कौन है सद्गुरू जग्गी वासुदेव ?
योगी, दिव्य पुरुष, सदगुरु जग्गी वासुदेव अध्यात्म की दुनिया में अपना एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। इनका जीवन गंभीरता और व्यवहारिकता का एक आकर्षक मेल है, अपने कार्यों के जरिए इन्होंने योग को एक गूढ़ विद्या नहीं बल्कि समकालीन विद्या के तौर पर दर्शाया। सदगुरु जग्गी वासुदेव को मानवाधिकार, व्यापारिक मूल्य, सामाजिक-पर्यावरणीय मसलों पर अपने विचार रखने के लिए वैश्विक स्तर पर आमंत्रित किया जाता है।
वह ईशा फाउंडेशन नामक लाभरहित मानव सेवी संस्थान के संस्थापक हैं। ईशा फाउंडेशन भारत सहित संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड, लेबनान, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया में योग कार्यक्रम सिखाता है साथ ही साथ कई सामाजिक और सामुदायिक विकास योजनाओं पर भी काम करता है। इसे संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक परिषद में विशेष सलाहकार की पदवी प्राप्त है। उन्होने ८ भाषाओं में १०० से अधिक पुस्तकों की रचना की है।
सद्गुरु का प्रारंभिक जीवन
सद्गुरु जग्गी वासुदेव का जन्म मैसूर शहर में एक चिकित्सक पिता के घर हुआ। बचपन से ही, वासुदेव दूसरों की तुलना में काफी अलग थे। तेरह साल की उम्र में, उन्होंने श्री राघवेंद्र राव (मल्लदिहल्ली स्वामी) के मार्गदर्शन में प्राणायाम और आसन जैसे योग प्रथा शुरू की थी।
उन्होंने कर्नाटक के मैसूर विश्वविद्यालय से स्नातक किया। जब वासुदेव पच्चीस वर्ष के थे, तो उन्होंने एक असामान्य घटना देखी जो उन्हें जीवन और भौतिक वस्तुओं दूर ले गया और त्याग की ओर ले गया।
जग्गी वासुदेव का आध्यात्मिक अनुभव
एक दोपहर, सद्गुरु जग्गी वासुदेव चामुंडी पहाड़ियों पर चले गए और एक चट्टान पर बैठ गए। उनकी आँखें खुली थीं। अचानक, वह शरीर के अनुभव से बाहर निकल गए उन्हें लगा कि वह अब अपने शरीर में नहीं हैं, बल्कि हर जगह फैल गए हैं, चट्टानों में, पेड़ों में, पृथ्वी पर।
जब तक वह अपने होश में वापस आये, पहले से ही शाम हो गई थी। उसके बाद के दिनों में, वासुदेव ने एक बार फिर से स्थिति का अनुभव किया, कई बार जब भी, उन्हें ऐसे अनुभव होते थे। वह अगले तीन या चार दिनों के लिए भोजन और नींद त्याग देते थे।
ईशा योग केंद्र की स्थापना
इस घटना ने पूरी तरह से सद्गुरु के जीवन जीने का तरीका बदल दिया। जग्गी वासुदेव ने अपना पूरा जीवन अपने अनुभवों को साझा करने के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया। 1992 में, उन्होंने और उनके अनुयायियों ने ईशा योग केंद्र और आश्रम की स्थापना की।
यह कोयम्बटूर के निकट पुण्डी में पवित्र वेल्लियन्गिरि पर्वत की तलहटी पर स्थित है। यह केंद्र 50 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है और यहाँ एक विशाल 13 फीट ध्यान करने के लिए एक ध्यान मंदिर है। इस परिसर में एक बहु-धार्मिक मंदिर भी है, जिसे 1999 में पूरा किया गया था।
ऐसा कहा जाता है कि ध्यानलिंगम में रोगों का अभाव होता है और अच्छाई और समृद्धि होती है। चूंकि यह एक ध्यान केंद्र है, इसलिए माना जाता है कि वहां उन लोगों से ऊर्जा का जलाशय है जो यहां पर ध्यान करते हैं।लोग ध्यानलिंगम के अंदर बैठ सकते हैं और जितना चाहें उतना ध्यान कर सकते हैं।
