देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के बीच हुआ गीता पर विशेष उद्बोधन

हरिद्वार, 27 फ़रवरी; देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम के अलावा गीता व ध्यान पर विशेष कक्षाओं के आयोजन का क्रम निरंतर चलता है, जिससे युवाओं की बौद्धिक क्षमता के विकास के साथ वे जीवन जीने की कला भी सीख सकें.इसी क्रम में गीता पर आयोजित विशेष कक्षा को संबोधित करते हुए देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्या ने कहा कि भगवान हमारे कण-कण में निवास करते हैं. वे अप्रत्यक्ष रूप से मार्गदर्शन करते हुए आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं.
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मनुष्य को सदैव अपने कर्म में निरत रहना चाहिए. गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि मनुष्य को सदैव भगवान का स्मरण करते रहना चाहिए, जिससे वे सदा ऊँचे आदर्शों के लिए अपना समय लगा सकें. योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि मुझमें अर्पण किये हुए मन व बुद्धि से युक्त होकर निःसंदेह भगवान को प्राप्त करोगे. उन्होंने कहा कि वासनाओं और तृष्णाओं से मुक्त होकर जीवन जीना चाहिए और यही जीवन जीने की सर्वोत्तम कला है. इससे आपके आस-पास रहने वालों को फायदा होगा. उन्होंने कहा कि युवावस्था झूठ, भ्रष्टाचार, अनीति जैसी कुरीतियों से संघर्ष का समय होता है. इन दिनों ही मनुष्य अपने नैसर्गिक उत्साह व उमंग से परिपूर्ण होता है. यही अवस्था अपनी नैतिक विचारों को पुष्ट कर समाज को नई दिशा देने में लगाने का है. इस अवसर पर देसंविवि के अभिभावक डॉ. पण्ड्या ने गीता के 8वें अध्याय के सातवें श्लोक की युगानुकूल व्याख्या करते हुए युवावस्था में भटकाव से बचने के विविध उपायों की विस्तृत जानकारी दी.
इससे पूर्व अनेक विद्यार्थियों की विविध शंकाओं का समाधान कुलाधिपति डॉ. पण्ड्या ने किया. इस अवसर पर कुलपति श्री शरद पारधी, प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या, कुलसचिव श्री संदीप कुमार सहित समस्त विभागाध्यक्ष, आचार्य,विद्यार्थीगण सहित शांतिकुंज व ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के अनेक अंतेवासी कार्यकर्त्ता उपस्थित रहे.
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