उज्जैन के नागचंद्रेश्वर मंदिर का रहस्य : केवल नागपंचमी पर खुलने वाला मंदिर
- वर्ष में में केवल एक दिन ही खुलता है यह नागचंद्रेश्वर मन्दिर, आइये जाने क्यों ?
- 5 अगस्त 2019 को (नागपंचमी के शुभ अवसर पर) को दोपहर 12 बजे पूजा होगी
- 60 फुट ऊंचाई पर स्थित है मंदिर
प्रसिद्ध उज्जैन स्थित नागचन्द्रेश्वर मंदिर देश का एक ऐसा मंदिर है जिसके कपाट साल में केवल एक दिन के लिए खोले जाते हैं। हालांकि यहां ऐसी कोई विषम भौगोलिक या प्राकृतिक परिस्थिति नहीं है, तब भी इस मंदिर के पट केवल सावन महीने में नागपंचमी के दिन खोले जाते हैं।
नागचन्द्रेश्वर मंदिर द्वादश ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर मंदिर के परिसर में सबसे ऊपर यानी तीसरे खंड में स्थित है। ग्यारहवीं शताब्दी के इस मंदिर में नाग पर आसीन शिव-पार्वती की अतिसुंदर प्रतिमा है, जिसके ऊपर छत्र के रूप में नागदेवता अपना फन फैलाए हुए हैं।

हिंदू धर्म में सदियों से नागों की पूजा करने की परंपरा रही है। हिंदू परम्परा में नागों को भगवान का आभूषण भी माना गया है। भारत में नागों के अनेक मंदिर हैं, इन्हीं में से एक मंदिर है उज्जैन स्थित नागचंद्रेश्वर जी का,जो की उज्जैन के प्रसिद्ध महाँकाल मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित है। इसकी खास बात यह है कि यह मंदिर साल में सिर्फ एक दिन नागपंचमी (श्रावण शुक्ल पंचमी) पर ही दर्शनों के लिए खोला जाता है। ऐसी मान्यता है कि नागराज तक्षक स्वयं मंदिर में रहते हैं।
भगवान शिव के इस रुप को नागचन्द्रेश्वर महादेव कहा जाता है. यहां की परंपरा के अनुसार आम दर्शनार्थी नागचन्द्रेश्वर महादेव का दिव्य दर्शन वर्ष में केवल एक बार नागपंचमी पर्व के दिन ही कर पाते हैं।

गौरतलब है कि श्री महाकालेश्वर मंदिर तीन खंडों में बंटा है और इस मंदिर के विशाल प्रांगण पहली मंजिल पर भगवान महाकालेश्वर, दूसरी मंजिल पर श्री ओंकारेश्वर और तीसरी मंजिल पर भगवान नागचन्द्रेश्वर स्थापित हैं।
ऐतिहासिक साक्ष्य यह बताते हैं कि श्री नागचन्द्रेश्वर भगवान की प्रतिमा नेपाल से यहां लायी गयी थी. नागपंचमी पर्व के अवसर पर श्री महाकालेश्वर और श्री नागचंद्रेश्वर भगवान के दर्शन के लिए आए श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग प्रवेश की व्यवस्था की जाती है।
नागचंद्रेश्वर मंदिर में 11वीं शताब्दी की एक अद्भुत प्रतिमा है, इसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं। कहते हैं यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है।
पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं। मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या पर विराजित हैं। शिवशंभु के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए हैं।
उज्जैन (मप्र) के महाकालेश्वर मंदिर के शिखर पर स्थित नागचंद्रेश्वर महादेव मंदिर दर्शनार्थियों के लिए खोला जाता है। ये मंदिर साल में एक बार नाग पंचमी पर ही खुलता है। मान्यता है कि इस मंदिर में विराजित नाग चंद्रेश्वर के दर्शन मात्र से कालसर्प दोष और दुर्भाग्य दूर हो जाता है।
प्राचीन परंपरा अनुसार का एकमात्र ऐसा भगवान नागचन्द्रेश्वर का मंदिर है जो भारतीय संस्कृति के अनुसार वर्ष में केवल श्रावण शुक्ल की पंचमी के दिन आम दर्शनार्थियों के लिए खोला जाता है. 60 फुट ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर के नागपंचमी के पर्व के श्रद्धालुओं के दर्शन के लिये पहुंचने हेतु पुराने समय में एक-एक फुट की सीढियां बनाई थीं जो रास्ता संकरा और छोटा था. इस रास्ते से एक समय में एक ही दर्शनार्थी आ जा सकता था. लेकिन वर्ष प्रतिवर्ष देश के विभिन्न प्रांतों से यहां आने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुविधाओं को देखते हुए एक अन्य लोहे की सीढियां का निर्माण कराया गया था. वर्तमान में आने जाने के अलग-अलग रास्ते बनाये गये हैं. इन लोहे की सीढियों के मार्ग के निर्माण होने से एक दिन में लाखों श्रद्धालु कतारबद्ध होकर नागचन्द्रेश्वर मंदिर में दर्शन का पुण्य लाभ लेते है. महाकालेश्वर मंदिर के महंत प्रकाशपुरी ने बताया कि नागचन्द्रेश्वर भगवान की प्रतिमा नेपाल से यहां लायी गयी और चमत्कारिक एवं आकर्षक प्रतिमा के साथ श्री लक्ष्मी माता और शंकर पार्वती नंदी पर विराजित हैं। यह मंदिर शिखर के प्रथम तल पर स्थित है और नागचन्द्रेश्वर भगवान के साथ इनका भी पूजन नागपंचमी के दिन किया जाता है. उज्जैन में गत 17 जुलाई 2019 से शुरू हुए श्रावण माह की नागपंचमी के दिन में भगवान महाकालेश्वर मंदिर सहित अन्य महादेव मंदिर में प्रतिवर्ष विभिन्न प्रांतों से लाखों की संख्या में दर्शनार्थी दर्शन के लिये आते हैं. महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति द्वारा भगवान महाकालेश्वर और भगवान नागचन्द्रेश्वर के दर्शन के लिए आये दर्शनार्थियों को नागपंचमी पर्व पर दोनों अलग-अलग मंदिर आने जाने के पृथक व्यवस्था की जाती है।

