कुम्भ में अखाड़ा : इतिहास, महत्व, शब्द व्युत्पत्ति और परंपराएं
कुंभ या अर्धकुंभ में अखाड़ों का विशेष महत्व होता है। यह अखाड़े क्या हैं, इनकी परंपरा क्या है, आइये जानते है इसके बारे में…
अखाड़ा शब्द की उत्पत्ति कब हुई ?
अखाड़ों की शुरूआत आदि शंकराचार्य ने की। वे संन्यास परंपरा में एक जत्था तैयार करना चाहते थे जो धर्म की रक्षा करे। आठवीं शताब्दी में देश में शैव मत यानि शिव को मानने वालों का वर्चस्व था। आज देश में शैव, वैष्णव और उदासीन पंथ के संन्यासियों के मान्यता प्राप्त कुल 13 अखाड़े हैं। साधुओं से बने अखाड़े पहले एक साथ रहने के कारण जत्थे या बेडा कहे जाते थे। अखाड़ा शब्द भी बाद में इनकी पहचान से जुड़ा। पहले अखाड़ा शब्द का चलन नहीं था। अखाड़ा शब्द का चलन पहलवानों की वजह से मुगलकाल से शुरू हुआ। साधु आश्रमों में रहकर शस्त्र और शास्र की शिक्षा प्राप्त करे ये आदि शंकराचार्य की सोच थी। जिससे आज हम नागा साधु या अखाड़ों में पहलवानी करके साधु देख सकते हैं।
कुछ विद्वानों का मानना है कि अलख शब्द से ही अखाड़ा शब्द बना है। कुछ मानते हैं कि अक्खड़ से या आश्रम से। इसे लेकर कई मत है।
अक्षवाट का अपभ्रंश है अखाड़ा

प्राचीनकाल में भी राज्य की ओर से एक निर्धारित स्थान पर चौसर का प्रबंध किया जाता था, जिसे अक्षवाट कहते थे। अक्षवाट, बना है दो शब्दों अक्ष और वाटः से मिलकर। अक्ष के कई अर्थ हैं, जिनमें एक अर्थ है चौसर या चौपड़, अथवा उसके पासे। वाट का अर्थ होता है घिरा हुआ स्थान। यह बना है संस्कृत धातु वट् से जिसके तहत घेरना, गोलाकार करना आदि भाव आते हैं। इससे ही बना है उद्यान के अर्थ में वाटिका जैसा शब्द.
चौपड़ या चौरस जगह के लिए बने वाड़ा जैसे शब्द के पीछे भी यही वट् धातु का ही योगदान रहा है। इसी तरह वाट का एक रूप बाड़ा भी हुआ, जिसका अर्थ भी घिरा हुआ स्थान है। अप्रभंश के चलते कहीं-कहीं इसे बागड़ भी बोला जाता है।
इस तरह देखा जाए तो, अक्षवाटः का अर्थ हुआ, ‘द्यूतगृह अर्थात जुआघर.’ अखाड़ा शब्द संभवत: यूं बना होगा – अक्षवाटः >अक्खाड>अक्खाडा> अखाड़ा.
इसी तरह अखाड़े में वे सब शारीरिक क्रियाएं भी आ गईं, जिन्हें क्रीड़ा की संज्ञा दी जा सकती थी और जिन पर दांव लगाया जा सकता था। जाहिर है प्रभावशाली लोगों के बीच शान और मनोरंजन की लड़ाई के लिए कुश्ती का प्रचलन था, इसलिए धीरे-धीरे कुश्ती का बाड़ा अखाड़ा कहलाने लगा और जुआघर को अखाड़ा कहने का चलन खत्म हो गया।
अब तो व्यायामशाला को भी अखाड़ा कहते हैं और साधु-संन्यासियों के मठ या रुकने के स्थान को भी अखाड़ा कहा जाता है। हालांकि आधुनिक व्यायामशाला का निर्माण स्वामी समर्थ रामदान की देन है, लेकिन संतों के अखाड़ों का निर्माण पुराने समय से ही चला आ रहा है.
