भारतीय संस्कृति में माँ और संतान का रिश्ता केवल रक्त का नहीं, बल्कि आस्था, त्याग और तपस्या से जुड़ा होता है। इसी भावनात्मक और धार्मिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण रूप है सकट चौथ व्रत, जिसे विशेष रूप से माताएँ अपने पुत्र की लंबी उम्र, सुख और संकटों से रक्षा के लिए रखती हैं। यह व्रत न सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि मातृत्व की निस्वार्थ भावना को भी दर्शाता है।
सकट चौथ को कई क्षेत्रों में संकष्टी चतुर्थी या तिलकुटा चौथ भी कहा जाता है। यह व्रत माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन माता पार्वती ने भगवान गणेश की पूजा कर संतान सुख का वरदान प्राप्त किया था। तभी से यह व्रत संतान की मंगलकामना से जुड़ गया।
इस व्रत की सबसे विशेष बात है इसका निर्जला स्वरूप। कई माताएँ पूरे दिन जल तक ग्रहण नहीं करतीं। यह निर्जला संकल्प केवल शारीरिक तपस्या नहीं, बल्कि एक मानसिक और आध्यात्मिक समर्पण है। माँ अपने कष्टों को भुलाकर केवल संतान के भविष्य की कामना करती है। यही कारण है कि सकट चौथ व्रत को मातृत्व की सबसे कठोर लेकिन पवित्र तपस्या माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सकट चौथ के दिन भगवान गणेश संकट हरने वाले होते हैं। माँएँ इस दिन गणपति को तिल, गुड़, मोदक और दूर्वा अर्पित करती हैं। शाम के समय चंद्रमा के दर्शन के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। चंद्र दर्शन का विशेष महत्व है क्योंकि चंद्रमा को शीतलता, शांति और जीवन ऊर्जा का प्रतीक माना गया है।
सकट चौथ व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह माँ और पुत्र के बीच भावनात्मक संबंध को और मजबूत करता है। यह व्रत सिखाता है कि सच्ची आस्था दिखावे में नहीं, बल्कि त्याग और विश्वास में होती है। आधुनिक युग में जहाँ जीवन तेज़ रफ्तार और तनावपूर्ण हो गया है, वहाँ भी यह परंपरा हमें जड़ों से जोड़ती है।
कुछ लोग तर्क देते हैं कि उपवास से जीवन में कोई वास्तविक परिवर्तन नहीं होता, लेकिन आस्था रखने वालों के लिए यह विश्वास ही सबसे बड़ी शक्ति है। माँ का यह विश्वास ही उसकी संतान के लिए एक अदृश्य सुरक्षा कवच बन जाता है। सकट चौथ व्रत इसी विश्वास का जीवंत उदाहरण है।
आज के समय में सकट चौथ का स्वरूप भले ही बदल रहा हो, लेकिन इसका भाव वही है—संतान की रक्षा, स्वास्थ्य और दीर्घायु। कई महिलाएँ स्वास्थ्य कारणों से निर्जला न रहकर फलाहार करती हैं, जो यह दर्शाता है कि धर्म में भावना को कर्म से ऊपर माना गया है।
अंततः, सकट चौथ व्रत हमें यह याद दिलाता है कि माँ की प्रार्थना सबसे बड़ी शक्ति होती है। यह व्रत न केवल धार्मिक परंपरा है, बल्कि मातृत्व की उस भावना का उत्सव है, जहाँ माँ अपने सुख-दुख से ऊपर उठकर संतान के लिए जीती है।
~ रिलीजन वर्ल्ड ब्यूरो
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