जानिए क्या है पौराणिक मान्यता ?
सर्पराज तक्षक ने शिवशंकर को मनाने के लिए घोर तपस्या की थी। तपस्या से भोलेनाथ प्रसन्न हुए और उन्होंने सर्पों के राजा तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दिया। मान्यता है कि उसके बाद से तक्षक राजा ने प्रभु के सान्निध्य में ही वास करना शुरू कर दिया।
लेकिन महाँकाल वन में वास करने से पूर्व उनकी यही मंशा थी कि उनके एकांत में विघ्न ना हो अत: वर्षों से यही प्रथा है कि मात्र नागपंचमी के दिन ही वे दर्शन को उपलब्ध होते हैं। शेष समय उनके सम्मान में परंपरा के अनुसार मंदिर बंद रहता है। इस मंदिर में दर्शन करने के बाद व्यक्ति किसी भी तरह के सर्पदोष से मुक्त हो जाता है, इसलिए नागपंचमी के दिन खुलने वाले इस मंदिर के बाहर भक्तों की लंबी कतार लगी रहती है।
यह मंदिर काफी प्राचीन है। माना जाता है कि परमार राजा भोज ने 1050 ईस्वी के लगभग इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इसके बाद सिंधिया घराने के महाराज राणोजी सिंधिया ने 1732 में महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। उस समय इस मंदिर का भी जीर्णोद्धार हुआ था। सभी की यही मनोकामना रहती है कि नागराज पर विराजे शिवशंभु की उन्हें एक झलक मिल जाए। लगभग दो लाख से ज्यादा भक्त एक ही दिन में नागदेव के दर्शन करते हैं।
नागपंचमी पर वर्ष में एक बार होने वाले भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन के लिए इस वर्ष 5 अगस्त 2019 को मंदिर के पट खुलेंगे। नागपंचमी के बाद मंदिर के पट पुनः बंद कर दिए जाएंगे।
नागचंद्रेश्वर मंदिर की पूजा और व्यवस्था महानिर्वाणी अखाड़े के संन्यासियों द्वारा की जाती है।
नागपंचमी पर्व पर बाबा महाँकाल और भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग प्रवेश की व्यवस्था की गई है। इनकी कतारें भी अलग होंगी। रात में भगवान नागचंद्रेश्वर मंदिर के पट खुलते ही श्रद्धालुओं की दर्शन की आस पूरी होगी।
5 अगस्त 2019 को (नागपंचमी के शुभ अवसर पर) को दोपहर 12 बजे पूजा होगी, यह सरकारी पूजा होगी यह परंपरा रियासतकाल से चली आ रही है।इसके बाद रात 8 बजे श्री महाकालेश्वर प्रबंध समिति द्वारा पूजन होगा।
महाकालेश्वर मंदिर के शिखर पर स्थित श्रीनागचंद्रेश्वर मंदिर के पट नागपंचमी के दिन साल में एक बार 24 घंटे के लिए खुलते हैं। इस साल नागपंचमी 5 अगस्त, सोमवार के दिन पड़ रही है, वहीं मंदिर के कपाट रविवार की रात को 12 बजे खोल दिए जाएंगे। मान्यताओं के अनुसार यहां मंदिर में नागराज तक्षक स्वयं मंदिर में रहते हैं।
विश्व की एकमात्र अद्भुत प्रतिमा हैं
नागचंद्रेश्वर मंदिर में 11वीं शताब्दी की एक अद्भुत प्रतिमा है, इसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं। कहते हैं यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है। पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं। मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या पर विराजित हैं। शिवशंभु के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए हैं।

लेखक – पं. दयानंद शास्त्री, उज्जैन
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