परमार्थ निकेतन में आदि गुरू शंकराचार्य जी की जयंती
- परमार्थ निकेतन में हिन्दू धर्म के, सनातन धर्म के ज्योर्तिधर और वेदान्त के प्रणेता आदि गुरू शंकराचार्य जी की जयंती मनाई
- परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमार ने वेद मंत्रों से किया पूजन
- सेवा, साधना और साहित्य का अद्भुत संगम है पीठ-स्वामी चिदानन्द सरस्वती
ऋषिकेश, 9 मई। परमार्थ निकेतन में हिन्दू धर्म के सर्वोच्च गुरू, सनातन धर्म के ज्योर्तिधर भारत की महान विभूति आदिगुरू शंकराचार्य जी की जयंती के अवसर पर वेद मंत्रों से शंकराचार्य जी का पूजन किया। परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने गुरूकुल के ऋषिकुमारों और श्रद्धालुओं को अद्वैत परम्परा, सनातन धर्म और भारत के चार क्षेत्रों में स्थापित चार पीठों की गौरवमयी परम्परा के विषय में जानकारी प्रदान की।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने आदि गुरू शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित ज्योतिर्मठ, शंृगेरी शारदा पीठ, द्वारिका पीठ, गोवर्धन पीठ के विषय में जानकारी देते हुये भारतीय हिन्दू दर्शन के गूढ़ रहस्यों पर प्रकाश डाला। स्वामी जी ने कहा कि सेवा, साधना और साहित्य का अद्भुत संगम है पीठ। आदि गुरू शंकराचार्य जी ने छोटी सी उम्र में भारत का भ्रमण कर हिन्दू समाज को एक सूत्र मंे पिरोने हेतु चार पीठों की स्थापना की। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, दक्षिण से उत्तर तक, पूर्व से पश्चिम तक पूरे भारत का भ्रमण कर एकता का संदेश दिया। उन्होने कहा कि एकरूपता हमारे भोजन में, हमारी पोशाक में भले ही न हो परन्तु हमारे बीच एकता जरूर हो; एकरूपता हमारे भावों में हो, विचारों में हो ताकि हम सभी मिलकर रहे। किसी को छोटा, किसी को बड़ा न समझे, किसी को ऊँच और किसी को नीच न समझे इस तरह की सारी दीवारों को तोड़ने के लिये तथा छोटी छोटी दरारों को भरने के लिये ही आदिगुरू शंकराचार्य जी ने पैदल यात्रा की। शंकराचार्य जी ने ब्रह्म वाक्य ’’ब्रह्म ही सत्य है और जगत माया’’ दिया। साथ ही सुप्रसिद्ध ग्रंथ ’ब्रह्मसूत्र’ का भाष्य किया, ग्यारह उपनिषदों तथा गीता पर भाष्य किया। शंकराचार्य जी ने वैदिक धर्म और दर्शन को पुनः प्रतिष्ठित करने हेतु अथक प्रयास किये। उन्होने तमाम विविधताओं से युक्त भारत को एक करने में अहम भूमिका निभायी। संस्कृत में संवाद कर उन्होने संस्कृत भाषा को उच्च बौद्धिक वर्ग से जोड़ा। आदिगुरू शंकराचार्य जी ने मठों और अखाड़ोें की स्थापना कर संन्यासियों और साधुओं को उनकी बौद्धिक, शारीरिक और यौगिक शक्ति से हिन्दू धर्म की रक्षा का जिम्मा सौंपा।

आदिगुरू शंकराचार्य जी को अद्वैत वेदान्त के सूत्र ’’अहं ब्रह्मास्मि’’ विचारधारा को, इस अवधारणा को पूरे विश्व में सम्मान मिला है क्योंकि अब समय आ गया है व्यक्ति इस अद्वैत के पारस पत्थर के महत्व को समझे जिसके छूने से कोई भेदभाव नहीं रहता सब पारस बन जाता है। अद्वैत के मर्म को समझने के बाद व्यक्ति में कहाँ ऊँच कहाँ नीच, कहाँ छोटा कहाँ बड़ा ये सारी दीवारंे गिर जाती है इसलिये 21 सदी में ही नहीं बल्कि आने वाली हर सदी में इस विचार की आवश्यकता रहेगी इसलिये आज का दिन महत्वपूर्ण है। आज का दिन इसलिये भी महत्वपूर्ण है चाहे बात एकता की हो या एकरूपता की हो या परमात्म सत्ता से एकता की बात हो उन सब के लिये यह महत्वपूर्ण है। उनका सिद्धान्त आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित है। ’’अहं ब्रह्मास्मि’’ अर्थात मैं ही ब्रह्म हूँ और सर्वत्र हूँ इस प्रकार प्रकृति की रक्षा का संदेश दिया। ऐसे परम तपस्वी, वीतराग, परिव्राजक, श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सनातन धर्म के मूर्धन्य को प्रणाम करते हुये आईयें हम उन्हे अपनी पुष्पांजलि अर्पित करे ताकि सदियों तक उनका मार्गदर्शन पूरे विश्व को मिलता रहे।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों और भारत सहित विश्व के विभिन्न देशांे से आये श्रद्धालुओं को वेद के प्रचार-प्रसार, संस्कृत को पुनः स्थापित करने का संकल्प कराया।
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