ईशा योग केंद, ईशा फाउंडेशन द्वारा सद्गुरु जग्गी वासुदेव द्वारा शुरू किया गया, जिसके संयुक्त राज्य में तीन योग केंद्र के अलावा 25 से ज्यादा योग केंद्र, एक मेडिकल सेंटर और भारत में एक अनाथालय का संचालन करती है।
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क्या है ईशा योग
ईशा योग मूल रूप से विज्ञान का एक रूप है, जो तीव्र और बहुत शक्तिशाली है। यह उस सिद्धांत पर आधारित है जिसमें शरीर को आत्मा का मंदिर समझा जाता है। साथ ही, अच्छे स्वास्थ्य को शारीरिक और आध्यात्मिक विकास के लिए मौलिक माना जाता है। ईशा योग का मुख्य उद्देश्य शांति और शांति के साथ, सर्वोत्तम संभव स्वास्थ्य को विकसित करना और बढ़ावा देना है।
ईशा योग शिविर
1983 में मैसूर में अपने सात सहयोगियों के साथ उन्होंने अपनी पहली योगा क्लास की शुरुवात की। कहा जाता है की ध्यानलिंग में उपचारात्मक शक्तियां होती है, जो मानव विकास और सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ध्यान केंद्र होने की वजह से ऐसा माना जाता है ध्यान करने के बाद लोगो में यहाँ अपार उर्जा आ जाती है। यहाँ पर ध्यानकेंद्र में बैठकर लोग जितनी देर तक चाहे उतनी देर तक ध्यान लगाकर रह सकते है।
समय के साथ-साथ वे कर्नाटक और हैदराबाद में भी यात्राए कर योगा क्लास का आयोजन करने लगे। वे पूरी तरह से अपने पोल्ट्री फार्म पर आश्रित थे और क्लास के लिए उन्होंने लोगो से पैसे लेना भी मना कर दिया। उनका उद्देश्य यही होता था की वे सहयोगियों से आने वाले पैसो को क्लास के अंतिम दिन में स्थानिक चैरिटी करते थे। बाद में इन्ही शुरुवाती कार्यक्रमों के आधार पर ईशा फाउंडेशन की रचना की गयी।
ईशा फाउंडेशन के सामाजिक कार्य
जग्गी वासुदेव प्रोजेक्ट ग्रीन हैंड्स के भी संस्थापक है, उनका मुख्य उद्देश्य तमिल नाडू में हर साल कम से कम 10% तक हरे पेड़-पौधों को बढ़ाना है और आज संस्था के 20 लाख स्वयंसेवक तक़रीबन 27 मिलियन से भी ज्यादा पौधों का रोपण कर चुके है।
‘एक्शन फॉर रूरल रेजुवेनेशन’ (ARR) ईशा फाउंडेशन की ही एक पहल है, जिसका मुख्य उद्देश्य गाँव में रहने वाले गरीबो के स्वास्थ और उनके जीवन की गुणवत्ता को विकसित करना है। ARR की स्थापना 2003 में की गयी और दक्षिण भारत के गांवों के 70 मिलियन लोगो को वे सुविधा पहुचाना चाहते है। साथ ही भारतीय किसानो द्वारा सहन की जा रही खेती संबंधी विविध समस्याओ का समाधान निकालने में भी ARR कार्यरत है।
ईशा विद्या, ईशा फाउंडेशन द्वारा ही शिक्षा के क्षेत्र में चलायी जा रही एक योजना है। जिसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण भारत में शिक्षा के स्तर का विकास करना है। इस योजना के तहत उन्होंने 7000 बच्चो को पढ़ाने वाली 7 ग्रामीण स्कूलों की स्थापना की है। साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर बच्चो की सहायता करने के लिए उन्होंने 512 सरकारी स्कूलों को गोद ले रखा है
सद्गुरु को मिले पुरस्कार
2017 में उनके योगदानो को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया है।
2010 में भारत सरकार ने ‘इंदिरा गाँधी पर्यावरण पुरस्कार’ देकर सम्मानित किया।
आपको बता दें कि सद्गुरु ने आज के समय में आम आदमी के लिए योग के गूढ़ आयामों को इतना ज्यादा सहज बना दिया है कि हर व्यक्ति उस पर अमल कर सकता है और यदि थोड़ा सा प्रयास करे तो स्वयं अपने भाग्य का स्वामी बन सकता है।
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