बिहार में मिले प्राचीन शहर के अवशेष, यहां दफन बुद्ध की अनमोल स्मृतियां
लखीसराय शहर स्थित जयनगर लाली पहाड़ी की खुदाई का कार्य जारी है. इससे निकलने वाले अवशेषों से प्राचीन साहित्य व पुरातात्विक सर्वेक्षण रिपोर्ट सच होती दिख रही है. अवशेष बता रहे हैं कि कभी यहां विकसित मानव बस्ती थी. इस शहर में भगवान बुद्ध आए थे और इस कारण यहां बौद्ध विहार भी थे.
जुड़ सकता है बौद्ध सर्किट से
लाली पहाड़ी की खोदाई का कार्य बिहार विरासत विकास समिति, पटना एवं विश्व भारती विश्वविद्यालय, शांति निकेतन संयुक्त रूप से कर रहा है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आदेश से पिछले वर्ष 25 नवंबर को खुदाई कार्य का शुभारंभ किया था. यदि सबकुछ ठीक रहा तो लखीसराय भी राजगीर, वैशाली व बोधगया की तरह बौद्ध सर्किट से जुड़कर नया इतिहास लिखेगा.
लखीसराय का पुरातात्विक महत्व
प्राचीन बौद्ध-हिंदू धर्म के साहित्य व पुरातात्विक सर्वेक्षण रिपोर्टों के अनुसार लखीसराय का प्राचीन नाम क्रिमिला था. यह प्रचीन भारत का विस्मृत नगर था. इस नगर का नाम क्रिमिल के नाम पर पड़ा जो भगवान बुद्ध के शिष्य आनंद के सहयोगी थे. वे यहीं के श्रेष्ठी पुत्र थे. क्रिमिला के बुलावे पर भगवान बुद्ध ने 13वां, 18वां एवं 19वां वर्षावास यहां व्यतीत किया था.
इसका उल्लेख बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय एवं मोहवग्गिय में है. बौद्ध धर्म ग्रंथों में इसका भी जिक्र है कि क्रिमिला के चालीय पर्वत पर बुद्ध ने प्रवचन किया. चीनी तीर्थयात्री ह्नेनसांग ने भी अपने यात्रा वृतांत में इसका उल्लेख किया है. मगध सम्राट अशोक ने यहां स्तूप का निर्माण कराया था. अभिलेखों से यह भी ज्ञात होता है कि यह नगर गुप्तकाल की प्रमुख प्रशासनिक इकाई थी.
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खुदाई में अब तक मिले अवशेष
जयनगर लाली पहाड़ी की खुदाई में बौद्ध विहार के नौ सेल मिले हैं, जो आपस में जुड़े हुए हैं. सुर्खी-चूना का बना फ्लोर व पूजा के काम में आने वाला टेराकोटा बिड्स भी मिले हैं. बुद्ध की प्राचीन प्रतिमा व दीपक के अलावा चौथी से लेकर 13वीं सदी के मृदभांड़ (मिट्टी के बर्तन) मिले हैं.
काले पत्थर का नक्काशी किया हुआ प्लेटफॉर्म मिला है, जो संभवत: साधना केंद्र रहा होगा. पहाड़ी के पूर्वी छोर से खोदाई हो रही है. करीब 50 मीटर दूर मध्य में मंदिर मिलने का अनुमान है.
खुदाई कार्य से यह प्रतीत हो रहा है कि यहां भगवान बुद्ध का वर्षावास हुआ था. कभी लाली पहाड़ी के साथ बिछवे और घोषीकुंडी पहाड़ी का भी जुड़ाव रहा होगा. वर्तमान में तीनों अलग-अलग पहाडिय़ां हैं. तीनों को सड़क मार्ग से बौद्ध सर्किट से जोडऩे की जरूरत है.
क्रिमिला का क्षेत्र पूरब में दैताबांध, पश्चिम में हरूहर नदी, उत्तर में गंगा नदी और दक्षिण में नोनगढ़-सरसंडा तक फैला था. इस परिक्षेत्र में कई टीले और पहाडिय़ां हैं, जिनके अंदर इतिहास दफन है.
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