हरिद्वार महाकुंभ का आगाज़ हो चुका है. बीते मंगलवार रमता पंचों ने नगर में प्रवेश किया और आज जूना अखाड़ा की पेशवाई निकाली जायेगी. चलिए जानते हैं क्या है जूना अखाड़ा का इतिहास और महत्व और रमता पंचों का चयन कैसे होता है.
जूना अखाड़ा का इतिहास
जूना अखाड़े की स्थापना सन 1145 ईस्वीं में उत्तराखंड के कर्णप्रयाग में की गयी थी. इस अखाड़े का संबंध शैव संप्रदाय से हैं जिसके ईष्ट देव भगवान शिव के रुद्रावतार दत्तात्रेय हैं.
इस अखाड़े को भैरव अखाड़े के नाम से भी जाना जाता है. इस अखाड़े का केंद्र वाराणसी शहर में गंगा नदी के किनारे हनुमान घाट पर स्थित है.अखाड़े के प्रमुख आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरि महाराज जी है. वे हरिद्वार के कनखल आश्रम में रहते हैं.
जूना अखाड़ा का जीवन
इस अखाड़े से जुड़ने वाले साधु-संतों को अपने आम जन-जीवन से दूरी बनाकर मोह का त्याग कर देना होता है. इन्हें आजीवन भगवान महादेव की भक्ति करनी होती है. इस अखाड़े के नियम बहुत कड़े हैं जिनका हर हाल में पालन किया जाना होता हैं. नागा साधु सबसे ज्यादा जूना अखाड़ा में ही पाए जाते हैं .
जूना अखाड़ा का महत्व
इस अखाड़े में लगभग 4 लाख से ज्यादा साधु संत हैं जिनमें से ज्यादातर नागा साधु है. नागा साधुओं का जीवन अत्यंत कठोर होता हैं जिन्हें जीवनभर सर्दी गर्मी में नग्न अवस्था में रहकर भगवान रूद्र की पूजा करनी होती हैं. इनसे जुड़े साधु विभिन्न प्रकार के योग व साधना करके स्वयं को मौसम की मार, संक्रमण व बीमारियों से बचाकर रखते हैं.
एक लाख से ज्यादा साधुओं को दीक्षा
देश व विदेश में इनसे जुड़े लोगों की संख्या करोड़ो में हैं जो जूना अखाड़ा में मान्यता रखते हैं. इसी के साथ जूना अखाड़ा के प्रमुख अभी तक एक लाख से भी ज्यादा साधुओं व लोगों को दीक्षा दे चुके हैं. इस अखाड़े के हर पद के लिए एक प्रणाली व नियम हैं व हमेशा उसी का पालन किया जाता हैं.
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जूना अखाड़ा में पदों का चुनाव
कुंभ मेले के समय अखाड़ों का वर्चस्व होता हैं खासकर जूना अखाड़े का. उस समय शाही स्नान के लिए जब जूना अखाड़ा निकलता है तो हर कोई इन्हें देखता ही रह जाता है. लाखों की संख्या में नागा साधु गंगा में डुबकी लगाने निकलते है. जूना अखाड़े के लिए कुंभ इसलिये भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उसी समय इस अखाड़े के सभापति, मंडलेश्वर व महामंडलेश्वर का चुनाव किया जाता है.
सभापति का चुनाव
चुनाव के लिए एक सभा आयोजित की जाती हैं जिसमे साधुओं के 52 मुख्य परिवारों के सभी बड़े सदस्य भाग लेते हैं व अखाड़े के लिए सभापति का चुनाव करते हैं. साथ ही अखाड़े में अन्य पदों जैसे कि कोतवाल, महंत, मंडलेश्वर इत्यादि के लिए साधुओं को चुना जाता है. अंत में सभी मिलकर अखाड़े के लिए महामंडलेश्वर का चुनाव करते है जो अखाड़े का प्रमुख अध्यक्ष व पीठाधीश्वर होता है. एक बार चुना हुआ व्यक्ति जीवनपर्यंत के लिए उस पद पर बना रहता है. फिर से उस पद के लिए चुनाव उसकी मृत्यु के पश्चात किया जाता है. वर्तमान महामंडलेश्वर आचार्य अवधेशानंद जी का चुनाव सन 1998 के कुंभ के समय किया गया था.
जून अखाड़ा में रमता पंच
इस अखाड़े में रमता पंच के सदस्यों का चुनाव भी किया जाता है जिन्हें चल सदस्य भी कहते हैं. इनका कार्य अखाड़े की रक्षा करना व अपने ईष्ट देवता की पूजा अर्चना करना होता है.
स्वतंत्रता के बाद बदला स्वरुप
अखाड़ों की स्थापना मुख्य तौर पर साधुओं को धर्म के साथ-साथ सैन्य विद्या सिखाने के उद्देश्य से की गयी थी ताकि वे विदेशी आक्रांताओं से लड़ सके किंतु भारत देश की स्वतंत्रता के बाद अखाड़ों का स्वरुप भी बदल गया. अब देश स्वतंत्र हो चुका था व एक शासन व्यवस्था बन चुकी थी तो अखाड़ों ने भी शस्त्र विद्या त्याग दी थी. वर्तमान में इन अखाड़ों में देश व समाज को धर्म के प्रति शिक्षित करना, शास्त्राथ करना, विभिन्न मंचो पर विचार-विमर्श करना व लोगों को जागरूक करने से हैं.
अखाड़े में मुख्य रूप से दो स्वरुप हैं जिन्हें दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया हैं. एक हैं घर जिसमे अखाड़े से जुड़े साधुओं के परिवारों के लिए निर्णय लिए जाते हैं व दूसरा हैं समाज जिसमे समाज से जुड़े निर्णय लिए जाते हैं.
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