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कभी न भूलेगा यह संगम यह कुम्भ – भारी मन से लीं विदेशी आदिवासियों ने कुम्भ से विदाई

कभी न भूलेगा यह संगम यह कुम्भ – भारी मन से लीं विदेशी आदिवासियों ने कुम्भ से विदाई

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कभी न भूलेगा यह संगम यह कुम्भ – भारी मन से लीं विदेशी आदिवासियों ने कुम्भ से विदाई

कभी न भूलेगा यह संगम यह कुम्भ – भारी मन से लीं विदेशी आदिवासियों ने कुम्भ से विदाई

  • ‘नदियों की कहानी, नदियों की जुबानी – अद्भुत अनुभव, अभूतपूर्व यादें’’
  • नदियाँ बचेगी तो दुनिया बचेगी
  • जल है तो जीवन है, कल को बचाना है तो जल को बचाना है
  • नदियों की कहानी, नदियों की जुबानी – स्वामी चिदानन्द सरस्वती

प्रयागराज/ऋषिकेश, 24 फरवरी। परमार्थ निकेतन शिविर में धरती माता एवं नदियों की रक्षा के लिये स्वच्छता ध्वज और स्वच्छता नारे लगाते हुये विशेष रैली निकाली गयी। यहां पर विश्व के विभिन्न देशों से  विदेशी नर-नारियाँ भारतीय अध्यात्म और भारतीय संस्कृति के दर्शन कई दिनों तक करते रहे। विदेशी कन्याएं आकर्षक साड़ियाँ पहनकर विश्व की विभिन्न नदियों का प्रतीक बनकर उनकी रक्षा के लिये संदेश देती रही। इसके माध्यम से नदियों एवं जलस्रोतों को प्रदूषण से मुक्त करने के लिये विश्व स्तर पर जागरूकता का संदेश प्रसारित किया जाता रहा।

परमार्थ निकेतन शिविर से कीवा स्थल संगम तट तक मधुर वाद्ययंत्रों, स्वच्छता के झण्डे़ लिये तथा स्वच्छता और जलस्रोतों को संरक्षित करने वाले नारों के साथ रैली निकाली गयी। सब ने आज कुभ्भ के अरैल क्षेत्र से ली विदा और ऋषिकेश के लिये प्रस्थान किया तथा कुछ ने अपने-अपने देशों की ओर। परन्तु कोई भी संगम छोड़कर नहीं जाना चाहता सब के मन भारी है, आँखों में आंसू हैं तथा हृदय की पलकें गीली हैं। कोई भी तो कुम्भ से वापस नहीं जाना चाहता, सब ने एक ही बात कही सचमुच कुम्भ ने मन मोह लिया। यह हमारी पवित्र नदिया का आकर्षण, संगम की सुनहरी यादेें तथा दिव्य कुम्भ और भव्य कुम्भ की अवर्णनीय कथायें प्रशासन का व्यवहार सब कुछ अपने आप में एक चमत्कार से कम न था इसलिय पानी है तो यह चमत्कार है, नमस्कार है। अतः नदियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने भी ऋषिकेश पहुंच कर कुम्भ के संस्मरणों को सब से साझा किया तथा कहा कि ’’नदियाँ बचेगी तो दुनिया बचेगी। जल है तो जीवन है, हमें अपने कल को बचाना है तो जल को बचाना होगा। विश्व के विभिन्न कोनों से आयी नारियाँ संगम के पावन तट पर नदियों को बचाने का संदेश देती रहीं हैं। विश्व की विभिन्न महान संस्कृतियों का उद्गम नदियों के तटों पर ही हुआ है। ये जीवन दायिनी नदियाँ हैं तो धरा पर जीवन सम्भव है। उन्होने कहा कि हम जीवन के लिये जल का अधिकार तो चाहते हैं परन्तु जल प्रदान करने वाले स्रोतों के विषय में आज भी जागरूक नहीं हैं। अब केवल सरकारी स्तर पर जल नीति बनाने से काम नहीं चलेगा बल्कि हर व्यक्ति की; हर परिवार की अपनी एक जल संरक्षण नीति और स्वच्छता नीति होनी चाहिये।

विश्व के विभिन्न देशों से आये नर-नारियों ने प्रयागराज से प्रस्थान करने के पूर्व संगम में प्रार्थना की, जल शोभा यात्रा निकाली और संगम के तट से नदियों को स्वच्छ, प्रदूषण मुक्त और निर्मल बनाने का संकल्प लिया।

RW

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By Religion World February 25, 2019 3 min read
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