श्रवणबेलगोल के बाहुबली का हुआ अति भव्य महामस्तकाभिषेक
कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में भगवान बाहुबली महामस्तकाभिषेक पूरे विधि विधान से संपन्न हुआ। हर 12 वर्ष पर होने वाले इस महा-आयोजन में जैन धर्म को मानने वालों के अलावा देश दुनिया से हजारों लोग आते है। महामस्तकाभिषेक की शुरूआत 17 फरवरी को हुई और सबसे पहले जल से बाहुबली की प्रतिमा का अभिषेक किया गया। फिर नारियल पानी, चावल के आटे, हल्दी से महाअभिषेक हुआ। और अंत में फूलों की वर्षा की गई। महामस्तकाभिषेख के लिए जर्मन तकनीक पर आधारित 12 करोड़ रुपये से बने विशाल मंच पर 5000 भक्त मौजूद थे। 12 साल बाद होने वाले इस खास आयोजन की शुरूआत 7 फरवरी को हुई थी, जिसका राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने उद्घाटन किया था, 19 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी इसमें हिस्सा लेंगे।
देखिए महामस्तकाभिषेक का पूरा वीडियो…..
कहां है श्रवणबेलगोल और क्यों है मशहूर ?
हासन जिल्ला में श्रवणबेलगोल प्रमुख यात्रास्थल है l विश्व में ही अति ऊंँचाई गोम्मटेश्वर का एकशिला की प्रतिमा विंध्यगिरि पहाड के ऊपर है l श्रवणबेलगोल के लिए 58.8 फ़ूट ऊंँचाई यह गोम्मटेश्वर की प्रतिमा कलशप्राय है l यहांँ के किला के प्रवेश द्वार, महाद्वार,सिद्धर्गुंडु, गुळ्ळकायि अज्जि द्वार इत्यदि देख सकते हैं l पहाड चढने के लिए सीढियांँ हैं l गोम्मटेश्वर प्रतिमा को बारह सालों में एक बार महामस्तकाभिषेक किया जाता है l
बाहुबली के महामस्तकाभिषेक का इतिहास
शास्त्रों के अनुसार, चावुंडराय, जो गंगस का प्रधान सेनापति था, ने इर्सा पूर्व 981-82 में बाहुबली की प्रतिमा स्थापित की। इस प्रतिमा का महामस्तकाभिषेक करते समय उसके मन में यह मिथ्या अहंकार था कि कोइ और व्यक्ति इस प्रतिमा का महामस्तकाभिषेक नहीं कर सकता था। उसने विशाल पात्रों में दूध और इर्खं का रस भर कर एकत्र किया था। उसने प्रतिमा के मस्तक पर सारा दूध, इर्खं का रस और घी भी उड़ेल दिया। तथापि, कोइ द्रव कमर से नीचे प्रवाहित नहीं हुआ। जब चावुंडराय इस विलक्षण परिस्थिति के विषय में चिंता कर रहा था, उसी समय एक वृद्धा स्त्री के भेष में पद्मावती यक्षिणी हाथ में गुल्लकायी (घड़ा) लिए आइ और सीढ़ियाँ चढ़कर हर किसी को अभिषेक के बारे में निर्देश देने लगी। वृद्धा स्त्री ने अपने साथ लाइ गुल्लकायी से दूध उड़ेला, और दूध मूसलाधार वर्षा एवं तीव्र जल प्रवाह के समान नीचे प्रवाहित हो गया। गोम्मत की प्रतिमा पर दूध आपादमस्तक फैल गया। इस विलक्षण घटना से अचम्भित, चावुंडराय को बोध हुआ कि “इर्श्वर यह नहीं देखता कि क्या चढ़ाया जा रहा है, बल्कि वह केवल भक्ति और समर्पण देखता है।” उसने देवता की दैनिक पूजा तथा अन्य विशिष्ट समारोहों के खर्च के लिए तत्काल ग्रामों सहित अनेक चीजें दान में भेंट कर दी। आगे चलकर १७वीं शताब्दी इर्स्वी में, मैसूर राज्य के चिक्कदेवराज वोडेयार ने वहाँ आगंतुक भक्तों की प्यास बुझाने के लिए एक झील का निर्माण करवाया। श्रवणबेलगोला के आस-पास कन्नड़, संस्कृत, मराठी, तमिल, मारवाड़ी आदि भाषाओं में उत्कीर्ण लगभग १७२ शिलालेख हैं, जिनके विषय में कहा जाता है कि ये दसवीं शताब्दी इर्स्वी के हैं। इनके अतिरिक्त, आठ छोटे-बड़े मन्दिर, चार मंडप, दो तालाब, पाँच विशाल द्वार और तीन स्तम्भ विद्यमान हैं।
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