व्यायामशाला में पहलवान कुश्ती का अभ्यास करते हैं. दंड, बैठक आदि लगाकर शारीरिक श्रम करते हैं वहीं संतों के अखाड़ों में भी शारीरिक श्रम के साथ ही अस्त्र और शास्त्र का अभ्यास करते हैं।
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कुम्भ में अखाड़ों का महत्त्व
पूर्णकुम्भ, कुंभ और अर्धकुंभ में अखाड़ों का विशेष महत्व होता है। अखाड़ों की वजह से लाखों साधु, संन्यासी, नागा कुम्भ मेले की शाश्वत परंपरा को जीवित करते हैं। उनके होने से कुम्भ की दिव्यता का अहसास होता है। कुम्भ का सारी पारंपरिक चीजें इन अखाड़ों से जुड़ी हुई हैं।
प्रमुख पारंपरिक 13 अखाड़े

मूलत: कुंभ या अर्धकुंभ में साधु-संतों के कुल 13 अखाड़ों द्वारा भाग लिया जाता है. इन अखाड़ों की प्राचीन काल से ही स्नान पर्व की परंपरा चली आ रही है….नीचे दिए गए लेख में आप शाही स्नान के बारे में सबकुछ जान सकते हैें।
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शैव संन्यासी संप्रदाय के 7 अखाड़े
1. श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी- दारागंज प्रयाग (उत्तर प्रदेश)
2. श्री पंच अटल अखाड़ा- चैक हनुमान, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
3. श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी- दारागंज, प्रयाग (उत्तर प्रदेश)
4. श्री तपोनिधि आनंद अखाड़ा पंचायती – त्रंब्यकेश्वर, नासिक (महाराष्ट्र)
5. श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा- बाबा हनुमान घाट, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
6. श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा- दशाश्वमेघ घाट, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
7. श्री पंचदशनाम पंच अग्नि अखाड़ा- गिरीनगर, भवनाथ, जूनागढ़ (गुजरात)
बैरागी वैष्णव संप्रदाय के 3 अखाड़े
8. श्री दिगम्बर अनी अखाड़ा- शामलाजी खाकचौक मंदिर, सांभर कांथा (गुजरात)
9. श्री निर्वानी आनी अखाड़ा- हनुमान गादी, अयोध्या (उत्तर प्रदेश)
10. श्री पंच निर्मोही अनी अखाड़ा- धीर समीर मंदिर बंसीवट, वृंदावन, मथुरा (उत्तर प्रदेश)
उदासीन संप्रदाय के 3 अखाड़े
11. श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा- कृष्णनगर, कीटगंज, प्रयाग (उत्तर प्रदेश)
12. श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन- कनखल, हरिद्वार (उत्तराखंड)
13. श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा- कनखल, हरिद्वार (उत्तराखंड)
13 अखाड़ों से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें
अटल अखाड़ा
यह अखाड़ा अपने आप पर ही अलग है. इस अखाड़े में केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य दीक्षा ले सकते है और कोई अन्य इस अखाड़े में नहीं आ सकता है।
अवाहन अखाड़ा
अन्य आखड़ों में महिला साध्वियों को भी दीक्षा दी जाती है लेकिन इस अखाड़े में ऐसी कोई परंपरा नहीं है।
निरंजनी अखाड़ा
यह अखाड़ा सबसे ज्यादा शिक्षित अखाड़ा है. इस अखाड़े में करीब 50 महामंडलेश्र्चर हैं।
अग्नि अखाड़ा
इस अखाड़े में केवल ब्रह्मचारी ब्राह्मण ही दीक्षा ले सकते है. कोई अन्य दीक्षा नहीं ले सकता है।
महानिर्वाणी अखाड़ा
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा का जिम्मा इसी अखाड़े के पास है. यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है।
आनंद अखाड़ा
यह शैव अखाड़ा है जिसे आज तक एक भी महामंडलेश्वर नहीं बनाया गया है. इस अखाड़े के आचार्य का पद ही प्रमुख होता है।
दिंगबर अणि अखाड़ा
इस अखाड़े को वैष्णव संप्रदाय में राजा कहा जाता है. इस अखाड़े में सबसे ज्यादा खालसा यानी 431 हैं।
निर्मोही अणि अखाड़ा
वैष्णव संप्रदाय के तीनों अणि अखाड़ों में से इसी में सबसे ज्यादा अखाड़े शामिल हैं. इनकी संख्या 9 है।
निर्वाणी अणि अखाड़ा
इस अखाड़े में कुश्ती प्रमुख होती है जो इनके जीवन का एक हिस्सा है. इसी कारण से अखाड़े के कई संत प्रोफेशनल पहलवान रह चुके हैं।
बड़ा उदासीन अखाड़ा
इस अखाड़े उद्देश्य सेवा करना है. इस अखाड़े में केवल 4 मंहत होते हैं जो कभी कामों से निवृत्त नहीं होते है।
नया उदासीन अखाड़ा
इस अखाड़े में उन्हीं लोगों को नागा बनाया जाता है जिनकी दाढ़ी-मूंछ न निकली हो यानी 8 से 12 साल तक के।
निर्मल अखाड़ा
इस अखाड़ा में और अखाड़ो की तरह धूम्रपान की इजाजत नहीं है. इस बारे में अखाड़े के सभी केंद्रों के गेट पर इसकी सूचना लिखी होती है।
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