संसार की जननी “मां तारा”
सृष्टि की जननी, पालन करने वाली और उसका संहार करने वाली आद्या शक्ति मां काली जब अब अपने क्रियात्मक शक्ति के स्वरुप में आती हैं तब पंच तत्वों से इस संसार का निर्माण करती हैं। मां काली के इसी स्वरुप का नाम है मां तारा। मां तारा ब्रह्मा की सृष्टि निर्माण की क्रियात्मक शक्ति हैं।

जब मां काली ब्रह्मा की शक्ति महासरस्वती को अपना माध्यम बनाती हैं तब महासरस्वती के शरीर से मां तारा का जन्म होता है।

ब्रह्मा के द्वारा मां काली के स्वरुप योगमाया देवी का जब स्तवन किया गया तो वो दशभुजा महाकाली के स्वरुप में प्रकट हो कर विष्णु के नेत्रों,हदय और बाहुओं से निकल कर मधु कैटभ के वध का माध्यम बनती हैं। इसके बाद विष्णु निद्रा का त्याग कर मधु कैटभ का वध करते हैं। लेकिन मधु कैटभ के शरीर के भाग से जब पृथ्वी के भूमि भाग की उत्पत्ति होती है तब उस पर किसी भी जीवन का आभाव होता है। यहीं से सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया शुरु होती है।
वैज्ञानिक और सनातन धर्म दोनों के मुताबिक पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत के लिए उर्जा की आवश्यकता पड़ती है और पृथ्वी पर जीवन सूर्य की उर्जा से ही संभव है। भूमि पर पर इसी जीवन की शुरुआत करने के लिए मां तारा और शिव एक साथ आते हैं और दोनों की वजह से ही सूर्य की उत्पत्ति होती है। मां काली के स्वरुप मां तारा और शिव के स्वरुप अक्षोभ्य के मिलन से सूर्य का जन्म होता है और इसी के साथ जीवन की उत्पत्ति की कहानी शुरु होती है। गौर करने वाली बात ये भी है कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी सूर्य एक तारा ही है।

मां तारा को उर्जा, ताप और पवन की शक्ति माना जाता है। मां तारा के श्वास से पवन की उत्पत्ति होती है, जिससे जीवों में प्राण शक्ति आती है। मां तारा ब्रम्हा और शिव की शक्ति तो हैं ही साथ ही में वो विष्णु असंभव शक्ति भी हैं। वो शक्ति जिसका उपयोग स्वयं विष्णु भी नहीं कर सकते। अद्भुत रामायण की एक कथा के मुताबिक विष्णु के अवतार भगवान राम ने जब रावण का संहार कर दिया तो एक दूसरा महाशक्तिशाली दैत्य सहस्त्रस्कंध रावण प्रगट हुआ। इस सहस्त्रस्कंध रावण का निर्माण रावण की माता कैकशी और रावण के पिता विश्रवा ने किया था। इस रावण को मारने में विष्णु के अवतार राम भी अशक्त हो गए तब माता सीता के शरीर को माध्यम बना कर मां काली प्रगट हुईं। ब्रह्मा के अनुरोध पर मां काली के ने रौद्र रुप धारण कर सहस्त्रस्कंध रावण का वध किया। लेकिन उनका स्वरुप इतना रौद्र था और वो इतनी क्रोधित थी कि उनके क्रोध को शांत करने के लिए ब्रह्मा ने उनकी स्तुति की।

ब्रह्मा की स्तुति के फलस्वरुप मां काली ने जो शांत स्वरुप धारण किया वो और कोई नहीं मां थी। मां तारा के पैरों के नीचे साक्षात महादेव आए और उन्होंने मां से ब्रम्हविद्या का ज्ञान लिया। वो ब्रम्हविद्या जिससे सृष्टि का निर्माण, पालन और संहार होता है। मां का स्वरुप मां काली की ही तरह है लेकिन उनके शरीर का रंग नीला है। आसमान की तरह गहरा नीला। मां तारा चूंकि मां काली की निर्माण स्वरुपा हैं इस लिए वो शांत और गंभीर हैं। मां की उर्जा जीवन दायनी हैं तभी तो तारा रहस्य के मुताबिक जब शिव ने हलाहल विष का पान किया था और उनके कंठ में जलन होने लगी, तब मां काली ने मां तारा का स्वरुप लेकर नीलकंठ महादेव को अपना दूध पिलाया और हलाहल विष के प्रभाव को खत्म कर दिया था।
कालिका रहस्य के अनुसार ब्रम्हा के ही अनुरोध पर मां काली ने मां तारा के रुप में प्रगट हो कर हयग्रीव नामक राक्षस का संहार किया था और देवताओं को अमरावती राज्य पुन प्रदान किया था। मां को न केवल सनानत धर्म में पूजा जाता है बल्कि वो बौद्ध धर्म की भी एक महत्वपूर्ण देवी के रुप में पीजित होती हैं। मां तारा की पूजा बंगाल और बिहार के ज्यादातर हिस्सों में की जाती है। तारापीठ मां तारा का सर्वोच्च पीठ है जिसें मूल शक्तिपीठों में माना जाता है। यह भी मान्यता है कि मां सती के आंखो का एक हिस्सा यहीं गिरा था। मां की साधना के द्वारा साधक पंच तत्वों पर नियंत्रण पा सकता है। इस वाह्य जगत में जो कुछ भी है उसे प्राप्त कर सकता है। इस वाह्य जगत की हरेक गतिविधि पर मां का ही नियंत्रण है।
लेखक – अजीत कुमार मिश्रा
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