रों के विषय में तारतम्य होता है. इसका तात्पर्य यह है कि ऊर्ध्व दिशा से निकले हुए तंत्र सर्वश्रेष्ठ हैं.
उसके बाद पूर्व, फिर उत्तर, पश्चिम, फिर दक्षिण. इस क्रम के अनुसार सिद्धांतविद कहते हैं कि सिद्धांतज्ञान मुक्तिप्रद होने के कारण सर्वश्रेष्ठ है.
उसके अनंतर क्रमानुसार सर्पविष नाशक गरूड़ज्ञान, सर्ववशीकरण प्रतिपादक कामज्ञान, भूतों का निवारक, भूततंत्र और शत्रुदमन के लिये उपयोगी भैरव तंत्र का स्थान जानना चाहिए।
‘स्वायंभुव आगम’ में कहा गया है-
तदेकमप्यनेकम्त्वं शिव वक्ताम्बु जोम्हवंल।
परापरेणा भेदेन गच्त्यर्थ प्रतिश्रयात्।
पाशुपत संप्रदाय के आचार्य अष्टादश रूद्रागमों का प्रामाणाश्य मानते थे, परंतु दश शिव ज्ञान का प्रामाणाय नहीं मानते थे. इसका कारण यह है कि रूद्रागम में द्वैत दष्टि और अद्वैत दृष्टि का मिश्रण पाया जाता है. वहीं दूसरी ओर शिवागम में अद्वैत दृष्टि मानी जाती इसलिये कहा जाता है कि पाशुपत दर्शन सर्वथा हेय नहीं हैं.
किसी किसी ग्रंथ में स्पष्ट रूप से दिखया गया है कि शिव के किन मुखों से किन आगमों का निर्गम हुआ हैं. उससे ऐसा प्रतीत होता हैं कि कामिक, योगज, चित्य, कारणा और अजित ये पाँच शिवागम शिव के सधोजात मुख से निर्गम हुए थे. दीत्प, सूक्ष्म, सहरूत्र, अंशुमत या अंशमान संप्रभेद ये पाँच शिवागम शिव के वामदेव नामक मुख से निर्गम हुए हैं.
विजय, नि:श्वास, स्वाभुव, आग्नेय और वीर ये पाँच रूद्रागम शिव के अघोर मुख से निर्गम हुए थे. रौरव, मुकुट, विमल ज्ञान, चंद्रकांत और बिब, ये पाँच रूद्रागम शिव के ईशान मुख से निसृत हुए थे.
प्रोद्गीत, ललित, सिद्ध, संतान, वातुल, किरणा, सर्वोच्च और परमेश्वर ये आठ रूद्रागम शिव के तत्पुरूष मुख से निर्गत हुए थे. इस प्रकार अष्टाविंशति आगम के 198 विभागों में आगमों की चर्चा दिखाई देती हैं.
*अवांतर भेद-किसी भेद के अंतर्गत आने वाले भेद या विभाग
सन्दर्भ ग्रन्थ: (हरप्रसाद शास्त्री द्वारा संपादित नेपाल दरबार का कैटलाग खंड 2, पृ0 60, तंत्रों की उत्पत्ति, आर्थर एवेलेन: शक्ति ऐंड शास्त्र,भारतीय दर्शन, लेखक बलदेव उपाध्याय)
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